
कांड ४
माखन और मुँह में ब्रह्मांड
गोकुल की हर गोपी के पास एक ही शिकायत थी, और एक ही मुजरिम
दही वाली गली में हंगामा
सुबह के छह भी नहीं बजे थे कि यशोदा की दहलीज़ पर हफ़्ते की तीसरी शिकायत खड़ी थी। एक गोपी, हाथ में टूटा मटका, दूसरे हाथ से कमर पर मुक्का जमाए।
"यशोदा! तेरा लल्ला छत की मटकी तक पहुँच गया — मैंने पूरी रस्सी से ऊँचे टाँगकर रखी थी! तोड़ी, माखन निकाला, बंदरों को बाँट दिया, और जब मैं आई तो एक बूँद भी नहीं बची।"
यशोदा ने माथा पीट लिया। पीछे से कृष्ण झाँके — गाल फूले हुए, ठुड्डी पर सफ़ेद लेप, और आँखों में कोई पछतावा नहीं।
"मैंने कुछ नहीं खाया, माँ," उन्होंने कहा। मुँह में इतना माखन भरा था कि आधा शब्द भी साफ़ नहीं निकला। गोपी की हँसी छूट गई, और शिकायत वहीं ठंडी पड़ गई।
मुँह में ब्रह्मांड
अगले दिन बलराम भागते हुए आए, ख़बर देने के उत्साह में: "माँ! कान्हा ने मिट्टी खाई!"
यशोदा ने कान पकड़कर मुँह खुलवाया, डाँट होंठों पर तैयार — "अब तो हद हो गई, कान्हा।"
और भीतर झाँकते ही डाँट गले में अटक गई। मुँह के भीतर अँधेरा नहीं था। वहाँ सूरज था, चाँद था, तारों-भरा आकाश था; पहाड़ थे, समंदर थे, नदियाँ थीं — और उसी दृश्य में, एक कोने में, ख़ुद यशोदा खड़ी थीं, कान्हा का मुँह देखती हुई।
यशोदा के हाथ काँपने लगे, आँखों के आगे धुँधलापन आ गया। फिर एक झटके से सब सामान्य हो गया — बस एक बच्चा, गाल पर मिट्टी लगाए, माँ को देखकर मुस्कुराता हुआ। और यशोदा भूल गईं कि उन्होंने क्या देखा।
दामोदर — रस्सी जो कभी पूरी नहीं पड़ी
एक दोपहर चोरी हाथों-हाथ पकड़ी गई। यशोदा इस बार रस्सी लेकर आईं — "आज तो बाँधकर ही रहूँगी।"
रस्सी कमर पर लपेटी, पर गाँठ लगाने चलीं तो दो अंगुल छोटी पड़ गई। एक और रस्सी जोड़ी। फिर भी दो अंगुल कम। तीसरी जोड़ी, चौथी।
यशोदा का माथा पसीने से भीग गया, चूड़ियाँ खनकती रहीं, आँचल कंधे से ढलक गया — और हर बार ठीक वही दो अंगुल की कमी, जैसे कोई नाप के साथ मज़ाक़ कर रहा हो।
आख़िर थकी हुई माँ के आगे बच्चा हार गया — या यों कहिए, उसने बँधना चुन लिया। रस्सी बँध गई। इसी से नाम पड़ा दामोदर — जिसका उदर रस्सी से बँधा हो।
यमलार्जुन — दो पेड़ जो गिरने का इंतज़ार कर रहे थे
बँधे-बँधे कृष्ण ओखली को घसीटते हुए आँगन से बाहर निकल गए। आँगन के मुहाने पर दो विशाल अर्जुन वृक्ष सटे हुए खड़े थे।
ओखली उन दोनों के बीच में अटक गई। कृष्ण ने एक पल रुककर, फिर पूरी ताक़त से आगे खींचा।
दोनों पेड़ जड़ से उखड़कर धड़ाम से गिरे। धूल का बादल उठा, और जब बैठा तो भीतर से दो चमकते पुरुष खड़े थे, हाथ जोड़े — नलकूबर और मणिग्रीव, कुबेर के बेटे, जिन्हें नारद ने कभी अहंकार पर शाप देकर वृक्ष बना दिया था, इसी वचन के साथ कि एक दिन कृष्ण उन्हें छुड़ाएँगे।
वे प्रणाम करके चले गए। और यह उस दिन गोकुल के लिए तीसरा संकेत था — यह बच्चा सिर्फ़ शरारती नहीं है।
टिप्पणी: दामोदर-बंधन और माखन-चोरी का यह पूरा, विस्तृत वर्णन भागवत पुराण (दसवाँ स्कंध, अध्याय ९) में मिलता है। यमलार्जुन-वृक्षों की मुक्ति हरिवंश के आलोचनात्मक संस्करण की सामग्री-सूची में भी नामित रूप से आती है, पर माखन-चोरी और ओखली-बंधन की कथा उतने विस्तार से हरिवंश में नामित नहीं मिली — यह भागवत की अपनी शैली लगती है, जिसकी पुष्टि किसी सटीक हरिवंश-अध्याय-संख्या से इस सत्र में नहीं हो सकी।
स्रोत: कई ग्रंथों से, माखन और मुँह में ब्रह्मांड