कांड १०

मथुरा

शहर में घुसते ही तीन लोग मिले, और तीनों के साथ अलग बर्ताव हुआ

रास्ते के तीन लोग

मथुरा की गली में दोनों भाइयों को सबसे पहले एक धोबी मिला, जो राजा के धुले कपड़ों की गठरी सिर पर लिए जा रहा था।

कृष्ण ने हँसकर कुछ कपड़े माँगे — "उत्सव में जा रहे हैं, कुछ अच्छा पहन लें।" धोबी अकड़ गया। "राजा के कपड़े? ग्वालों के लिए? भाग जाओ यहाँ से, वरना पहरे पर पकड़वा दूँगा।"

कृष्ण का हाथ उठा और धोबी वहीं ढेर हो गया। दोनों भाइयों ने गठरी से अपने नाप के कपड़े छाँटे और पहन लिए।

आगे एक माली मिला। उसने बिना कुछ कहे, बिना कुछ माँगे, अपनी सबसे अच्छी मालाएँ उठाकर दोनों के गले में डाल दीं और घर चलने की विनती की। कृष्ण ने उसे आशीर्वाद दिया — घर में कभी कमी नहीं रहेगी।

फिर एक स्त्री मिली — कुब्जा, जिसकी पीठ तीन जगह से झुकी हुई थी। वह राजा के लिए चंदन का लेप ले जा रही थी। उसने वही महकता चंदन दोनों भाइयों के माथे और बाँहों पर मल दिया। कृष्ण ने अपने पैर के अँगूठे उसके पैरों पर रखे, ठुड्डी पकड़कर हल्के से ऊपर उठाई — और उसकी झुकी हुई पीठ सीधी हो गई।

धनुष

यज्ञशाला में वह धनुष रखा था जिसके नाम पर पूरा उत्सव था — इतना भारी कि उठाने की बात तो दूर, कई आदमी मिलकर भी उसे हिला नहीं पाते थे। चारों ओर पहरा था।

कृष्ण पहरे को अनदेखा करके भीतर चले गए। उन्होंने धनुष को एक हाथ से उठाया, प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए झुकाया — और वह बीच से टूट गया, तड़ाक की आवाज़ के साथ।

वह आवाज़ पूरे मथुरा में गूँज गई, महल तक पहुँची। पहरेदार हथियार लेकर टूट पड़े। वे भी वहीं ढेर हो गए, टूटे धनुष के दोनों टुकड़ों के पास।

फाटक पर हाथी

अगली सुबह अखाड़े का रास्ता कुवलयापीड़ के नीचे से था। महावत ने उसे मद पिला रखा था, और कृष्ण को देखते ही अंकुश से उकसा दिया।

हाथी ने सूँड़ बढ़ाकर कृष्ण को लपेटना चाहा। कृष्ण उसके पैरों के बीच से फिसल गए, कुछ देर उसे थकाते रहे, फिर सूँड़ पकड़कर उसे ज़मीन पर पटक दिया।

दोनों भाइयों ने हाथी का एक दाँत उखाड़ लिया — एक कृष्ण के हाथ में, एक बलराम के — और उसी को गदा की तरह थामे अखाड़े में घुसे।

भीतर, जहाँ सब तैयार था

अखाड़ा खचाखच भरा था। एक ओर ऊँचे मंच पर कंस बैठा था, मुट्ठियाँ भींचे। दूसरी ओर पहलवान, तेल से चमकते, ताल ठोकते।

दोनों भाई भीड़ को चीरते हुए बीच में आ खड़े हुए — बदन पर धोबी के छाँटे कपड़े, गले में माली की मालाएँ, माथे पर कुब्जा का चंदन, और हाथ में कुवलयापीड़ का दाँत।

कंस ने उन्हें देखा, और उसे बरसों पुरानी वह आकाशवाणी याद आई।

टिप्पणी: धनुष तोड़ना और कुवलयापीड़ से टक्कर — दोनों प्रसंग भागवत पुराण और हरिवंश, दोनों में बताए जाते हैं। कुब्जा का प्रसंग भागवत में है, और बाद के ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा सूरदास के सूरसागर में भी — पर विष्णु पुराण में कृष्ण के कुब्जा के घर जाने का वर्णन नहीं मिलता। हरिवंश में यह प्रसंग है या नहीं, यह इस जाँच में तय नहीं हो सका, इसलिए उस बारे में यहाँ कोई दावा नहीं है। धोबी और माली वाले प्रसंग परंपरा में इसी क्रम में आते हैं, पर उन्हें अलग-अलग ग्रंथों में अध्याय-दर-अध्याय जाँचा नहीं जा सका।

स्रोत: कई ग्रंथों से, मथुरा

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

मथुरा की गली में धोबी के साथ क्या हुआ?

  • वह डरकर भाग गया
  • उसने कंस को ख़बर कर दी
  • उसने कपड़े देने से मना किया, अकड़कर बात की, और मारा गया
  • उसने कपड़े दे दिए और इनाम पाया
पूरी कथा पढ़िए — शहर का पहला जवाब

यह दृश्य कथा में बहुत तेज़ी से गुज़रता है, और उसका मक़सद यही दिखाना लगता है कि अब हालात बदल चुके हैं।

गोकुल में कृष्ण बच्चों के साथ खेलते थे; मथुरा में पहला ही आदमी जो रास्ता रोकता है, गिर जाता है।

इसी क्रम में आगे माली और कुब्जा आते हैं — और तीनों के साथ बर्ताव अलग है, जो कि कथा का असल बिंदु है।

कौन हूँ मैं?

मैं राजा के लिए चंदन ले जा रही थी, और मैंने वह चंदन रास्ते में मिले दो अजनबियों को लगा दिया। मैं कौन हूँ?

  • यशोदा
  • देवकी
  • रोहिणी
  • कुब्जा
पूरी कथा पढ़िए — जिसने बिना पूछे दे दिया

इस प्रसंग में कुब्जा वही करती है जो धोबी ने नहीं किया — वह जो लेकर जा रही थी, वह उसने माँगे बिना दे दिया।

कथा में उसकी झुकी पीठ सीधी हो जाती है। परंपरा इसे उसकी उदारता का उत्तर मानती है, न कि उसके रूप पर कोई टिप्पणी।

यह प्रसंग भक्ति-परंपरा में बहुत लोकप्रिय हुआ, और आज भी लोक-गायन में बार-बार लौटता है।

ग्रंथ असहमत

कुब्जा का प्रसंग किन ग्रंथों में मिलता है?

  • सिर्फ़ हरिवंश में
  • सभी प्राचीन ग्रंथों में एक जैसा
  • भागवत और कुछ बाद के ग्रंथों में मिलता है, पर विष्णु पुराण में यह प्रसंग दर्ज नहीं है
  • किसी ग्रंथ में नहीं, यह सिर्फ़ फ़िल्मों से आया है
पूरी कथा पढ़िए — जो प्रसंग सबसे प्यारा है, वह सबसे नया भी हो सकता है

कुब्जा की कथा भागवत पुराण में मिलती है, और बाद के ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा सूरदास के सूरसागर में भी।

विष्णु पुराण में कृष्ण के कुब्जा के घर जाने का वर्णन नहीं मिलता — यह बात विद्वानों की टिप्पणियों में साफ़ कही गई है।

हरिवंश में यह प्रसंग है या नहीं, यह इस जाँच में तय नहीं हो पाया — इसलिए यहाँ उसके बारे में कोई दावा नहीं किया गया।

मतलब यह नहीं कि प्रसंग "झूठा" है। मतलब सिर्फ़ इतना कि वह कथा की सबसे पुरानी परत का हिस्सा नहीं दिखता।

तथ्य

माली ने क्या किया?

  • उसने रास्ता रोका
  • उसने बिना माँगे माला पहनाई और घर बुलाया
  • उसने कंस को ख़बर दी
  • उसने चंदन लगाया
पूरी कथा पढ़िए — तीन लोग, तीन जवाब

इस गली के तीनों प्रसंग एक साथ पढ़े जाने के लिए बने लगते हैं: एक ने मना किया, एक ने बिना कहे दिया, और एक ने वह दिया जो उसका अपना नहीं था।

तीनों के साथ जो हुआ, वह उनके बर्ताव के अनुपात में है — और कथा इसे समझाने की कोशिश नहीं करती, बस दिखा देती है।

इसी वजह से मथुरा में घुसने वाला यह हिस्सा किसी लड़ाई से ज़्यादा याद रह जाता है।

क्या हुआ?

यज्ञशाला में रखे धनुष का क्या हुआ?

  • कृष्ण ने उसे चढ़ाकर निशाना लगाया
  • बलराम ने उसे तोड़ा
  • कृष्ण ने उसे उठाया और चढ़ाते-चढ़ाते तोड़ डाला
  • वह किसी से उठा ही नहीं
पूरी कथा पढ़िए — जिस चीज़ के नाम पर बुलाया, वही तोड़ दी

पूरा उत्सव धनुष-यज्ञ के नाम पर था, और वही धनुष टूट गया — बुलावे का बहाना ही ख़त्म हो गया।

भागवत और हरिवंश, दोनों में यह प्रसंग बताया जाता है, और यही वह क्षण है जब कंस को समझ आ जाता है कि नियंत्रण उसके हाथ से निकल रहा है।

इसके बाद कंस के पास इंतज़ार का विकल्प नहीं बचता; अगली सुबह ही अखाड़ा सजा दिया जाता है।

कौन हूँ मैं?

मैं अखाड़े के फाटक पर बाँधा गया था, ताकि भीतर जाने वाला भीतर न पहुँचे। मैं कौन हूँ?

  • धेनुक
  • कुवलयापीड़
  • प्रलंब
  • कालिया
पूरी कथा पढ़िए — फाटक पर खड़ा किया गया ख़तरा

हाथी को वहाँ रखने का मतलब साफ़ था — जो भीतर आना चाहे, उसे पहले इससे निपटना पड़े।

भागवत और हरिवंश, दोनों में यह टक्कर वर्णित बताई जाती है, और दोनों भाई हाथी का दाँत लेकर भीतर जाते हैं।

वही दाँत आगे अखाड़े में हथियार की तरह काम आता है।

ऐसा क्यों?

दोनों भाई अखाड़े में हाथी का दाँत लेकर क्यों गए?

  • क्योंकि वह हथियार भी था और यह संदेश भी कि फाटक वाली चाल नाकाम हो चुकी है
  • क्योंकि वह पूजा की सामग्री थी
  • क्योंकि वह इनाम था
  • क्योंकि महावत ने उन्हें दे दिया था
पूरी कथा पढ़िए — भीतर घुसने का ढंग

यह दृश्य कथा में बहुत सोचा-समझा लगता है: भीड़ से भरे अखाड़े में दोनों भाई ठीक उस चीज़ के साथ दाख़िल होते हैं जो उन्हें रोकने के लिए रखी गई थी।

कंस के लिए यह सबसे बुरी ख़बर थी, और वह भी बिना एक शब्द कहे पहुँची।

इसके तुरंत बाद पहलवानों को उतारा जाता है, और अगला कांड वहीं से शुरू होता है।

सही क्रम

मथुरा में घुसने से अखाड़े तक का सही क्रम क्या है?

  • धनुष → धोबी → माली → कुब्जा → हाथी
  • कुब्जा → हाथी → धोबी → धनुष → माली
  • हाथी → धनुष → धोबी → माली → कुब्जा
  • धोबी → माली → कुब्जा → धनुष → हाथी → अखाड़ा
पूरी कथा पढ़िए — एक शहर में एक दिन

यह क्रम भागवत के अध्यायों में लगभग इसी तरह चलता है — गली के तीन प्रसंग, फिर यज्ञशाला, फिर अगली सुबह अखाड़ा।

इस पूरे हिस्से में कोई बड़ा युद्ध नहीं है, फिर भी शहर का माहौल हर दृश्य के साथ बदलता जाता है।

जब तक दोनों भाई अखाड़े में पहुँचते हैं, मथुरा में यह बात फैल चुकी होती है कि कुछ असाधारण घट रहा है।

ऐसा क्यों?

धोबी, माली और कुब्जा — तीनों के साथ अलग-अलग बर्ताव क्यों हुआ?

  • क्योंकि तीनों अलग जातियों के थे
  • क्योंकि कंस ने तीनों को भेजा था
  • क्योंकि कृष्ण तीनों को पहले से जानते थे
  • क्योंकि तीनों ने अलग-अलग बर्ताव किया
पूरी कथा पढ़िए — तीन जवाब, तीन नतीजे

यह हिस्सा कथा में लगभग एक कसौटी की तरह रखा गया लगता है — शहर के तीन साधारण लोग, और तीन अलग प्रतिक्रियाएँ।

ध्यान देने की बात यह है कि तीनों में से कोई भी बड़ा पात्र नहीं है। कथा उन्हें नाम तक कम ही देती है।

फिर भी यही तीन दृश्य पूरे मथुरा-प्रवेश को उसका मतलब देते हैं।

तथ्य

अखाड़े में पहुँचते समय दोनों भाइयों के पास क्या-क्या था?

  • धोबी के कपड़े, माली की माला, कुब्जा का चंदन, और हाथी का दाँत
  • कंस का दिया हुआ राजसी वेश
  • सिर्फ़ हथियार
  • कुछ भी नहीं
पूरी कथा पढ़िए — पूरा रास्ता साथ चला आया

यह ब्योरा कथा-शिल्प के हिसाब से बहुत सुंदर है — अखाड़े में घुसते समय उनके शरीर पर उस पूरे दिन का हिसाब मौजूद है।

जो छीना गया, जो दिया गया, जो बिना माँगे मिला, और जो लड़कर लिया गया — चारों एक साथ।

अगला कांड इसी मंच से शुरू होता है, और वहाँ कंस के पास कोई चाल बाक़ी नहीं बचती।