
कांड १८
नरकासुर और सोलह हज़ार
एक असुर के महल में हज़ारों स्त्रियाँ बंद थीं। कृष्ण उन्हें आज़ाद करने ही नहीं, उनकी गरिमा लौटाने गए थे
शिकायत जो स्वर्ग से आई
प्राग्ज्योतिषपुर के असुर-राजा नरकासुर ने देवताओं तक को नहीं बख़्शा था। उसने वरुण का छत्र छीन लिया था, देवमाता अदिति के कान के कुंडल उतरवा लिए थे, और अपनी विजयों में हराए हुए राजाओं की बेटियाँ और पत्नियाँ उठाकर अपने महल में क़ैद कर रखी थीं — हज़ारों की तादाद में।
इंद्र ख़ुद उससे हार चुका था। हार के बाद वह मदद माँगने द्वारका आया।
कृष्ण ने बात सुनी और चलने को तैयार हो गए।
गरुड़ पर सवार, एक पत्नी साथ
कृष्ण अकेले नहीं गए। उनकी पत्नी सत्यभामा साथ चलीं — प्राग्ज्योतिषपुर पर चढ़ाई में, धनुष हाथ में लिए। गरुड़ ने दोनों को पीठ पर बिठाया और पूरब की ओर उड़ान भरी।
नगर के बाहर पहला सामना नरकासुर के सेनापति मुर से हुआ — पाँच सिरों वाला असुर, जो ख़ाई में छिपा बैठा था। लड़ाई भीषण थी पर छोटी; कृष्ण ने उसे चक्र से काट गिराया, और तभी से एक नाम पड़ा — मुरारि।
फिर प्राग्ज्योतिषपुर के फाटक पर असली युद्ध। पहाड़ों और हथियारों की सात परतों वाला क़िला, ऊपर से तीरों की बौछार। एक क्षण ऐसा भी आया जब कृष्ण नरकासुर के अस्त्र से मूर्च्छित-से हो गए — और सत्यभामा ने ख़ुद मोर्चा सँभाला, धनुष उठाया, और मोर्चा टूटने नहीं दिया, जब तक कृष्ण फिर खड़े नहीं हुए और नरकासुर को गिरा नहीं दिया।
महल के भीतर, अँधेरी कोठरियाँ
नरकासुर गिरा। उसके बेटे भगदत्त को कृष्ण ने अभय देकर राजगद्दी सौंपी, और अदिति के कुंडल लौटाने के लिए अलग रख दिए।
फिर वे महल के भीतर गए, और वहाँ सन्नाटा था। बंद दरवाज़ों की क़तारें, और हर दरवाज़े के पीछे स्त्रियाँ — बरसों की क़ैद में, अपने घरों से कोसों दूर।
कृष्ण ने हर दरवाज़ा खुलवाया। स्त्रियाँ बाहर आईं — किसी की आँखों में सिर्फ़ राहत थी, और किसी की आँखों में एक सवाल: अब क्या? घर लौटेंगे तो क्या हमारे पिता, हमारे पति हमें वापस लेंगे? समाज क्या कहेगा?
सम्मान, ज़बरदस्ती नहीं
कृष्ण उस दौर के समाज को जानते थे — वह बंदी रह चुकी स्त्री को आसानी से वापस नहीं अपनाता था; उसके लिए ताने थे, बहिष्कार था, दासी जैसा जीवन था।
उन्होंने एक प्रस्ताव रखा, हर स्त्री के सामने, चुनने की छूट के साथ: जो चाहे, कृष्ण की पत्नी के रूप में द्वारका आ सकती है — नाम, दर्जा, सुरक्षा और घर के साथ। यह विवाह गृहस्थी नहीं था, यह एक छाता था।
सोलह हज़ार स्त्रियों ने द्वारका आना चुना। हर एक को अपना घर मिला, अपना नाम मिला, रानी का दर्जा मिला — और किसी को फिर कभी यह नहीं सुनना पड़ा कि वह किसी की क़ैद में रह चुकी है।
टिप्पणी: नरकासुर-वध की कथा भागवत पुराण, विष्णु पुराण और हरिवंश — तीनों में मिलती है। मुक्त की गई स्त्रियों की संख्या पर ग्रंथ असहमत हैं — भागवत पुराण सोलह हज़ार बताता है, विष्णु पुराण और हरिवंश सोलह हज़ार एक सौ। दोनों संख्याएँ यहाँ दर्ज हैं, किसी एक को "सही" नहीं ठहराया गया।
स्रोत: कई ग्रंथों से, नरकासुर और सोलह हज़ार