
कांड ३
पूतना
गोकुल में एक सुंदर औरत आई, और गोद में बच्चा माँग बैठी
मथुरा से भेजी गई
देवी की चेतावनी के बाद कंस ने इंतज़ार करना छोड़ दिया। उसकी सोच अब दूसरी थी — अगर पता नहीं कि वह बच्चा कहाँ है, तो उस उम्र के हर बच्चे तक हत्यारे भेज दो। कोई न कोई बच्चा निशाने पर आ ही जाएगा।
पूतना उन्हीं हत्यारों में से एक थी। पर वह सेना लेकर नहीं आई, तलवार लेकर नहीं आई।
वह भेस बदलकर आई — एक कोमल, हँसती हुई औरत बनकर, जिसे देखकर किसी माँ के मन में शक न उठे।
जो सबसे भली दिखी
उस दिन गोकुल में जो अजनबी औरत आई, वह सबसे सुंदर थी और सबसे मीठा बोलती थी। उसकी गोद बच्चों के लिए खुली थी और उसकी बातों में गाँव की हर गोपी घुलती चली गई।
"कितना प्यारा है," वह हर आँगन में यही कहती, बच्चे को गाल से लगाती, और आगे बढ़ जाती। किसी ने उसे रोका नहीं, किसी ने पूछा नहीं कि वह है कौन।
फिर वह यशोदा के घर पहुँची। पालने में लेटे बच्चे को देखा, और बिना पूछे उठा लिया। यशोदा पास ही थीं — उन्हें भी वह औरत भली ही लगी।
पूतना दीवार की ओट में जा बैठी और बच्चे को दूध पिलाने के लिए गोद में सीधा किया। उसके स्तन पर विष का लेप लगा था।
जो पिया, वह लौट आया
बच्चे ने मुँह लगाया — और छोड़ा नहीं।
पूतना का चेहरा तनने लगा। उसने खींचकर बच्चे को अलग करना चाहा; बच्चा जुड़ा रहा, जैसे उसकी साँस से चिपक गया हो। उसने फिर ज़ोर लगाया, फिर एक चीख़ निकली जो गोकुल की गली-गली में गूँज गई।
वह उठकर भागी, बच्चे को छाती से लटकाए। उसका सुंदर रूप हर क़दम पर उखड़ता गया — पहले चेहरा, फिर हाथ-पाँव, फिर पूरा शरीर।
गोकुल के लोग चीख़ सुनकर दौड़े आए। आँगन में एक विशाल राक्षसी का शव पड़ा था, कोसों तक फैला हुआ — और उसकी छाती पर एक बच्चा किलकारियाँ मारता खेल रहा था।
जिसे माँ कहा गया
यशोदा ने काँपते हाथों से बच्चे को उठाया और हर तरफ़ से देखा। उसे खरोंच तक नहीं आई थी।
गाँव वालों ने उस विशाल शव को टुकड़ों में काटकर ठिकाने लगाया, और उठता धुआँ, कहते हैं, चंदन जैसा महका। पर कथा यहीं ख़त्म नहीं होती।
परंपरा कहती है कि पूतना को इसके बदले वही मिला जो एक माँ को मिलता है। इरादा उसका जो भी रहा हो, आख़िरी काम उसने यही किया था — उसने बच्चे को दूध पिलाया था।
टिप्पणी: पूतना का प्रसंग कृष्ण-लीला के सबसे ज़्यादा दोहराए गए प्रसंगों में है — भागवत पुराण, हरिवंश और विष्णु पुराण, और बाद के ग्रंथों में भी यह मिलता है। ब्योरों में फ़र्क़ है: कुछ पुराने विवरणों में स्तन पर विष नहीं, एक नशीला लेप बताया गया है, और बाद के विवरणों में वह साफ़ ज़हर हो जाता है। पूतना को मुक्ति मिलने वाली बात पूरी परंपरा में चलती है, पर इस जाँच में वह किसी एक ग्रंथ के किसी नामित अध्याय से पुष्ट नहीं हो सकी — इसलिए यहाँ उसे परंपरा कहकर लिखा गया है, किसी पाठ के हवाले से नहीं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, पूतना