
कांड ८
रास
एक रात का नाच, जो सदियों में जाकर पूरा धर्मशास्त्र बन गया
शरद की एक रात
शरद की रात थी। आकाश साफ़, चाँदनी खुली हुई, और हवा में कुमुदिनी की गंध। यमुना के किनारे कहीं से एक बाँसुरी बजने लगी।
गोकुल के घरों में जिन स्त्रियों ने वह धुन सुनी, वे उठ खड़ी हुईं। कोई चढ़ा हुआ दूध उतारे बिना छोड़ आई, कोई बाल आधे गूँथकर, कोई अपने घरवालों को बिना बताए, अँधेरे में दबे पाँव।
किसी ने किसी से नहीं पूछा कि कहाँ जा रही हो, क्यों जा रही हो। पूछने की गुंजाइश ही नहीं थी — धुन बुला रही थी, और पैर चल पड़े थे।
घेरा
वन में वे इकट्ठा हुईं, यमुना के रेतीले तट पर, और नाच शुरू हुआ — एक बड़ा घेरा, बीच में कृष्ण, हाथ में बाँसुरी।
पहले सब ठीक चला। फिर हर स्त्री के मन में यह भाव उठा कि कृष्ण अभी सिर्फ़ उसके साथ हैं, उसी का हाथ थामे, उसी की ओर देखते हुए।
और कथा इसे सीधे-सीधे कहती है: वह भाव ग़लत नहीं था। कृष्ण ने अपने को उतने रूपों में बाँट लिया जितनी स्त्रियाँ थीं। घेरा एक था, और कृष्ण हर जोड़ी के बीच थे — सबके साथ, एक साथ।
रात बढ़ती गई। किसी को समय का पता नहीं चला, थकान का पता नहीं चला। बस नाच था, और बाँसुरी, और चाँदनी।
और फिर वे नहीं थे
फिर, अचानक, घेरे के बीच का स्थान ख़ाली था।
बाँसुरी बंद हो गई। नाच टूट गया। स्त्रियाँ ठहर गईं, एक-दूसरे को देखती हुईं — वे गए कहाँ?
वे वन में ढूँढ़ने निकलीं। "तुमने देखा उन्हें?" उन्होंने पेड़ों से पूछा। लताओं से पूछा। हिरनों से पूछा। यहाँ तक कि ज़मीन पर पड़े अपने ही पैरों के निशानों से पूछने लगीं — "बताओ, वे किस राह गए?"
फिर वे रेत पर बैठ गईं और गाने लगीं — उनकी याद में, उनकी शिकायत में, उन्हें लौटा लाने के लिए। वह गीत आज भी गाया जाता है; भागवत में उसे गोपी-गीत कहते हैं।
लौटना
वे लौट आए।
कथा यह नहीं बताती कि वे क्यों गए थे, और न यह कि लौटे क्यों। इतना ही कहती है कि जो चीज़ अपने आप, बिना माँगे मिलती रहे, उसकी असली क़ीमत तब पता चलती है जब वह एक बार, थोड़ी देर के लिए, हट जाए।
बाक़ी रात फिर वैसी ही थी — घेरा, बाँसुरी, चाँदनी। पर अब हर स्त्री जानती थी कि उसके पास जो है, वह मिला हुआ है, अपना कमाया नहीं।
टिप्पणी: भागवत पुराण में यह प्रसंग "रास-पंचाध्यायी" कहलाता है — दसवें स्कंध के उनतीसवें से तैंतीसवें अध्याय तक, जिसमें इकतीसवाँ अध्याय गोपी-गीत है (केवल उन्नीस श्लोक)। हरिवंश में वही रात एक ही प्रसंग में आती है और उसे हल्लीसक कहा गया है — एक घेरे वाले लोक-नृत्य का नाम, बिना किसी दार्शनिक भार के। यानी अंतर सिर्फ़ लंबाई का नहीं, देखने के ढंग का है। राधा का नाम इस प्रसंग में इनमें से किसी पाठ में नहीं आता; वे बहुत बाद की परंपरा में केंद्रीय होती हैं। (हरिवंश का अध्याय-क्रमांक प्रचलित पाठ से लिया गया है, आलोचनात्मक संस्करण से नहीं।)
स्रोत: कई ग्रंथों से, रास