
कांड १६
रुक्मिणी
सबने इसे हरण कहा, पर योजना उसी की थी जिसे ले जाया गया
जिसने ख़ुद तय किया
विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी ने कृष्ण को कभी देखा नहीं था। उन्होंने दरबार में आने-जाने वालों से उनके बारे में सुना था — मथुरा का वह यादव, जिसने कंस को मारा, जिसने द्वारका बसाई — और मन ही मन तय कर लिया था कि विवाह करेंगी तो उन्हीं से।
पर घर में यह तय करने वाली वे नहीं थीं। उनके बड़े भाई रुक्मी ने, जो जरासंध का मित्र था, उनका विवाह चेदि के राजा शिशुपाल से तय कर दिया।
घर में किसी से कहना बेकार था — पिता चुप थे, भाई ज़िद पर। तो रुक्मिणी ने कहा नहीं। उन्होंने लिखा।
चिट्ठी
एक भरोसेमंद ब्राह्मण को चुना गया, और चिट्ठी छिपाकर द्वारका पहुँचाई गई।
उसमें विनती नहीं थी, पूरी योजना थी। "विवाह से एक दिन पहले, रिवाज के अनुसार, मैं नगर के बाहर कुल-देवी के मंदिर जाऊँगी। दुल्हन को वहाँ जाने से कोई नहीं रोकता। रास्ता खुला रहेगा। वहीं से मुझे ले चलिए।"
और अंत में यह भी लिखा था — "अगर आप न आए, तो मैं यह विवाह नहीं करूँगी। मैं प्राण त्याग दूँगी, और अगले जन्म में फिर आपको ही चुनूँगी।"
मंदिर से
वह दिन आया। रुक्मिणी सज-धजकर, सखियों के साथ, मंदिर गईं। देवी के आगे उन्होंने सिर झुकाया और बस एक प्रार्थना की।
बाहर निकलीं तो रथ वहीं खड़ा था, और उस पर कृष्ण।
रुक्मिणी सबके देखते-देखते रथ पर चढ़ गईं, और रथ चल पड़ा। बारात, शिशुपाल के लोग, जरासंध की सेना — सब पीछे दौड़े, हथियार लिए। खुले मैदान में लड़ाई हुई, और वे हारकर लौटे।
भाई
रुक्मी सबसे आगे था और सबसे आख़िर तक लड़ा। उसने क़सम खाई थी कि बहन को वापस लाए बिना विदर्भ नहीं लौटेगा।
वह हार गया, धूल में गिरा, निहत्था। कृष्ण ने तलवार उठाई — और रुक्मिणी रथ से उतरकर बीच में आ गईं।
"इसे मत मारिए। यह जैसा भी है, मेरा भाई है।" कृष्ण रुक गए। उन्होंने रुक्मी की जान बख़्श दी, पर सज़ा के तौर पर उसका सिर और मूँछें उस्तरे से मूँड़ दीं, और उसी हाल में उसे छोड़ दिया।
रुक्मी ने अपनी क़सम निभाई — मुँडे सिर के साथ वह विदर्भ नहीं लौटा। उसने पास ही एक नया नगर, भोजकट, बसाया और वहीं रह गया।
टिप्पणी: रुक्मिणी की चिट्ठी भागवत पुराण के दसवें स्कंध के बावनवें अध्याय में मिलती है, और पूरा प्रसंग बावनवें से चौवनवें अध्याय तक चलता है। रुक्मी को जान बख़्शने और सिर-मूँछ मूँड़ने का ब्योरा भी भागवत के इसी हिस्से का बताया जाता है। एक बात साफ़ रखनी ज़रूरी है: इस कांड की जाँच अधूरी है — हरिवंश और विष्णु पुराण रुक्मिणी की कथा को किस तरह देते हैं, या देते भी हैं या नहीं, यह इस जाँच में नहीं देखा जा सका। इसलिए यहाँ जो कुछ भी कहा गया है, वह भागवत के आधार पर है, और यह मुमकिन है कि यह कांड इस पूरे महाकाव्य के उन थोड़े हिस्सों में हो जो मुख्य रूप से एक ही ग्रंथ से आते हैं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, रुक्मिणी