
कांड १२
संदीपनि
गुरु ने फ़ीस में वह माँगा जो कोई नहीं दे सकता था
देर से शुरू हुई पढ़ाई
कंस के मरने के बाद दोनों भाइयों को औपचारिक शिक्षा के लिए भेजा गया — अवंती नगरी में, संदीपनि मुनि के आश्रम में। तब तक वे सामान्य छात्र-आयु से काफ़ी आगे निकल चुके थे।
आश्रम में उनके साथ कोई रियायत नहीं हुई। वे बाक़ी शिष्यों की तरह ही रहे — जंगल से लकड़ी लाना, गुरु के लिए पानी भरना, आश्रम की सफ़ाई, और फिर पाठ।
कथा कहती है कि जिन चौंसठ विद्याओं को सीखने में बरसों लगते हैं, उन्हें दोनों भाइयों ने चौंसठ दिनों में सीख लिया — एक दिन में एक। यहीं आश्रम में उनकी मित्रता एक ग़रीब ब्राह्मण बालक सुदामा से हुई।
गुरु-दक्षिणा
पढ़ाई पूरी हुई तो दोनों भाई गुरु के सामने हाथ जोड़कर खड़े हुए। "दक्षिणा में क्या दें, गुरुदेव?"
संदीपनि कुछ देर चुप रहे। फिर उनकी पत्नी ने, आँखें नीची किए, बात कही।
उनका इकलौता बेटा बरसों पहले प्रभास में, समुद्र के किनारे, तीर्थयात्रा के दौरान खो गया था। ढूँढ़ने पर भी नहीं मिला, लौटा नहीं। "अगर दे सकते हो, तो वही ला दो।"
आश्रम में सन्नाटा छा गया। यह दक्षिणा नहीं थी, यह असंभव थी — बरसों पहले समुद्र किनारे खोया बच्चा कोई कैसे लौटाए।
समुद्र के नीचे
दोनों भाई प्रभास गए और सीधे समुद्र में उतर गए।
समुद्र के तल पर पंचजन नाम का एक असुर रहता था, एक विशाल शंख के भीतर छिपा हुआ। कहा जाता था कि उसी ने उस दिन किनारे से बच्चे को उठा लिया था।
कृष्ण ने उसे ढूँढ़ निकाला और मार डाला। पर उसके भीतर, या उसके घर में, कहीं बच्चा नहीं था।
जो मिला वह शंख था — पंचजन का अपना शरीर। कृष्ण ने उसे उठा लिया। वही शंख आगे पांचजन्य कहलाया, और कुरुक्षेत्र के मैदान में वही शंख कृष्ण के हाथ में गूँजा।
जहाँ से कोई नहीं लौटता
अब साफ़ था कि बच्चा कहाँ है — यमलोक में, मरे हुओं के लोक में।
दोनों भाई वहाँ पहुँचे। यम के द्वार पर कृष्ण ने अपना शंख फूँका, और यम ख़ुद सामने आए। बात रखी गई — गुरु का पुत्र, गुरु-दक्षिणा के लिए। यम ने बालक लौटा दिया।
वे उसे लेकर अवंती लौटे और गुरु के आगे खड़ा कर दिया, ठीक उसी उम्र का जिस उम्र में वह खोया था। दक्षिणा चुका दी गई थी।
टिप्पणी: यह प्रसंग भागवत पुराण में मिलता है, और उसमें खोज दो पड़ावों में चलती है — पहले प्रभास में समुद्र के नीचे पंचजन, फिर यमलोक। ध्यान रहे कि ये दो अलग-अलग परंपराएँ नहीं हैं, एक ही कथा के दो हिस्से हैं। पांचजन्य शंख का नाम उसी असुर से बना है। भागवत में इसका ठीक अध्याय-क्रमांक इस जाँच में पक्का नहीं किया जा सका (दसवें स्कंध के पैंतालीसवें अध्याय के आसपास बताया जाता है), और हरिवंश तथा विष्णु पुराण इस प्रसंग को किस तरह देते हैं, यह भी अलग से जाँचने की बात है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, संदीपनि