
कांड १७
स्यमंतक मणि
एक रत्न ग़ायब हुआ, एक आदमी मरा, और उँगली उठी कृष्ण की तरफ़
जो चमकता है, वह शक भी जगाता है
द्वारका में सत्राजित नाम के एक यादव के पास एक अनोखा रत्न था — स्यमंतक मणि, जो ख़ुद सूर्यदेव ने उसे दिया था। वह रोज़ आठ भार सोना उगलता, और जिस नगर में रहता, वहाँ अकाल, बीमारी और अनहोनी नहीं आने देता।
कृष्ण ने सत्राजित को सलाह दी — "यह मणि इतनी बड़ी है कि किसी एक घर की नहीं होनी चाहिए। इसे राजकोष में रख दो, ताकि पूरा राज्य इसका लाभ उठाए।"
सत्राजित ने मना कर दिया, और मणि अपने घर के मंदिर में रख ली। द्वारका में लोग फुसफुसाने लगे — "देखा? कृष्ण की नज़र उस मणि पर है।"
जंगल से एक ख़बर नहीं लौटी
एक सुबह सत्राजित का भाई प्रसेन वही मणि गले में पहनकर शिकार पर निकला, घोड़े पर। दिन ढल गया, वह नहीं लौटा।
शाम होते-होते सत्राजित के दरवाज़े पर भीड़ जुट गई, और उसकी ज़ुबान पर एक ही नाम था। "कृष्ण को मणि चाहिए थी। मैंने राजकोष वाली बात पर मना किया, और आज मेरा भाई ग़ायब है। उसी ने मरवाया होगा, मणि के लिए।"
बात हवा की तरह फैली। किसी ने सबूत नहीं माँगा — इल्ज़ाम अपने-आप में काफ़ी था। द्वारका की गलियों में कृष्ण का नाम एक चोर और हत्यारे की तरह लिया जाने लगा।
निशान जो जंगल में मिले
कृष्ण ख़ुद जाँच पर निकले — ग़ुस्से में नहीं, सफ़ाई देने नहीं, बस यह जानने कि हुआ क्या।
जंगल में उन्होंने प्रसेन के घोड़े के खुरों के निशान पकड़े। एक जगह घोड़ा और प्रसेन, दोनों मरे पड़े थे — और वहाँ से आगे इंसानी क़दमों की जगह एक सिंह के पंजों के निशान चल पड़े।
वे उन पंजों के निशानों के पीछे चले। थोड़ी दूर पर सिंह भी मरा पड़ा था — किसी और ने, किसी बड़ी चीज़ ने, उसे चीर डाला था। और उसी जगह से एक भारी शरीर के घिसटने का निशान, सीधे एक अँधेरी पहाड़ी गुफ़ा की ओर जाता हुआ।
अँधेरे में, कई दिन
गुफ़ा के भीतर, एक झूले में, एक बच्चा स्यमंतक मणि से खेल रहा था — जामवंत का नन्हा बेटा, जिसे धाय ने रोते हुए बहलाने के लिए वह चमकता रत्न थमा दिया था। कृष्ण ने आगे बढ़कर मणि माँगी, और धाय चीख़ पड़ी।
भीतर से एक विशाल आकृति गरजती हुई निकली — जामवंत, भालुओं का राजा, वही जो कभी राम की सेना में सेतु बाँधने और लड़ने आया था। उसने पहचाना नहीं कि सामने कौन है। "मेरी गुफ़ा में घुसकर इस मणि तक हाथ बढ़ाने वाला तू कौन है!"
युद्ध शुरू हुआ — अँधेरे में मुक्कों की आवाज़, गुफ़ा की दीवारों से टकराती गूँज, दिन पर दिन बीतते गए। अट्ठाईसवें दिन थका हुआ जामवंत रुका, और अँधेरे में उसकी आँखों में पहचान चमकी — यह बल, यह तेज, यह तो वही हैं जिनकी सेवा उसने त्रेता में की थी। उसके हाथ से हथियार गिर पड़े, और वह हाथ जोड़कर झुक गया।
दो विवाह, एक बेगुनाही
जामवंत ने मणि लौटाई, और साथ में अपनी बेटी जामवती का हाथ भी कृष्ण को सौंप दिया।
कृष्ण द्वारका लौटे और भरी सभा में सत्राजित के सामने मणि रख दी — "यह रहा तुम्हारा जवाब। तुम्हारे भाई को सिंह ने मारा, सिंह को जामवंत ने। मैं मणि लेने नहीं, तुम्हें सच बताने आया हूँ।"
सत्राजित शर्म से गड़ गया। उसने माफ़ी माँगी, और प्रायश्चित के तौर पर मणि और अपनी बेटी सत्यभामा — दोनों कृष्ण को देने की पेशकश की। कृष्ण ने सत्यभामा को स्वीकार किया, मणि लौटा दी। जो कथा एक झूठे इल्ज़ाम से शुरू हुई थी, दो विवाहों पर जाकर थमी।
टिप्पणी: स्यमंतक मणि की पूरी कथा विष्णु पुराण और भागवत पुराण, दोनों में मिलती है। दोनों ग्रंथ एक बात पर असहमत हैं — विष्णु पुराण खोज और युद्ध की अवधि इक्कीस दिन बताता है, भागवत पुराण सत्ताईस-अट्ठाईस दिन। यहाँ किसी एक संख्या को सही नहीं ठहराया गया है, दोनों दर्ज हैं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, स्यमंतक मणि