
कांड १३
उद्धव का संदेश (भ्रमर गीत)
कृष्ण ने समझाने को एक दार्शनिक भेजा। गोपियों ने उसे ताने मारकर वापस भेज दिया
ज्ञानी दूत, टूटा हुआ गाँव
मथुरा में कंस मर चुका था, राजपाट बदल चुका था। कृष्ण अब राजकाज में उलझे थे, और वृंदावन नहीं लौटे थे — न महीनों में, न बरसों में।
वृंदावन में गोपियों ने खिड़कियों की ओर देखना छोड़ दिया था। बाँसुरी की आवाज़ अब सिर्फ़ याद में बजती थी।
कृष्ण ने अपने सबसे भरोसेमंद मित्र और सलाहकार उद्धव को वहाँ भेजा — यह समझाने कि दूरी कोई चीज़ नहीं है, कृष्ण हर जगह हैं, और असली भक्ति आकार से ऊपर उठकर होती है। उद्धव रथ पर सवार वृंदावन पहुँचे, पूरे आत्मविश्वास से — यह उपदेश वे दरबार में सैकड़ों बार दे चुके थे।
"तुम्हारा ज्ञान किताबी है"
"ध्यान करो," उद्धव ने गोपियों से कहा। "कृष्ण को निराकार समझो, सर्वव्यापी। वे कहीं गए ही नहीं। जो हर जगह है, वह तुमसे दूर कैसे होगा?"
एक गोपी हँस पड़ी, और उसके पीछे बाक़ी।
"यह ज्ञान उसके लिए है जिसने कृष्ण को छुआ नहीं, जिसने वह बाँसुरी नहीं सुनी," उसने कहा, और आवाज़ में तीख़ापन साफ़ था। "हमें निराकार मत सिखाओ, उद्धव। हमें हमारा वह कृष्ण लौटा दो जिसका रंग है, जिसकी हँसी है, जो पीताम्बर पहनता है। तुम्हारा सर्वव्यापी कृष्ण हमारे किसी काम का नहीं।" उद्धव के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
भँवरे से शिकायत
तभी पास के फूलों के बीच एक काला भँवरा मँडराने लगा। एक गोपी उसी की ओर मुड़ गई, और उद्धव को छोड़कर भँवरे से बात करने लगी।
"आओ, काले महाशय। बैठो। तुम भी तो उन्हीं की तरह हो — एक फूल का रस लिया, उड़ गए; दूसरे पर जा बैठे। किसी एक के होकर रहना तुम्हारे स्वभाव में ही नहीं। जाओ, अपने उस मित्र से कह देना कि हमें उसके संदेश नहीं चाहिए।"
हर पंक्ति में उलाहना था, और हर उलाहने के भीतर प्रेम छिपा था। उद्धव खड़े सुनते रहे। यह न सिर्फ़ शोक था, न सिर्फ़ शिकायत — यह दोनों एक साथ था, और इतना पैना कि उनकी सारी सीखी हुई बातें उसके आगे बौनी पड़ गईं।
दार्शनिक जो शिष्य बनकर लौटा
उस रात उद्धव को नींद नहीं आई। उन्होंने ख़ुद से वह कहा जो पहले कभी नहीं सोचा था — कि काश अगले जन्म में वे वृंदावन की एक लता बनें, एक झाड़ी बनें, यहाँ की धूल बनें, जिस पर इन गोपियों के पैर पड़ें। किसी और लोक का देवता होने से यह कहीं बड़ा है।
सुबह वे मथुरा लौटे। रथ वही था, सारथी वही था। पर भीतर बैठा आदमी वह नहीं था जो गया था — वह उपदेश देने गया था, और सीखकर लौटा।
टिप्पणी: भ्रमर गीत भागवत पुराण के दसवें स्कंध, अध्याय ४७ में अध्याय-स्तर पर पक्की तरह मिलता है। भँवरे को संबोधित करने वाली गोपी की पहचान किसी विशेष नाम से करना मूल श्लोकों का हिस्सा नहीं लगता — यह पहचान बाद की टीका-परंपरा से जुड़ी मानी जाती है, और यहाँ उसी हद तक बताई गई है, आगे नहीं बढ़ाई गई।
स्रोत: कई ग्रंथों से, उद्धव का संदेश (भ्रमर गीत)