कांड ६

वन की आग

यह कांड बड़े भाई का है — पर आग किसी और ने निगली

तालवन, जहाँ कोई नहीं जाता था

तालवन में ताड़ के पेड़ पके फलों से लदे खड़े थे, और गोकुल का कोई लड़का उधर पैर नहीं रखता था। वजह धेनुक था — गधे के रूप वाला एक असुर, जिसने अपने साथियों के साथ उस पूरे वन पर क़ब्ज़ा जमा रखा था। जो भी फल तोड़ने घुसता, वह उसे दुलत्तियों से मार डालता।

लड़कों ने बलराम और कृष्ण के सामने बात रखी — "फल तो इतने हैं कि ज़मीन ढँक जाए। पर खाए कौन।"

बलराम मुस्कुराए। "तो चलो।"

उन्होंने एक पेड़ पकड़कर हिलाया; पके ताड़ ज़मीन पर गिरने लगे, धमाके के साथ। शोर सुनकर धेनुक दुलत्ती झाड़ता हुआ दौड़ा आया।

बलराम एक क़दम भी पीछे नहीं हटे। उन्होंने उसकी पिछली दोनों टाँगें पकड़ीं, उसे सिर के ऊपर घुमाया, और एक ऊँचे ताड़ के पेड़ पर दे मारा। पेड़ टूट गया, और धेनुक भी।

खेल में एक अजनबी

कुछ दिन बाद लड़के एक खेल खेल रहे थे — हारने वाला जीतने वाले को पीठ पर बिठाकर एक तय जगह तक दौड़ता।

उस दिन टोली में एक लड़का नया था। किसी ने ध्यान से नहीं देखा; खेल में सब बराबर होते हैं।

अपनी बारी आने पर उसे बलराम को पीठ पर लेकर दौड़ना था। वह दौड़ा — और दौड़ता ही चला गया, तय जगह से आगे, टोली से दूर, और तेज़, और तेज़।

पीठ पर बैठे बलराम को लगा जैसे नीचे का शरीर बढ़ता जा रहा है, भारी होता जा रहा है। यह लड़का नहीं था। यह प्रलंब था, कंस का भेजा एक और असुर।

बलराम ने एक ही मुक्का सिर पर मारा। प्रलंब वहीं गिरा और वहीं ख़त्म हुआ। इसी से बलराम को एक नाम मिला — प्रलंबारि।

और फिर वन जल उठा

एक दिन गायें चरते-चरते सूखे वन में बहुत दूर निकल गईं, और लड़के उन्हें ढूँढ़ते हुए पीछे-पीछे चले गए। शाम गहराने लगी।

आग कहाँ से लगी, किसी ने नहीं देखा। इतना पता चला कि अचानक चारों तरफ़ लपटें थीं — सूखे तालवन में आग हवा से भी तेज़ फैलती है — और घेरे के बीच में गायें और बच्चे।

लड़के घबरा गए। धुआँ आँखों में भर रहा था, गायें रँभा रही थीं।

"आँखें बंद कर लो," किसी ने कहा — शायद कृष्ण ने ही। "और खोलना मत, जब तक मैं न कहूँ।"

जो हुआ, वह किसी ने नहीं देखा

लड़कों ने आँखें मूँद लीं। गरमी चेहरे पर थी, फिर धीरे-धीरे कम हुई, फिर नहीं रही।

"अब खोलो।"

आँखें खुलीं तो वन शांत था। लपटें नहीं, चटकने की आवाज़ नहीं, धुआँ तक नहीं। गायें वहीं खड़ी थीं, सुरक्षित।

आग को कृष्ण पी गए थे — पूरी की पूरी, एक साँस में।

इस कांड में दो असुर मरे, और दोनों बलराम के हाथों। पर जिस क्षण सबकी जान बची, वह कृष्ण का था। शीर्षक बड़े भाई का है; आख़िरी दृश्य छोटे का।

टिप्पणी: धेनुक का वध बलराम के हाथों होता है — यह हरिवंश और विष्णु पुराण दोनों में मिलता है, और तरीक़ा भी दोनों में लगभग एक जैसा बताया गया है। प्रलंब भी बलराम के हाथों मरता है (विष्णु पुराण और महाभारत में उल्लेख; भागवत के दसवें स्कंध का अठारहवाँ अध्याय भी इसी का है)। वन की आग निगलने वाला काम कृष्ण का है और उसका पक्का ठिकाना भागवत पुराण है — हरिवंश में यही ब्योरा इस जाँच में नहीं मिला, इसलिए उसे हर ग्रंथ की बात नहीं कहा जा सकता।

स्रोत: कई ग्रंथों से, वन की आग

अब बताइए — कितना याद रहा?

कौन हूँ मैं?

मैं गधे के रूप में एक पूरे वन पर क़ब्ज़ा किए बैठा था। मेरे डर से कोई ताड़ का फल तक नहीं तोड़ता था। मैं कौन हूँ?

  • कालिया
  • पूतना
  • धेनुक
  • प्रलंब
पूरी कथा पढ़िए — फल जो कोई नहीं तोड़ सकता था

हरिवंश और विष्णु पुराण, दोनों में धेनुक का वध बलराम के हाथों होता है, और दोनों में तरीक़ा लगभग एक जैसा बताया गया है — पिछली टाँगें पकड़कर घुमाना और पेड़ पर दे मारना।

विष्णु पुराण में शव को ताड़ के पेड़ पर फेंकने का ब्योरा भी मिलता है।

इस प्रसंग का असल मतलब छोटा-सा है और इसीलिए दिलचस्प है: यह किसी बड़े युद्ध की कथा नहीं, एक वन को दोबारा इस्तेमाल लायक़ बनाने की कथा है।

तथ्य

धेनुक का वध किसने किया?

  • बलराम ने
  • नंद ने
  • कृष्ण ने
  • गोपों की टोली ने मिलकर
पूरी कथा पढ़िए — बलराम का हिस्सा

कृष्ण-लीला में बलराम अक्सर पीछे छूट जाते हैं, पर यह कांड ज़्यादातर उन्हीं का है — दो असुर, दोनों उनके हाथों।

हरिवंश में इस वध का वर्णन सीधा और शारीरिक है: टाँगें पकड़ना, घुमाना, पेड़ पर मारना।

विष्णु पुराण में भी लगभग यही तरीक़ा है, यानी यह ब्योरा एक ग्रंथ की अपनी कल्पना नहीं है।

क्या हुआ?

प्रलंब पकड़ा कैसे गया?

  • कृष्ण ने उसे पहले ही पहचान लिया था और रोक दिया
  • गोपियों ने उसे पहचान लिया
  • उसने ख़ुद अपना रूप दिखा दिया
  • खेल में वह बलराम को पीठ पर लेकर टोली से दूर भागता चला गया, और बलराम को समझ आ गया कि नीचे जो है वह लड़का नहीं
पूरी कथा पढ़िए — खेल के भीतर छिपा शिकार

विष्णु पुराण और महाभारत, दोनों में प्रलंब का वध बलराम के हाथों बताया गया है। भागवत के दसवें स्कंध का अठारहवाँ अध्याय भी इसी को समर्पित है।

दाँव चालाक था — हारने वाला जीतने वाले को पीठ पर बिठाता है, यानी शिकार ख़ुद अपने आप शिकारी की पीठ पर चढ़ जाता।

पकड़ा वह इसलिए गया कि वह रुका नहीं। भागना ही उसकी ग़लती थी।

पहेली

मैं किसी हथियार से नहीं मरी, किसी मंत्र से नहीं बुझी। मुझे बस पी लिया गया। मैं क्या हूँ?

  • वन की आग
  • यमुना का ज़हर
  • पूतना का विष
  • इंद्र की वर्षा
पूरी कथा पढ़िए — आग निगलने वाला दृश्य

भागवत पुराण के दसवें स्कंध में यह प्रसंग दो बार जैसा आता है — एक बार सत्रहवें अध्याय में, और फिर उन्नीसवें में मुंजावन वाली आग के रूप में।

दृश्य का ढंग बाक़ी लड़ाइयों से अलग है: कोई टक्कर नहीं, कोई हथियार नहीं। बच्चे आँखें बंद करते हैं और खोलते हैं तो सब शांत है।

हरिवंश में यह आग निगलने वाला ब्योरा इस जाँच में नहीं मिला, इसलिए इसे हर ग्रंथ की बात मानकर नहीं चलना चाहिए।

तथ्य

आग से गायों और बच्चों को किसने बचाया?

  • बलराम ने
  • आग अपने आप बुझ गई
  • नंद और गोपों ने मिलकर
  • कृष्ण ने
पूरी कथा पढ़िए — किसका कांड, और किसका क्षण

इस पूरे हिस्से को अक्सर "बलराम का कांड" कहा जाता है, और गिनती के हिसाब से बात सही भी है — धेनुक और प्रलंब, दोनों उनके।

पर जिस क्षण पर सबकी जान टिकी थी, वह कृष्ण का है। नाम बड़े भाई का, और सबसे बड़ा काम छोटे भाई का।

दोनों भाइयों का यही बँटवारा आगे भी चलता है — बलराम के पास बल, कृष्ण के पास वह चीज़ जिसका कोई नाम नहीं।

किसने कहा?

"तो चलो।" — तालवन की ओर बढ़ते हुए यह किसने कहा?

  • नंद ने
  • कृष्ण ने
  • बलराम ने
  • गोपों के मुखिया ने
पूरी कथा पढ़िए — दो शब्दों में तय हुआ

इस कांड की शुरुआत किसी योजना से नहीं होती — लड़के फल चाहते हैं, और बड़ा भाई उठ खड़ा होता है।

बलराम का चरित्र इसी तरह बनता है: कम बोलना, सीधा काम।

आगे प्रलंब वाले प्रसंग में भी वही ढंग दिखता है — पहचानते ही एक मुक्का, बात ख़त्म।

ऐसा क्यों?

लड़के तालवन गए ही क्यों, जब सब जानते थे कि वहाँ ख़तरा है?

  • क्योंकि वहाँ ताड़ के फल लदे पड़े थे और कोई उन्हें तोड़ नहीं पाता था
  • क्योंकि उन्हें धेनुक से बदला लेना था
  • क्योंकि कंस ने उन्हें भेजा था
  • क्योंकि गायें उधर चली गई थीं
पूरी कथा पढ़िए — छोटी वजह, बड़ा नतीजा

कथा यहाँ किसी बड़े उद्देश्य का दावा नहीं करती। लड़के फल खाना चाहते थे।

यही सादगी इन प्रसंगों को बाक़ी महाकाव्य से अलग करती है — यहाँ लड़ाइयाँ राज्य के लिए नहीं, चरागाह और फल के लिए होती हैं।

नतीजा फिर भी बड़ा निकलता है: एक पूरा वन गोकुल के इस्तेमाल में लौट आता है।

तथ्य

भागवत पुराण के किस स्कंध में ये सारे प्रसंग आते हैं?

  • सातवें
  • बारहवें
  • दसवें
  • नौवें
पूरी कथा पढ़िए — एक ही स्कंध, कई कथाएँ

भागवत का दसवाँ स्कंध अपने आप में एक पूरा ग्रंथ जैसा है — नब्बे अध्याय, और कृष्ण की लगभग पूरी कथा उसी में।

इस कांड का गुच्छा वहाँ क्रम से पड़ा है: धेनुक, कालिया, वन की आग, प्रलंब, और फिर मुंजावन की आग।

इसी वजह से इन प्रसंगों को अलग-अलग कथाओं के बजाय एक ही सिलसिले की कड़ियाँ मानना ज़्यादा ठीक है।

सही क्रम

इस कांड की घटनाओं का सही क्रम क्या है?

  • धेनुक → प्रलंब → वन की आग
  • प्रलंब → वन की आग → धेनुक
  • धेनुक → वन की आग → प्रलंब
  • वन की आग → धेनुक → प्रलंब
पूरी कथा पढ़िए — दो आगें, एक जैसी

गड़बड़ी की गुंजाइश असली है — भागवत में आग का प्रसंग एक बार सत्रहवें अध्याय में आता है और दूसरी बार उन्नीसवें में, मुंजावन के नाम से।

इसी वजह से अलग-अलग सुनाने वालों में क्रम थोड़ा बदल जाता है।

यहाँ जो क्रम लिया गया है, वह भागवत के अध्यायों के हिसाब से है: धेनुक (१५), आग (१७), प्रलंब (१८), और फिर मुंजावन (१९)।

ऐसा क्यों?

इस कांड को "बलराम का कांड" क्यों कहा जाता है, जबकि सबसे बड़ा काम कृष्ण करते हैं?

  • क्योंकि इस हिस्से के दोनों असुर
  • क्योंकि बलराम ने आग भी बुझाई
  • क्योंकि कृष्ण इस कांड में मौजूद ही नहीं
  • क्योंकि बलराम बड़े भाई हैं और नाम उन्हीं का चलता है
पूरी कथा पढ़िए — दो भाइयों का बँटवारा

इस कांड को पढ़ते हुए यह साफ़ दिखता है कि कथा दोनों भाइयों को अलग-अलग तरह की ताक़त देती है।

बलराम जो करते हैं, वह देखा और समझा जा सकता है — पकड़ना, घुमाना, मारना।

कृष्ण जो करते हैं, उसका कोई तरीक़ा नहीं बताया जाता। बच्चे आँखें बंद करते हैं, और खोलने पर आग नहीं होती।