
पर्व १
आदि पर्व
एक यज्ञ, जिसमें साँप जल रहे थे — और वहीं यह कथा पहली बार सुनाई गई
कथा की शुरुआत
यह कथा एक यज्ञ में सुनाई गई थी, और वह यज्ञ बदले के लिए किया जा रहा था।
राजा जनमेजय के पिता परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाम के नाग के डसने से हुई थी। बेटे ने बदला लेने के लिए सर्प-सत्र कराया, ऐसा यज्ञ जिसमें मंत्रों के प्रभाव से साँप खिंचकर अग्नि में गिरते जाते थे।
आग जल रही थी। साँप गिर रहे थे। और उसी सभा में व्यास के शिष्य वैशंपायन ने जनमेजय को उनके अपने वंश की कथा सुनानी शुरू की। बहुत बाद में उग्रश्रवा सूत ने वही कथा नैमिषारण्य में ऋषियों को दोबारा सुनाई। इसलिए महाभारत शुरू से ही कथा के भीतर कथा है — कोई किसी को सुना रहा है, और वह स्वयं किसी और से सुनकर आया है। व्यास इसके रचयिता माने जाते हैं, लेकिन वे इसी कथा के भीतर एक पात्र भी हैं।
गंगा की शर्त
कथा पीछे लौटती है, हस्तिनापुर के राजा शांतनु तक। एक दिन गंगा के किनारे उन्होंने एक स्त्री को देखा और विवाह का प्रस्ताव रखा। वह मान गईं, लेकिन एक शर्त पर — शांतनु उन्हें किसी काम से रोकेंगे नहीं और कभी नहीं पूछेंगे कि वे ऐसा क्यों कर रही हैं। जिस दिन उन्होंने टोका, वह चली जाएँगी। शांतनु मान गए।
उनका पहला पुत्र हुआ। गंगा उसे नदी तक ले गईं और जल में बहा दिया। शांतनु कुछ नहीं बोले। दूसरे के साथ भी यही हुआ। फिर तीसरे, चौथे, और सातवें तक। हर बार शांतनु चुप रहे, क्योंकि उन्हें पता था कि रोकते ही गंगा चली जाएँगी। लेकिन आठवें पुत्र के समय वे स्वयं को रोक नहीं पाए।
तब गंगा ने कारण बताया। वे आठों बालक वसु थे, जिन्हें शाप के कारण मनुष्य रूप में जन्म लेना पड़ा था। सात को जन्म लेते ही उस जीवन से मुक्ति मिल गई। आठवें को लंबे समय तक मनुष्य के रूप में जीना था। वही बालक देवव्रत था, जो आगे भीष्म कहलाया।
भीष्म की प्रतिज्ञा
बरसों बाद शांतनु को सत्यवती से प्रेम हुआ। सत्यवती के पिता ने शर्त रखी कि उनकी बेटी का पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा। शांतनु के पास पहले से देवव्रत जैसा योग्य उत्तराधिकारी था, इसलिए वे कुछ कहे बिना लौट आए।
देवव्रत ने पिता की उदासी का कारण जाना और स्वयं सत्यवती के पिता के पास पहुँचे। उन्होंने कहा कि वे सिंहासन पर कभी दावा नहीं करेंगे। जवाब मिला — तुम्हारे पुत्र तो कर सकते हैं। तब देवव्रत ने उससे भी बड़ी प्रतिज्ञा की — वे जीवन भर विवाह नहीं करेंगे और संतान नहीं होगी। इसी भीषण प्रतिज्ञा के कारण वे भीष्म कहलाए। शांतनु ने प्रसन्न होकर उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान दिया — वे अपनी मृत्यु का समय स्वयं चुन सकेंगे।
व्यास के तीन पुत्र
सत्यवती के दोनों पुत्र आगे राजा बने, लेकिन दोनों बिना संतान के मर गए। वंश रुकने लगा तो सत्यवती ने अपना एक पुराना रहस्य बताया — विवाह से पहले ऋषि पराशर से उनका एक पुत्र हुआ था, व्यास। व्यास को बुलाया गया। नियोग से अंबिका के पुत्र धृतराष्ट्र, अंबालिका के पुत्र पांडु और एक दासी के पुत्र विदुर जन्मे। धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे, इसलिए पांडु राजा बने। विदुर राजा नहीं बन सकते थे, लेकिन आगे बार-बार वही सबसे स्पष्ट और कठोर सलाह देते दिखाई देंगे।
फिर पांडु के जीवन ने मोड़ लिया। शिकार के दौरान उन्होंने एक हिरन पर बाण चलाया। वह हिरन वास्तव में किंदम ऋषि थे, जो अपनी पत्नी के साथ मृग-रूप में थे। मरते समय ऋषि ने शाप दिया कि जिस दिन पांडु अपनी पत्नी के साथ दांपत्य संबंध बनाएँगे, उसी क्षण उनकी मृत्यु हो जाएगी। पांडु ने राजपाट छोड़ दिया और वन चले गए।
लेकिन कुंती के पास दुर्वासा ऋषि का दिया एक मंत्र था, जिससे वे किसी देवता का आह्वान कर सकती थीं। विवाह से पहले, केवल यह देखने के लिए कि मंत्र सचमुच काम करता है या नहीं, उन्होंने सूर्य का आह्वान कर लिया था। उनसे एक पुत्र हुआ, जन्म से कवच और कुंडल पहने हुए। अविवाहित कुंती भयभीत हो गईं और बालक को एक पेटी में रखकर नदी में बहा दिया। अधिरथ और राधा नाम के सूत दंपति ने उसे पाला। वही बालक आगे कर्ण कहलाया।
वन में उसी मंत्र की सहायता से पांडु को संतान मिली। धर्म से युधिष्ठिर, वायु से भीम और इंद्र से अर्जुन जन्मे। माद्री ने अश्विनीकुमारों का आह्वान किया और उनसे नकुल तथा सहदेव हुए। पाँचों भाई वहीं बड़े होने लगे। फिर पांडु का शाप पूरा हुआ और उनकी मृत्यु हो गई। पाँचों बालकों को लेकर कुंती हस्तिनापुर लौटीं। वहीं से पांडव और धृतराष्ट्र के पुत्र एक साथ बड़े हुए, और यहीं दुर्योधन की असुरक्षा भी बढ़ती गई, क्योंकि युधिष्ठिर उम्र में बड़े थे और राज्य पर उनका दावा बनता था।
द्रोण और द्रुपद
राजकुमारों की शिक्षा द्रोणाचार्य के हाथ में आई। द्रोण की अपनी कहानी भी अधूरे वचन से शुरू हुई थी। बचपन में वे और पांचाल के राजकुमार द्रुपद साथ पढ़े थे। द्रुपद ने कहा था कि राजा बनने पर आधा राज्य द्रोण का होगा। बरसों बाद द्रोण निर्धन अवस्था में उनके पास पहुँचे, तो द्रुपद ने पुरानी मित्रता मानने से इनकार कर दिया। द्रोण लौट आए, लेकिन अपमान नहीं भूले।
एकलव्य का अंगूठा
उसी समय अर्जुन द्रोण के सबसे प्रतिभाशाली शिष्यों में उभरे। द्रोण ने उन्हें महान धनुर्धर बनाने का वचन दिया। फिर एक निषाद युवक, एकलव्य, उनसे शिक्षा माँगने आया। द्रोण ने उसे शिष्य बनाने से इनकार कर दिया। एकलव्य ने जंगल में द्रोण की मिट्टी की प्रतिमा बनाई और स्वयं अभ्यास करता रहा। जब द्रोण ने उसकी असाधारण धनुर्विद्या देखी, तो गुरु-दक्षिणा में दाहिने हाथ का अंगूठा माँग लिया। एकलव्य ने दे दिया, और उसके बाद वह पहले की तरह धनुष नहीं चला सका।
पाठ यह नहीं कहता कि द्रोण ने ठीक किया। वह सिर्फ़ यह दर्ज करता है कि उन्होंने ऐसा किया, और यह भी कि वादा अर्जुन से किया गया था।
कर्ण को अंगराज बनाया गया
राजकुमारों की सार्वजनिक परीक्षा में अर्जुन सबसे आगे दिखाई दिए। तभी कर्ण मैदान में उतरे और अर्जुन को चुनौती दी। उनके कुल पर प्रश्न उठा, क्योंकि राजकुमार से द्वंद्व के लिए राजकीय दर्जा चाहिए था। उसी क्षण दुर्योधन ने कर्ण को अंग का राजा घोषित कर दिया। कर्ण ने पूछा कि बदले में क्या चाहिए। दुर्योधन ने केवल मित्रता माँगी। यह मित्रता आगे युद्ध के अंतिम दिनों तक कर्ण को उसी पक्ष में बाँधे रखेगी।
शिक्षा पूरी होने पर द्रोण ने गुरु-दक्षिणा माँगी — द्रुपद को बंदी बनाकर लाओ। अर्जुन ने द्रुपद को परास्त कर द्रोण के सामने ला खड़ा किया। द्रोण ने आधा राज्य लेकर कहा कि अब दोनों बराबर हैं, अब मित्रता हो सकती है। द्रुपद लौटे, लेकिन अपमान साथ ले गए। उन्होंने यज्ञ कराया, ताकि ऐसा पुत्र मिले जो द्रोण का वध कर सके। उसी यज्ञ से धृष्टद्युम्न और द्रौपदी के जन्म की कथा आती है।
लाक्षागृह
अब दुर्योधन ने पांडवों को रास्ते से हटाने की योजना बनाई। वारणावत में उनके लिए एक भव्य भवन बनवाया गया, देखने में सुंदर, पर लाख, घी और दूसरी ज्वलनशील चीज़ों से बना, इसी से इसे लाक्षागृह कहा गया। विदुर ने युधिष्ठिर को संकेतों में सावधान कर दिया। पांडवों ने गुप्त रूप से सुरंग खुदवाई। एक रात भवन में आग लगी और पांडव कुंती के साथ सुरंग से निकल गए। उसी रात भीतर सो रही एक निषाद स्त्री, उसके पाँच बेटे और भवन का रखवाला पुरोचन भी उस आग में मारे गए। सुबह जले हुए शव देखकर सबने मान लिया कि पांडव मर चुके हैं।
दुनिया के लिए मृत पांडव अब भेस बदलकर जंगलों में घूम रहे थे। वहीं राक्षस हिडिंब ने उन पर हमला किया, और भीम ने उसे मार दिया। हिडिंब की बहन हिडिंबा भीम से प्रभावित हुईं। कुंती की अनुमति से दोनों का विवाह हुआ और उनका पुत्र घटोत्कच जन्मा। वह माँ के साथ रह गया, और भीम से वचन लेकर गया कि जब भी याद करेंगे, वह आ जाएगा। बहुत साल बाद, कुरुक्षेत्र की एक रात, उन्हें याद करना पड़ेगा।
द्रौपदी का स्वयंवर
कुछ समय बाद पांचाल में द्रौपदी का स्वयंवर हुआ। लक्ष्य कठिन था — ऊपर घूमती मछली और नीचे पानी। निशाना प्रतिबिंब देखकर साधना था। बड़े-बड़े राजा असफल हुए। फिर ब्राह्मण वेश में अर्जुन उठे और लक्ष्य भेद दिया। पांडव द्रौपदी को लेकर अपने निवास पर पहुँचे। कुंती ने बिना देखे कहा, "जो लाए हो, आपस में बाँट लो।" जब उन्होंने देखा कि पुत्र क्या लेकर आए हैं, तब तक शब्द निकल चुके थे। द्रुपद ने भी यही पूछा कि एक स्त्री पाँच भाइयों की पत्नी कैसे हो सकती है। आगे व्यास ने इस विवाह को उचित ठहराया, और द्रौपदी पाँचों पांडवों की पत्नी बनीं।
यह पाठ का सबसे असामान्य प्रसंग है, और महाभारत इसे छिपाता नहीं। वह इसे कहता है, और आगे कई जगह इस पर सवाल भी उठाता है।
इंद्रप्रस्थ
पांडव जीवित हैं, यह सामने आने के बाद हस्तिनापुर में सत्ता का प्रश्न फिर खड़ा हुआ। अंततः धृतराष्ट्र ने राज्य बाँट दिया। पांडवों को खांडवप्रस्थ मिला — उजाड़ और कठिन भूमि। उन्होंने उसे बसाकर इंद्रप्रस्थ बनाया।
भाइयों ने आपस में एक नियम तय किया था: जब एक भाई द्रौपदी के साथ हो, तब कोई दूसरा भीतर नहीं आएगा। तोड़ने वाले को बारह साल का वनवास। एक दिन अर्जुन को हथियार चाहिए था, और वे उसी कमरे में चले गए जहाँ युधिष्ठिर और द्रौपदी थे। वजह अच्छी थी, पर नियम नियम था। अर्जुन ने स्वयं बारह वर्ष का तीर्थ-वास स्वीकार किया। इसी यात्रा में उनके विवाह उलूपी, चित्रांगदा और बाद में कृष्ण की बहन सुभद्रा से हुए। चित्रांगदा से बभ्रुवाहन जन्मे, और सुभद्रा से अभिमन्यु — वही अभिमन्यु जो आगे कुरुक्षेत्र में कथा के सबसे निर्णायक प्रसंगों में से एक का केंद्र बनेगा।
इंद्रप्रस्थ लौटने के बाद एक और घटना हुई, जो अगले पर्व की शुरुआत समझने के लिए ज़रूरी है। अग्नि की सहायता के लिए कृष्ण और अर्जुन ने खांडव वन जलाया। उस अग्नि से बचने वालों में मय दानव भी था। अर्जुन ने उसे जीवित रहने दिया। कृतज्ञ मय ने कहा कि वह बदले में पांडवों के लिए कुछ बनाएगा — वही आगे इंद्रप्रस्थ की प्रसिद्ध सभा बनाएगा।
यहीं से कृष्ण भी कथा के केंद्र में स्थायी रूप से दिखाई देने लगते हैं। वे कुंती की ओर से पांडवों के संबंधी हैं, लेकिन उससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि आगे हर बड़े मोड़ पर वे किसी न किसी निर्णय के पास खड़े मिलेंगे — कभी सारथी, कभी दूत, कभी सलाहकार और कभी वह व्यक्ति जो बाकी सबके सामने छिपा हुआ रास्ता देख लेता है।
टिप्पणी: शांतनु और गंगा, आठ वसु, भीष्म की प्रतिज्ञा और इच्छा-मृत्यु का वरदान, व्यास से तीन पुत्र, एकलव्य का अंगूठा, लाक्षागृह, द्रौपदी का स्वयंवर और खांडव-दहन — सब व्यास रचित महाभारत के आदि पर्व में हैं। पर गणेश का इस कथा को लिखना आलोचनात्मक संस्करण में नहीं मिलता। व्यास बोलते गए और गणेश लिखते गए, इस शर्त के साथ कि क़लम रुकेगी नहीं — यह प्रसंग बाद की परंपरा से आया है और आज सबसे ज़्यादा दोहराई जाने वाली बातों में एक है। द्रौपदी का पाँच भाइयों की पत्नी होना पाठ में है, और पाठ ख़ुद इस पर कई जगह सवाल उठाता है — यह छिपाया नहीं गया है। एकलव्य के प्रसंग में पाठ द्रोण का बचाव नहीं करता; वह सिर्फ़ दर्ज करता है कि क्या हुआ। स्वयंवर की शर्त का वह विस्तृत रूप — नीचे पानी में परछाईं देखकर ऊपर घूमती मछली की आँख बेधना — बाद की रीटेलिंग परंपराओं में सबसे प्रसिद्ध है; आलोचनात्मक संस्करण उस यंत्र और लक्ष्य का वर्णन ज़्यादा सादे ढंग से करता है।
स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), आदि पर्व