
पर्व १३
अनुशासन पर्व
उपदेश चलता रहा, और फिर सूरज उत्तर की ओर मुड़ा।
दान का उपदेश
यह पर्व वहीं से चलता है जहाँ पिछला रुका था। वही मैदान, वही शरशय्या, वही दो आदमी, एक पूछता हुआ, एक बताता हुआ। यहाँ ज़्यादातर बात दान पर है, कौन-सा दान किसे, कब, और क्यों।
भंगाश्वन की कथा
इसी पर्व में एक अजीब कथा आती है। राजा भंगाश्वन ने एक बड़ा यज्ञ किया, उससे इंद्र नाराज़ हो गए और मौक़े की ताक में रहने लगे। एक दिन राजा शिकार पर निकले और रास्ता भूल गए, प्यास लगी, और वे एक झील में उतरे। जब वे बाहर निकले, वे स्त्री थे। पुरुष के रूप में उनके सौ पुत्र थे, अब स्त्री के रूप में भी उन्होंने सौ पुत्रों को जन्म दिया। इंद्र ने दोनों दलों में फूट डाल दी, और वे आपस में लड़कर मारे गए। आख़िर इंद्र सामने आए और उन्होंने राजा को फिर पुरुष बन जाने का अवसर दिया। उन्होंने मना कर दिया, उनसे पूछा गया क्यों। उन्होंने दो कारण बताए, पहला, कि जिन बच्चों को उन्होंने स्त्री के रूप में जन्म दिया था, उनसे उनका लगाव अधिक है, दूसरा, कि स्त्री के रूप में मिलन का जो सुख उन्होंने जाना, वह पुरुष के रूप में नहीं था। पाठ इसे बिना टिप्पणी के दर्ज करता है।
विष्णुसहस्रनाम
इसी पर्व में युधिष्ठिर पूछते हैं कि सबसे बड़ा सहारा क्या है। भीष्म उत्तर में विष्णु के एक हज़ार नाम सुनाते हैं, यही विष्णुसहस्रनाम है। वह महाभारत से अलग कोई ग्रंथ नहीं है, वह अनुशासन पर्व के भीतर है, इसी बातचीत में, उसे अलग से छापना और रोज़ पढ़ना बाद की भक्ति-परंपरा से आया है।
उत्तरायण
आख़िर सूरज उत्तर की ओर मुड़ा। भीष्म ने उपदेश पूरा किया, फिर उन्होंने विदा ली, और शरीर छोड़ दिया। वे तब तक रुके रहे थे क्योंकि उनके पिता के वरदान से उन्हें अपनी मृत्यु का समय चुनने की शक्ति मिली थी। गंगा के पुत्र, जिन्होंने विवाह नहीं किया, जिन्होंने राज्य नहीं लिया, और जो अंत तक उसी हस्तिनापुर के लिए लड़े जिसे वे बचाना चाहते थे, उस दिन चले गए।
टिप्पणी: दान पर उपदेश, भंगाश्वन की कथा, विष्णुसहस्रनाम और भीष्म का उत्तरायण में देह त्यागना — सब व्यास रचित महाभारत के अनुशासन पर्व में हैं। विष्णुसहस्रनाम इसी पर्व के भीतर है — वह अलग ग्रंथ नहीं है; अलग से पढ़ा जाना बाद की भक्ति-परंपरा से आया, ठीक वैसे ही जैसे गीता के साथ हुआ।
स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), अनुशासन पर्व