
पर्व १५
आश्रमवासिक पर्व
पंद्रह साल बाद बूढ़े लोग जंगल चले गए, और एक रात मरे हुए लौट आए।
वन की ओर
पंद्रह साल बीत गए। धृतराष्ट्र और गांधारी हस्तिनापुर में ही रहते रहे, उन्हीं लोगों के साथ जिन्होंने उनके सौ बेटों को मारा था, हर सुबह उन्हीं चेहरों को देखते हुए। भीम उन्हें भूलने नहीं देते थे, वे बीच-बीच में कुछ ऐसा कह देते जिससे धृतराष्ट्र को याद आ जाता कि किसने किसे मारा, जैसे पुराना ज़ख़्म कभी पूरी तरह भरने ही न दिया जाए।
एक दिन धृतराष्ट्र ने कहा कि अब वे वन जाएँगे। गांधारी साथ चलीं। और कुंती भी। किसी ने उनसे नहीं कहा था, उनके अपने बेटे राज कर रहे थे, महल में उनके लिए हर सुविधा थी, पर उन्होंने ख़ुद यह चुना, उस अंधे दंपति के साथ रहने के लिए जिनके पुत्र मारे जा चुके थे, मानो अपनी बाक़ी उम्र किसी और के शोक में बिताना चाहती हों। युधिष्ठिर ने रोका, बहुत समझाया, वे नहीं रुकीं।
विदुर का अंत
विदुर भी राजमहल का जीवन छोड़कर वन में कठोर तपस्या करने लगे। कुछ समय बाद युधिष्ठिर उनसे मिलने गए। विदुर बहुत क्षीण हो चुके थे, वे युधिष्ठिर को देखते रहे, बिना बोले, जैसे शब्दों की अब कोई ज़रूरत न बची हो। फिर उन्होंने वहीं शरीर छोड़ दिया। कथा कहती है कि उनका तेज युधिष्ठिर में समा गया, क्योंकि दोनों को धर्म से जोड़ा गया है, मानो दो धाराएँ अंत में एक हो गई हों।
एक रात की भेंट
कुछ समय बाद पांडव वन में उनसे मिलने गए। व्यास वहीं थे। उन्होंने एक रात के लिए मरे हुओं को बुला दिया, एक असाधारण काम, जो शायद ही कभी दोहराया गया। उस रात नदी से वे सब निकल आए, भीष्म, द्रोण, कर्ण, अभिमन्यु, द्रौपदी के पाँच बेटे, दुर्योधन और उसके भाई, जो कल तक एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे थे। कोई झगड़ा नहीं हुआ, कोई पक्ष नहीं था, सब अपनों से मिले, बात की, पुरानी बातें कीं, हँसे भी, और सुबह होने से पहले लौट गए। यह पूरे महाभारत का सबसे अजीब और सबसे कोमल दृश्य है, युद्ध के बाद की एक रात जिसमें कोई युद्ध नहीं था।
जंगल की आग
दो साल और बीते। एक दिन जंगल में आग लगी, तेज़ी से फैलती हुई। संजय उनके साथ थे। धृतराष्ट्र ने उनसे कहा कि वे निकल जाएँ, ख़ुद को बचा लें। संजय निकल गए, और वही एक आदमी हैं जो उस आग से बचकर यह बता पाए कि वहाँ क्या हुआ था। धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती, तीनों उसी आग में मारे गए। उन्होंने भागने की कोशिश नहीं की, जैसे यह अंत भी उन्होंने ख़ुद ही चुना हो।
टिप्पणी: धृतराष्ट्र और गांधारी का वन जाना, कुंती का अपनी मर्ज़ी से साथ जाना, विदुर का देह त्यागना, व्यास का मरे हुओं को एक रात के लिए बुलाना, तीनों का जंगल की आग में मारा जाना और संजय का उसी आग से बच निकलना — सब व्यास रचित महाभारत के आश्रमवासिक पर्व में हैं। कुंती का जाना पाठ में उनका अपना निर्णय है, किसी का कहा हुआ नहीं — और यह इस पर्व की सबसे कम दोहराई जाने वाली बात है।
स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), आश्रमवासिक पर्व