पर्व १४

आश्वमेधिक पर्व

एक घोड़ा छोड़ा गया, और अंत में एक नेवले ने पूरे यज्ञ को छोटा बता दिया।

यज्ञ का निर्णय

राज्य मिल चुका था, उपदेश हो चुका था, और युधिष्ठिर फिर भी शोक में थे। व्यास और कृष्ण ने कहा कि अश्वमेध यज्ञ कीजिए, उन्होंने यही रास्ता बताया।

अनुगीता

उससे पहले एक और बात हुई। अर्जुन ने कृष्ण से कहा कि युद्ध से पहले आपने जो कहा था, वह अब ठीक से याद नहीं, फिर से कह दीजिए। कृष्ण ने कहा कि वह बात उसी क्षण की थी और ज्यों की त्यों नहीं दोहराई जा सकती। फिर उन्होंने वही विषय दूसरी तरह से समझाया। यह अनुगीता है, गीता की नक़ल नहीं, बल्कि यह स्वीकार कि कुछ बातें अपने क्षण में ही पूरी होती हैं।

परीक्षित का जन्म

उत्तरा का बच्चा मरा हुआ जन्मा, वही, जिस पर गर्भ में अश्वत्थामा का अस्त्र पड़ा था। कृष्ण ने उसे जीवित किया, उसका नाम परीक्षित रखा गया। पूरे कुल में अगली पीढ़ी का यही एक बच्चा बचा था, इसी के बेटे जनमेजय के यज्ञ में यह कथा सुनाई जा रही है।

घोड़े की यात्रा

फिर घोड़ा छोड़ा गया। अश्वमेध में घोड़ा स्वतंत्र छोड़ा जाता था, जिन राज्यों से वह बिना रोके निकल जाता, वे युधिष्ठिर की सर्वोच्चता स्वीकार करते माने जाते, जो उसे रोकता, उससे युद्ध होता। अर्जुन सेना लेकर घोड़े के पीछे चले, कई जगह लड़ाइयाँ हुईं। घोड़ा मणिपुर पहुँचा, जहाँ अर्जुन का अपना बेटा बभ्रुवाहन राजा था, चित्रांगदा से। वह जानता था कि अर्जुन उसके पिता हैं, वह ब्राह्मणों को साथ लेकर, भेंट लेकर, सिर झुकाने बाहर आया।

अर्जुन को यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कहा कि यह क्षत्रिय का व्यवहार नहीं है, यज्ञ का घोड़ा उसकी भूमि में आया है, और वह लड़ने के बजाय भेंट लेकर खड़ा है। बभ्रुवाहन चुप रहा। तब उलूपी ज़मीन फाड़कर सामने आईं, नाग-कन्या, अर्जुन की दूसरी पत्नी, बभ्रुवाहन की सौतेली माँ। उन्होंने बभ्रुवाहन से कहा कि लड़ो। उनके पास एक कारण था, जो वहाँ खड़े किसी और को नहीं मालूम था। वसुओं ने अर्जुन को शाप दिया था, इसलिए कि उन्होंने भीष्म को शिखंडी की आड़ लेकर गिराया था, शाप यह था कि अर्जुन अपने ही पुत्र के हाथों गिरेंगे, और तभी वह ऋण उतरेगा। उलूपी उसी शाप को पूरा करा रही थीं, ताकि वह वहीं ख़त्म हो जाए।

लड़ाई हुई, और अर्जुन गिर पड़े। बभ्रुवाहन भी वहीं गिर पड़ा। फिर उलूपी ने नाग-लोक से मृतसंजीवनी मणि मँगवाई और अर्जुन को जिला दिया। जब अर्जुन ने पूरी बात सुनी, तो वे नाराज़ नहीं हुए।

आधा सोने का नेवला

घोड़ा लौटा, यज्ञ हुआ, बहुत बड़ा दान दिया गया। सब कह रहे थे कि ऐसा यज्ञ पहले नहीं हुआ। तभी एक नेवला आया, उसका आधा शरीर सोने का था। वह यज्ञ-भूमि पर लोटा, और फिर उठकर बोला, यह यज्ञ उस सत्तू के बराबर भी नहीं है जो मैंने एक बार देखा था। फिर उसने बताया।

एक ब्राह्मण का परिवार कई दिन से भूखा था, बहुत मुश्किल से थोड़ा-सा सत्तू जुटा था, और चारों उसे बाँटकर खाने बैठे ही थे कि एक अतिथि आ गया। ब्राह्मण ने अपना हिस्सा दे दिया, अतिथि की भूख नहीं मिटी। फिर पत्नी ने अपना दिया, फिर बेटे ने, फिर बहू ने। चारों का हिस्सा चला गया, और चारों भूखे रह गए। तब अतिथि ने अपना असली रूप दिखाया, वे धर्म थे। उन्होंने चारों को वहीं से स्वर्ग जाने का वर दिया, और चारों उसी समय स्वर्ग चले गए।

नेवले ने कहा कि उसी ज़मीन पर बिखरे सत्तू के कणों में लोटने से उसका आधा शरीर सोने का हो गया। वह इस यज्ञ में इसी उम्मीद से आया था कि बाक़ी आधा भी हो जाएगा। वह नहीं हुआ। यह कथा अश्वमेध पर्व के अंत में आती है, पूरे विशाल यज्ञ के बाद उसका असर यही होता है कि पाठक ठीक वहीं ठिठक जाता है, जहाँ उसे लगा था कि सब पूरा हो गया।

टिप्पणी: अनुगीता, परीक्षित का जन्म और जीवित होना, अश्वमेध का नियम, बभ्रुवाहन का प्रसंग और नेवले की कथा — सब व्यास रचित महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में हैं। अनुगीता में कृष्ण साफ़ कहते हैं कि वे गीता दोहरा नहीं सकते — यह पाठ में है, और यह अपने आप में एक असामान्य बात है। नेवले की कथा पूरे यज्ञ के वर्णन के बाद, सबसे अंत में आती है — और वहाँ वह पूरे पर्व का उत्तर बन जाती है।

स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), आश्वमेधिक पर्व

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

अर्जुन ने कृष्ण से गीता दोबारा सुनाने को कहा। कृष्ण ने क्या किया?

  • उन्होंने कहा कि वह बात उसी क्षण की थी और ज्यों की त्यों नहीं दोहराई जा सकती; फिर उन्होंने दूसरी बातचीत की
  • उन्होंने गीता दोबारा सुना दी
  • उन्होंने मना कर दिया और चुप रहे
  • उन्होंने व्यास से कहने को कहा
पूरी कथा पढ़िए — दूसरी गीता

अर्जुन का कहना था कि युद्ध के मुहाने पर सुनी वह बात उन्हें ठीक से याद नहीं रही।

कृष्ण का उत्तर अपने आप में एक बात कहता है — वह उपदेश उस क्षण से बँधा था, और क्षण लौटता नहीं।

जो उन्होंने फिर कहा, वह अनुगीता है। वह गीता जैसी नहीं है — न उतनी कसी हुई, न उतनी प्रसिद्ध।

यानी महाभारत में कृष्ण और अर्जुन का बड़ा संवाद एक बार नहीं, दो बार होता है। दूसरा लगभग कोई नहीं जानता।

किसका बेटा?

मैं अर्जुन का पुत्र हूँ, और मैंने युद्ध में अपने पिता को मार गिराया। मैं कौन हूँ?

  • अभिमन्यु
  • इरावान
  • बभ्रुवाहन
  • घटोत्कच
पूरी कथा पढ़िए — घोड़े के पीछे मिला बेटा

अश्वमेध का नियम यही था — घोड़ा जहाँ जाए, या तो वह भूमि मान ले, या लड़े।

मणिपुर में रोकने वाला अर्जुन का अपना पुत्र निकला, जिसे उन्होंने वर्षों से नहीं देखा था।

बभ्रुवाहन ने उन्हें मार गिराया। फिर उलूपी नाग-मणि लेकर आईं और अर्जुन जीवित हुए।

महाभारत में पिता-पुत्र का आमना-सामना बार-बार आता है — द्रोण और अश्वत्थामा, कर्ण और वृषसेन, अर्जुन और अभिमन्यु। यह अकेला है जिसमें दोनों बच जाते हैं।

कौन हूँ मैं?

मैं मृत अवस्था में जन्मा था, और कृष्ण ने मुझे जीवन दिया। मुझसे ही वंश आगे चला। मैं कौन हूँ?

  • जनमेजय
  • परीक्षित
  • बभ्रुवाहन
  • अभिमन्यु
पूरी कथा पढ़िए — एक बच्चा, जिस पर सब टिका था

अश्वत्थामा ने ब्रह्मशिर उत्तरा के गर्भ की ओर मोड़ दिया था, और बच्चा मृत अवस्था में जन्मा।

कृष्ण ने उसे जीवित किया। द्रौपदी के पाँचों पुत्र मारे जा चुके थे, इसलिए वंश की एक ही डोर बची थी।

परीक्षित आगे हस्तिनापुर के राजा होते हैं, और उनके पुत्र जनमेजय होते हैं।

और यही घेरा पूरा करता है — जनमेजय के सर्पयज्ञ में ही यह पूरी कथा सुनाई जा रही है।

पहेली

मैं एक जानवर हूँ। मेरा आधा शरीर सोने का था, और मैंने कहा कि यह पूरा यज्ञ एक मुट्ठी सत्तू के बराबर नहीं। मैं कौन हूँ?

  • हरिण
  • घोड़ा
  • उल्लू
  • नेवला
पूरी कथा पढ़िए — मुट्ठी भर सत्तू

नेवले ने बताया कि अकाल में एक ग़रीब परिवार ने अपने हिस्से का सत्तू एक अतिथि को दे दिया था।

उस घर के बचे हुए आटे में लोटने से उसका आधा शरीर सोने का हो गया।

बाक़ी आधा सोने का करने की आशा में वह इस विशाल यज्ञ में आया, यज्ञभूमि में लोटा, और कुछ नहीं हुआ।

महाभारत यह कथा अपने सबसे बड़े राजसी आयोजन के ठीक अंत में रखता है, और उस पर कोई टिप्पणी नहीं करता।

ऐसा क्यों?

युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ क्यों किया?

  • क्योंकि व्यास और कृष्ण ने युद्ध के बाद के उनके शोक का यही रास्ता बताया
  • क्योंकि उन्हें और राज्य चाहिए था
  • क्योंकि परंपरा में हर राजा को यह करना होता था
  • क्योंकि भीष्म ने ऐसा कहा था
पूरी कथा पढ़िए — शोक जो जाता नहीं

शांति और अनुशासन के पूरे उपदेश के बाद भी युधिष्ठिर का मन शांत नहीं हुआ था।

अश्वमेध का रूप विजय का है — घोड़ा छोड़ा जाता है, और जहाँ-जहाँ वह जाता है वह भूमि राजा की मानी जाती है।

पर यहाँ उसका कारण विजय नहीं, प्रायश्चित बताया गया है। जीत चुके आदमी को अपनी जीत से छुटकारा चाहिए।

और अंत में एक नेवला आकर कह जाता है कि यह सब एक ग़रीब घर के एक दिन के दान के बराबर नहीं था।

तथ्य

अश्वमेध यज्ञ में घोड़े के साथ क्या होता था?

  • उसे तुरंत बलि दे दी जाती थी
  • उसे मंदिर में रखा जाता था
  • उसे स्वतंत्र छोड़ दिया जाता था, और वह जहाँ जाता वह भूमि राजा की मानी जाती; रोकने वाले से युद्ध होता
  • उसे राजा स्वयं चलाते थे
पूरी कथा पढ़िए — एक घोड़ा, और उसके पीछे एक सेना

घोड़ा छोड़ दिया जाता था और उसके पीछे सेना चलती थी। घोड़े का रास्ता ही दावे का रास्ता था।

जो राजा घोड़ा रोक ले, उसे लड़ना पड़ता। इसलिए यह यज्ञ जितना धार्मिक था, उतना ही राजनीतिक।

अर्जुन इस यात्रा में कई जगह लड़े — त्रिगर्त, सिंधु, मणिपुर।

सिंधु में उनका सामना जयद्रथ के कुल से हुआ, यानी उसी घर से जिसका राजा वे मार चुके थे।

सही क्रम

आश्वमेधिक पर्व की इन घटनाओं का सही क्रम कौन-सा है?

  • अनुगीता → नेवले का आना → परीक्षित का जन्म → घोड़े की यात्रा
  • अनुगीता → परीक्षित का जन्म → घोड़े की यात्रा → नेवले का आना
  • परीक्षित का जन्म → अनुगीता → घोड़े की यात्रा → नेवले का आना
  • घोड़े की यात्रा → अनुगीता → परीक्षित का जन्म → नेवले का आना
पूरी कथा पढ़िए — जीत के बाद का पर्व

आश्वमेधिक पर्व बाहर से जीत का पर्व लगता है — यज्ञ, घोड़ा, दिग्विजय, दान।

पर इसके दोनों सिरे कुछ और कहते हैं। शुरू में एक आदमी है जिसका शोक नहीं जाता, अंत में एक नेवला है जो पूरे आयोजन को छोटा बता जाता है।

बीच में एक मृत जन्मा बच्चा जीवित होता है, जिस पर पूरा वंश टिका है।

इसके बाद के अंतिम पर्व तेज़ी से छोटे होते जाते हैं, और कथा धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ती है।