पर्व ६

भीष्म पर्व

दस दिन एक बूढ़े आदमी ने युद्ध रोके रखा, और फिर अपने गिरने का तरीक़ा ख़ुद बता दिया

संजय की दृष्टि

धृतराष्ट्र अंधे थे, और युद्ध का पूरा समाचार जानना चाहते थे। व्यास ने उन्हें दृष्टि देने की बात कही। उन्होंने मना कर दिया, उन्होंने कहा कि वे अपने बेटों की मृत्यु अपनी आँखों से नहीं देखना चाहते। तब व्यास ने वह दृष्टि संजय को दे दी। संजय दूर से भी युद्ध में हो रही बातें देख सकते थे, और धृतराष्ट्र को बताते रहते थे। इसीलिए यह पूरा युद्ध हमें संजय की ज़ुबानी मिलता है, कोई देख रहा है और किसी और को बता रहा है, जो देख नहीं सकता।

युधिष्ठिर का आशीर्वाद

पहले दिन दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हुईं। युधिष्ठिर बिना हथियार के कौरव सेना की ओर चल दिए। सब हैरान रह गए। वे भीष्म के पास गए, फिर द्रोण, फिर कृपाचार्य, फिर शल्य के पास, और हर एक से युद्ध लड़ने की अनुमति और आशीर्वाद माँगा। चारों ने आशीर्वाद दिया। लौटते समय युधिष्ठिर ने पूछा कि दूसरी ओर से कोई उनके साथ आना चाहे तो आ जाए, एक आदमी पार आया, युयुत्सु, धृतराष्ट्र का पुत्र, पर एक वैश्य स्त्री से जन्मा। फिर वे लौट आए, और युद्ध शुरू हुआ।

भगवद्गीता

अर्जुन ने कृष्ण से कहा कि रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलिए, मैं देखना चाहता हूँ कि किनसे लड़ना है। रथ बीच में जाकर रुका। अर्जुन ने दोनों ओर देखा। एक तरफ़ भीष्म थे, जिनकी गोद में वे खेले थे। द्रोण थे, जिन्होंने धनुष चलाना सिखाया था। दूसरी तरफ़ चचेरे भाई, मामा, ससुर, दोस्त। उन्होंने गांडीव नीचे रख दिया। उन्होंने कहा कि इस क़ीमत पर उन्हें राज्य नहीं चाहिए।

जो बातचीत इसके बाद हुई, वही भगवद्गीता है। कृष्ण ने पहले यह कहा कि जो भीतर है वह मरता नहीं, शरीर बदलते हैं, वह नहीं बदलता। फिर यह कि हर आदमी के हिस्से का एक काम होता है, और उसे छोड़कर भाग जाना उससे मुक्त होना नहीं है। फिर यह कि काम करना और फल से चिपकना, दोनों एक बात नहीं हैं, करना उसके हाथ में है, नतीजा नहीं। और आख़िर में यह कि युद्ध से हट जाने पर भी अर्जुन का सवाल हल नहीं होता, वे जहाँ खड़े हैं, वहाँ कोई साफ़ रास्ता है ही नहीं, सिर्फ़ यह तय करना है कि किस तरह खड़े रहना है। बात ख़त्म हुई, अर्जुन ने धनुष उठा लिया।

पहला दिन

पहला दिन ही बता गया कि यह क्या होने वाला है। विराट के बेटे उत्तर, वही लड़का जो रथ से कूदकर भागा था और फिर लौटकर अर्जुन का सारथी बना, उसी दिन मारा गया। शाम तक मैदान भर चुका था। भीष्म ने युद्ध शुरू होने से पहले एक शर्त रखी थी, वे रोज़ दस हज़ार मारेंगे, पर पाँचों पांडवों में से किसी को नहीं मारेंगे। वे दोनों बातें निभाते रहे।

दस दिन

भीष्म लड़े, और जैसा लड़े वैसा कोई नहीं लड़ा। हर दिन पांडवों की सेना कटती रही, कोई उनके सामने टिक नहीं पा रहा था। तीसरे दिन अर्जुन ढीले पड़ गए, वे भीष्म पर पूरी ताक़त से नहीं चला पा रहे थे। कृष्ण ने रथ रोका, उतरे, और चक्र उठा लिया। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि वे हथियार नहीं उठाएँगे, वे उसे तोड़ने जा रहे थे। अर्जुन दौड़कर उनके पैरों में गिरे और कहा कि वे लड़ेंगे। कृष्ण लौट आए।

नौवीं रात पांडव हार मानने के क़रीब थे। उस रात वे ख़ुद भीष्म के शिविर में गए और पूछा कि आपको कैसे हराया जा सकता है। भीष्म ने बता दिया। उन्होंने कहा कि वे उस पर हथियार नहीं उठाएँगे जो कभी स्त्री रहा हो, और उन्होंने शिखंडी का नाम लिया। शिखंडी पिछले जन्म में अंबा थीं। बरसों पहले भीष्म काशी की तीन राजकुमारियों को अपने भाई के लिए हरण करके लाए थे, उनमें सबसे बड़ी अंबा ने कहा कि वे किसी और से प्रेम करती हैं, भीष्म ने उन्हें लौटा दिया। पर जिससे वे प्रेम करती थीं, उसने उन्हें स्वीकार नहीं किया, वे किसी और के घर से लौटी थीं। भीष्म ने भी विवाह से मना कर दिया, क्योंकि उनकी प्रतिज्ञा थी। अंबा के पास कोई जगह नहीं बची, उन्होंने भीष्म को अपने जीवन का कारण माना, और तप किया, इसी एक इच्छा के साथ कि वे उनके गिरने का कारण बनें। वे शिखंडी बनकर लौटीं।

अगले दिन अर्जुन ने शिखंडी को आगे किया और उनके पीछे से बाण चलाए। भीष्म ने धनुष नीचे रख दिया।

शरशय्या

भीष्म गिरे, पर ज़मीन तक नहीं पहुँचे, इतने बाण उनके शरीर में थे कि वे बाणों पर ही टिक गए। दोनों सेनाएँ लड़ना छोड़कर आ गईं। उन्होंने पानी माँगा, किसी ने घड़ा लाना चाहा, उन्होंने मना कर दिया। अर्जुन ने धनुष उठाया और ज़मीन में बाण मारा, वहाँ से पानी की धार निकली और सीधे उनके मुँह तक गई।

फिर भीष्म ने कहा कि वे अभी नहीं जाएँगे। उन्हें उनके पिता से वरदान मिला था कि मृत्यु उनकी अपनी मर्ज़ी से होगी, सूर्य अभी दक्षिणायन में था, और वे उत्तरायण की प्रतीक्षा करेंगे। वे उसी शय्या पर पड़े रहे, पूरे युद्ध के दौरान, और उसके बाद भी, बाक़ी युद्ध वे वहीं से सुनते रहे।

टिप्पणी: संजय की दृष्टि, युधिष्ठिर का बिना हथियार जाकर आशीर्वाद माँगना, गीता का उपदेश, भीष्म का दस दिन लड़ना, शिखंडी वाली शर्त और शरशय्या — सब व्यास रचित महाभारत के भीष्म पर्व में हैं। भगवद्गीता इसी पर्व के भीतर है — वह अलग ग्रंथ नहीं है; अलग से छपना और पढ़ा जाना बाद की परंपरा से आया है। भीष्म का ख़ुद अपने हारने का तरीक़ा बता देना भी पाठ में है, और यही इस पर्व का सबसे कड़ा क्षण है।

स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), भीष्म पर्व

अब बताइए — कितना याद रहा?

कौन हूँ मैं?

मैंने पूरा युद्ध देखा, पर एक बार भी लड़ा नहीं। जो कुछ मैंने देखा, वह मैंने एक अंधे राजा को सुनाया। मैं कौन हूँ?

  • विदुर
  • कृपाचार्य
  • संजय
  • युयुत्सु
पूरी कथा पढ़िए — जिसने देखने से मना कर दिया

व्यास पहले धृतराष्ट्र के पास ही गए थे और उन्हें दृष्टि देने की बात कही थी।

धृतराष्ट्र ने मना कर दिया — उन्होंने कहा कि अपने कुल का नाश देखना उनसे नहीं होगा, पर सुन वे लेंगे।

इसलिए दृष्टि संजय को मिली, और महाभारत का पूरा युद्ध एक ही आदमी की ज़ुबानी चलता है।

इसका असर पढ़ने पर भी पड़ता है। हर लड़ाई हमें दूसरे हाथ से मिलती है, और बीच-बीच में धृतराष्ट्र का टोकना सुनाई देता रहता है।

ऐसा क्यों?

अर्जुन ने ऐन युद्ध के मुहाने पर गांडीव रख दिया। पाठ क्या कारण देता है?

  • क्योंकि दोनों ओर उन्हें अपने ही लोग दिखे, और उस क़ीमत पर उन्हें राज्य नहीं चाहिए था
  • क्योंकि उन्हें हार का डर था
  • क्योंकि कृष्ण ने शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी
  • क्योंकि भीष्म सामने थे
पूरी कथा पढ़िए — रथ जहाँ रुका

अर्जुन ने ख़ुद कहा था कि रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलिए, ताकि देख सकें कि लड़ना किनसे है।

यह मामूली बात नहीं। जब तक सेना दूर है, वह सेना है; पास आते ही वह चेहरों में बदल जाती है।

अर्जुन ने वही गिनाया — पितामह, गुरु, मामा, ससुर, बेटे। उनका तर्क यह था कि जीतकर भी बचेगा क्या।

गीता इसी सवाल का उत्तर है, और उत्तर देने वाला वही है जिसने रथ वहाँ लाकर खड़ा किया था।

तथ्य

भगवद्गीता महाभारत में कहाँ आती है?

  • अलग ग्रंथ है, महाभारत का हिस्सा नहीं
  • उद्योग पर्व में
  • शांति पर्व में
  • भीष्म पर्व के भीतर
पूरी कथा पढ़िए — अठारह और अठारह

गीता के अठारह अध्याय हैं, और महाभारत के भी अठारह पर्व। युद्ध भी अठारह दिन चलता है।

श्लोक लगभग सात सौ हैं, और पूरी बातचीत उस समय की है जब दोनों सेनाएँ हथियार उठाए खड़ी हैं।

बीच में अर्जुन ने पूछा कि आप हैं कौन, और उत्तर में उन्हें वह रूप दिखा जिसमें आने वाला समय भी शामिल था — सामने खड़े योद्धा उसमें पहले ही मारे जा चुके थे।

अर्जुन ने वह रूप हटाने को कहा। अंत में कृष्ण ने यह नहीं कहा कि लड़ो ही — उन्होंने कहा कि सब बता दिया, अब जैसा ठीक लगे करो।

क्या हुआ?

युद्ध शुरू होने से पहले युधिष्ठिर हथियार रखकर पैदल कौरव सेना की ओर चल पड़े। फिर क्या हुआ?

  • उन्होंने आख़िरी बार संधि माँगी
  • उन्होंने भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और शल्य से युद्ध की अनुमति और आशीर्वाद माँगा
  • उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया
  • उन्हें बंदी बना लिया गया
पूरी कथा पढ़िए — अपनी ही सेना का डर

अपनी सेना को पहले लगा कि युधिष्ठिर डरकर पक्ष बदलने जा रहे हैं।

उन्होंने हर बुज़ुर्ग से एक ही बात पूछी — आपकी अनुमति के बिना मैं आपसे कैसे लड़ूँ।

चारों ने आशीर्वाद दिया, और हर एक ने यह भी बताया कि वे किस बंधन से उस पक्ष पर खड़े हैं।

लौटते हुए युधिष्ठिर ने खुला न्योता दिया कि सामने से कोई आना चाहे तो आ जाए। एक आदमी सचमुच आया।

किसका बेटा?

मैं धृतराष्ट्र का पुत्र हूँ, पर गांधारी के सौ पुत्रों में मेरा नाम नहीं है। युद्ध से पहले मैं पांडवों की ओर चला गया। मैं कौन हूँ?

  • युयुत्सु
  • विकर्ण
  • दुःशासन
  • विदुर
पूरी कथा पढ़िए — इकलौता जो चला गया

युयुत्सु गांधारी के पुत्र नहीं थे, और सौ भाइयों की गिनती में कभी पूरी तरह शामिल नहीं रहे।

सभा पर्व में द्रौपदी वाले दिन विकर्ण ने आवाज़ उठाई थी, पर वे पक्ष छोड़कर नहीं गए। युयुत्सु गए।

पूरे युद्ध में कौरव पक्ष से पाला बदलने वाला यही एक नाम है, और उसे बदलने का मौक़ा भी सिर्फ़ उस एक घोषणा से मिला।

अंत में इसी का फ़ायदा भी हुआ — युद्ध के बाद धृतराष्ट्र का जीवित बचा पुत्र यही एक था।

ऐसा क्यों?

कृष्ण ने युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी, फिर भी वे रथ का पहिया उठाकर भीष्म की ओर बढ़े। ऐसा क्यों हुआ, और नतीजा क्या रहा?

  • वे प्रतिज्ञा भूल गए थे
  • भीष्म ने उन्हें ललकारा था
  • अर्जुन ढीले पड़ रहे थे और भीष्म को कोई रोक नहीं पा रहा था; अर्जुन ने दौड़कर उन्हें रोक लिया और लड़ने का वचन दिया
  • उन्होंने भीष्म को मार दिया
पूरी कथा पढ़िए — जो प्रतिज्ञा टूटते-टूटते बची

यह एक बार नहीं हुआ। युद्ध के इन दस दिनों में एक से ज़्यादा बार कृष्ण रथ से कूदे।

पहिया रथ का ही था — यानी हथियार भी नहीं, जो हाथ लगा वही। बात इरादे की है, चीज़ की नहीं।

अजीब बात यह है कि भीष्म प्रसन्न हुए। वे कृष्ण के हाथों मृत्यु को सौभाग्य मानते थे, इसलिए उठा हुआ पहिया उनके लिए ख़तरा नहीं था।

रोका अर्जुन ने, और क़ीमत भी उन्होंने ही चुकाई — वचन देकर कि अब ढील नहीं होगी।

किसने कहा?

"शिखंडी को सामने कर दो।" — पांडवों को यह रास्ता किसने बताया?

  • कृष्ण ने
  • शिखंडी ने ख़ुद
  • भीष्म ने ख़ुद
  • द्रोण ने
पूरी कथा पढ़िए — जिसने अपनी हार का नक़्शा दिया

नौ दिन बाद पांडवों के पास कोई रास्ता नहीं बचा था। वे रात में कृष्ण के साथ भीष्म के शिविर में गए।

भीष्म ने टाला नहीं। उन्होंने वही शर्त दोहरा दी जो वे सेनापति बनते समय रख चुके थे — शिखंडी पर शस्त्र नहीं उठाएँगे।

यानी यह भेद कोई नया रहस्य नहीं था। बस किसी ने उसे इस्तेमाल करने की बात अब तक सोची नहीं थी।

युधिष्ठिर उस रात सो नहीं सके। जिससे लड़ना था, जीतने का तरीक़ा भी उसी ने बताया था।

सही क्रम

इन घटनाओं का सही क्रम कौन-सा है?

  • गीता का उपदेश → संजय को दृष्टि मिलना → युधिष्ठिर का आशीर्वाद माँगना → भीष्म का गिरना
  • संजय को दृष्टि मिलना → युधिष्ठिर का आशीर्वाद माँगना → गीता का उपदेश → भीष्म का गिरना
  • संजय को दृष्टि मिलना → भीष्म का गिरना → गीता का उपदेश → युधिष्ठिर का आशीर्वाद माँगना
  • संजय को दृष्टि मिलना → गीता का उपदेश → युधिष्ठिर का आशीर्वाद माँगना → भीष्म का गिरना
पूरी कथा पढ़िए — एक दिन जो बहुत लंबा है

गीता, युधिष्ठिर का पैदल जाना और युयुत्सु का पाला बदलना — यह सब पहले दिन के शंख बजने से पहले का है।

पाठ में यह हिस्सा इतना लंबा है कि पढ़ते हुए भूल जाता है कि सेनाएँ अब भी खड़ी इंतज़ार कर रही हैं।

इसके बाद दस दिन बहुत तेज़ी से बीतते हैं, और उनका ब्यौरा गीता से कम जगह लेता है।

भीष्म पर्व यहीं ख़त्म हो जाता है — उनके गिरने पर, मरने पर नहीं।

तथ्य

भीष्म गिरकर ज़मीन तक क्यों नहीं पहुँचे?

  • उनके शरीर में इतने बाण थे कि वे उन्हीं पर टिक गए
  • सैनिकों ने उन्हें थाम लिया
  • वे रथ पर ही रह गए
  • अर्जुन ने उन्हें उठा लिया
पूरी कथा पढ़िए — तकिया और पानी

भीष्म ने सिर के नीचे सहारा माँगा। दुर्योधन मुलायम तकिए ले आया, जिन्हें उन्होंने लौटा दिया।

तब अर्जुन ने तीन बाण ज़मीन में गाड़कर उनका सिर टिकाया, और भीष्म ने कहा कि योद्धा का तकिया यही होता है।

फिर उन्होंने पानी माँगा। अर्जुन ने ज़मीन में बाण मारा और वहीं से जल निकल आया।

दोनों काम उसी ने किए जिसने उन्हें गिराया था, और पाठ इस पर कोई टिप्पणी नहीं करता।

पहेली

मैं एक वरदान हूँ, जो एक पिता ने अपने बेटे को दिया था। इसी वजह से वह गिरने के बाद भी कई दिन जीवित रहा। मैं क्या हूँ?

  • अजेय होने का वरदान
  • कवच का वरदान
  • इच्छा-मृत्यु का वरदान
  • अमर होने का वरदान
पूरी कथा पढ़िए — जो प्रतिज्ञा का इनाम था

यह वरदान शांतनु ने तब दिया था जब भीष्म ने उनके विवाह के लिए राजगद्दी और संतान, दोनों छोड़ दी थीं।

इसका मतलब यह नहीं था कि वे मरेंगे नहीं, और न ही यह कि मृत्यु अपने आप रुक जाएगी। मतलब सिर्फ़ इतना था कि कब मरना है, यह वे तय करेंगे।

शरशय्या पर पड़े-पड़े उन्होंने उत्तरायण की प्रतीक्षा करना तय किया, और तब तक बाणों पर पड़े रहे।

यानी जिस वरदान से उन्हें सुविधा मिलनी थी, उसी ने उनका अंत सबसे लंबा बना दिया।

व्यास या परंपरा?

भीष्म ने शरशय्या पर पड़े-पड़े राजधर्म और मोक्ष पर लंबा उपदेश दिया। यह उपदेश महाभारत में कहाँ है?

  • यह पूरी तरह बाद की परंपरा है, पाठ में नहीं
  • भीष्म पर्व में, उनके गिरने के तुरंत बाद
  • गीता के भीतर
  • बहुत आगे, शांति और अनुशासन पर्व में
पूरी कथा पढ़िए — जो सबसे लंबा हिस्सा है

शांति और अनुशासन पर्व मिलकर महाभारत का सबसे बड़ा हिस्सा बनाते हैं — युद्ध के पूरे ब्यौरे से भी बड़ा।

स्थिति यह है कि भीष्म बाणों पर पड़े हैं, युद्ध ख़त्म हो चुका है, और युधिष्ठिर उनके पास बैठकर राज चलाने के नियम पूछ रहे हैं।

इसीलिए यह उपदेश भीष्म पर्व में ढूँढ़ने पर नहीं मिलता — बीच में पूरा युद्ध और उसके बाद का शोक पड़ा है।

पढ़ने के लिहाज़ से यह महाभारत की सबसे बड़ी छलाँग है — लड़ाई के तुरंत बाद ग्रंथ पाठशाला बन जाता है।

कौन हूँ मैं?

मुझे सामने देखकर पितामह ने धनुष नीचे रख दिया। मैंने उन्हें मारा नहीं, पर मेरे बिना वे गिरते भी नहीं। मैं कौन हूँ?

  • घटोत्कच
  • शिखंडी
  • अभिमन्यु
  • धृष्टद्युम्न
पूरी कथा पढ़िए — आधा काम, पूरा नाम

भीष्म शिखंडी को स्त्री-रूप में जन्मा मानते थे, इसलिए उन पर शस्त्र नहीं उठाते थे।

दसवें दिन अर्जुन ने बस इतना किया कि शिखंडी को आगे कर दिया। निर्णायक बाण उन्हीं के थे।

इसीलिए इस मृत्यु को लेकर पाठ में असहजता है, और अर्जुन ख़ुद इसे टालते रहे थे।

निर्णायक क्षण में शिखंडी का काम भीष्म को अपने सामने रोके रखना था; निर्णायक बाण अर्जुन ने चलाए।