पर्व ७

द्रोण पर्व

इसी पर्व में हर नियम टूटा, और तोड़ने वाले दोनों पक्ष थे

द्रोण सेनापति

भीष्म के गिरने के बाद द्रोण सेनापति बने। दुर्योधन ने उनसे एक काम कहा, युधिष्ठिर को मारना नहीं, जीवित पकड़ लेना। उसकी सोच यह थी कि युधिष्ठिर हाथ में आ गए तो फिर से द्यूत कराया जा सकता है, और फिर से वनवास। द्रोण ने कोशिश की, पर जब तक अर्जुन युधिष्ठिर के पास थे, कोई पास नहीं पहुँच सकता था। तो अर्जुन को हटाना ज़रूरी था।

चक्रव्यूह

त्रिगर्त देश के संशप्तकों ने अर्जुन को ललकारा। संशप्तक वे थे जिन्होंने प्रतिज्ञा कर ली थी कि या तो अर्जुन को मारेंगे या ख़ुद मरेंगे, लौटेंगे नहीं। नियम यह था कि ललकार लौटाई नहीं जाती। अर्जुन को जाना पड़ा, और वे मैदान के दूसरे सिरे पर चले गए। उसी दिन द्रोण ने चक्रव्यूह रचा, एक घूमता हुआ व्यूह, जिसमें घुसना मुश्किल था और निकलना उससे भी ज़्यादा।

पांडवों की सेना में उस दिन सिर्फ़ एक आदमी था जो उसे भेदना जानता था, और वह अभी लड़का ही था। अभिमन्यु, अर्जुन और सुभद्रा का बेटा। लोकप्रिय कथा कहती है कि उसने यह विद्या माँ के गर्भ में सुनी थी, और चूँकि सुभद्रा बीच में सो गईं, इसलिए वह घुसना सीख पाया और निकलना नहीं। मुख्य पाठ में अभिमन्यु सिर्फ़ इतना कहते हैं कि वे घुसना जानते हैं, निकलना नहीं, गर्भ वाली कथा बाद की परंपरा में प्रसिद्ध हुई। अभिमन्यु ने कहा कि वे घुस जाएँगे और पीछे-पीछे बाक़ी भाई आ जाएँ, तो रास्ता खुला रह जाएगा। वे घुसे। और पीछे कोई नहीं आ सका।

अभिमन्यु और जयद्रथ

जयद्रथ ने व्यूह के द्वार पर खड़े होकर बाक़ी पांडवों को रोक दिया। उसे शिव से वरदान मिला था कि वह एक दिन अर्जुन को छोड़कर बाक़ी पांडवों को रोक सकेगा, वह दिन यही था। भीतर अभिमन्यु अकेला रह गया। उसने बहुत देर तक लड़ा, आख़िर उसका धनुष टूटा, रथ टूटा, सारथी मारा गया, वह पहिया उठाकर लड़ा। यह सब अपने आप नहीं टूटा था, छह महारथियों ने मिलकर उसे घेरा और एक-एक करके तोड़ा, यह नियम के ख़िलाफ़ था, एक अकेले योद्धा को कई लोग मिलकर नहीं घेरते। आख़िर में दुःशासन का बेटा गदा लेकर सामने आया। दोनों गदा के वार से गिर पड़े, दुःशासन का बेटा पहले उठा, और जब अभिमन्यु उठने की कोशिश कर रहे थे, उसने उनके सिर पर गदा मार दी। अभिमन्यु वहीं मारे गए।

अर्जुन शाम को लौटे और उन्हें पता चला। उन्होंने उसी रात प्रतिज्ञा की कि कल सूरज ढलने से पहले वे जयद्रथ को मार देंगे, नहीं तो ख़ुद आग में जल जाएँगे। अगले दिन कौरवों ने जयद्रथ को सबसे पीछे छिपा दिया और पूरी सेना उसके आगे खड़ी कर दी। दिन ढलने लगा। तब कृष्ण ने योगबल से ऐसा अंधकार कर दिया कि सूरज दिखाई देना बंद हो गया, लगा कि दिन ढल गया। कौरव पक्ष में ख़ुशी फैल गई, जयद्रथ बाहर निकल आया कि अब अर्जुन को जलते देखेगा। उसी क्षण अंधकार हटा और प्रकाश फिर दिखा। अर्जुन ने बाण चलाया।

रात का युद्ध

उस दिन के बाद युद्ध रात में भी चला, और यह भी नियम के ख़िलाफ़ था। अंधेरे में मशालें जलाकर लोग लड़ते रहे। घटोत्कच उस रात सबसे भारी पड़ा, वह भीम और हिडिंबा का बेटा था, और राक्षसी माया रात में और बढ़ जाती थी। कौरव सेना कट रही थी। आख़िर दुर्योधन ने कर्ण से कहा कि वह अस्त्र चलाओ, वही अस्त्र, जो इंद्र ने कवच के बदले दिया था, और जो सिर्फ़ एक बार चल सकता था। कर्ण ने उसे बचा रखा था, अर्जुन के लिए। उन्होंने वह घटोत्कच पर चला दिया। घटोत्कच मरा, और उसके साथ वह एकमात्र अस्त्र भी चला गया, जिसे कर्ण अर्जुन के लिए बचाकर रखे हुए थे। कृष्ण उस रात ख़ुश हुए, और उन्होंने कहा भी कि आज घटोत्कच ने अर्जुन को बचा लिया।

अश्वत्थामा नाम का हाथी

द्रोण को रोका नहीं जा रहा था। कृष्ण ने कहा कि जब तक उनके हाथ में धनुष है, उन्हें कोई नहीं हरा सकता, और वे धनुष सिर्फ़ एक हाल में छोड़ेंगे, अगर उन्हें लगे कि उनका बेटा अश्वत्थामा मर गया। तब भीम ने अश्वत्थामा नाम के एक हाथी को मारा। और ज़ोर से कहा कि अश्वत्थामा मारा गया। द्रोण ने विश्वास नहीं किया, उन्होंने युधिष्ठिर से पूछा, क्योंकि युधिष्ठिर झूठ नहीं बोलते थे। युधिष्ठिर ने कहा, अश्वत्थामा मारा गया, हाथी। आख़िरी शब्द उन्होंने इतना धीरे कहा कि द्रोण ने उसे सुना ही नहीं, उन्होंने पहला हिस्सा सुना, दूसरा नहीं। उन्होंने धनुष रख दिया और ज़मीन पर बैठ गए। धृष्टद्युम्न ने उसी हाल में उनका सिर काट दिया। धृष्टद्युम्न द्रुपद के बेटे थे, और द्रुपद ने वह यज्ञ इसी दिन के लिए कराया था, द्रोण से बदला लेने के लिए।

नारायणास्त्र

अश्वत्थामा को पता चला कि पिता कैसे मारे गए। उन्होंने नारायणास्त्र छोड़ दिया। वह अस्त्र ऐसा था कि जो उसके सामने लड़ता, उस पर वह और तेज़ होता जाता। कृष्ण ने सबसे कहा कि हथियार डाल दो और ज़मीन पर लेट जाओ, जो लड़ेगा नहीं, उस पर यह चलेगा नहीं। सबने वही किया। भीम ने पहले मना किया, पर उन्हें भी खींचकर लिटा दिया गया। अस्त्र ऊपर से गुज़र गया।

टिप्पणी: युधिष्ठिर को जीवित पकड़ने का आदेश, संशप्तकों की ललकार, चक्रव्यूह, जयद्रथ का द्वार रोकना, अभिमन्यु का वध, जयद्रथ-वध, रात का युद्ध, घटोत्कच पर इंद्र का अस्त्र, हाथी वाला अश्वत्थामा और द्रोण का वध — सब व्यास रचित महाभारत के द्रोण पर्व में हैं। पर अभिमन्यु का चक्रव्यूह गर्भ में सुनना मुख्य पाठ में नहीं है — वहाँ वे सिर्फ़ इतना कहते हैं कि घुसना जानते हैं, निकलना नहीं। गर्भ वाली कथा बाद की परंपरा में प्रसिद्ध हुई। इस पर्व में नियम दोनों पक्षों ने तोड़े, और पाठ दोनों को दर्ज करता है — कौरवों ने अभिमन्यु को घेरकर मारा, पांडवों ने द्रोण को आधे सच से। जयद्रथ वाला अंधकार पाठ में कृष्ण के योगबल से होता है — सुदर्शन चक्र से सूर्य ढकने वाला रूप बाद की परंपरा का है, और वह एक अलग दावा है।

स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), द्रोण पर्व

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

दुर्योधन ने द्रोण से युद्ध में क्या करने को कहा था?

  • अर्जुन को मार डालिए
  • युधिष्ठिर को जीवित पकड़ लीजिए
  • भीम को मार डालिए
  • कृष्ण को बंदी बना लीजिए
पूरी कथा पढ़िए — जुआ जो दोबारा खेला जाना था

दुर्योधन का हिसाब सीधा था — युधिष्ठिर बुलावे पर जुआ खेलने से मना नहीं कर पाते।

यानी उसे युद्ध जीतने से ज़्यादा वह पुरानी चाल दोबारा चलनी थी, जो एक बार काम कर चुकी थी।

द्रोण ने शर्त रखी कि पहले अर्जुन को मैदान से हटाना होगा, वरना युधिष्ठिर तक पहुँचा नहीं जा सकता।

इसी शर्त से वह दिन बना जिस दिन अर्जुन दूसरी ओर खिंच गए और चक्रव्यूह रचा गया।

ऐसा क्यों?

चक्रव्यूह के दिन अर्जुन मैदान के दूसरे सिरे पर क्यों थे?

  • वे घायल थे
  • वे कृष्ण के साथ सलाह कर रहे थे
  • वे युधिष्ठिर की रक्षा में पीछे थे
  • त्रिगर्त के संशप्तकों ने उन्हें ललकारा था, और ललकार लौटाना नियम में नहीं था
पूरी कथा पढ़िए — नियम जो हथियार बन गया

संशप्तक वे योद्धा थे जिन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि या तो अर्जुन को मारेंगे या मारे जाएँगे।

उनका काम अर्जुन को मारना नहीं था। उनका काम अर्जुन को व्यस्त रखना था, और वे उसमें सफल रहे।

अर्जुन ललकार लौटा नहीं सकते थे। यही उस दिन की पूरी योजना थी — नियम को ही जाल की तरह इस्तेमाल करना।

जिस दिन अर्जुन दूर थे, उसी दिन ऐसा व्यूह रचा गया जिसका रास्ता पांडव पक्ष में सिर्फ़ अर्जुन और कृष्ण जानते थे।

क्या हुआ?

अभिमन्यु चक्रव्यूह में घुस गए, पर उनके भाई पीछे नहीं आ सके। क्यों?

  • जयद्रथ ने द्वार पर खड़े होकर उन्हें रोक दिया
  • वे रास्ता भूल गए
  • युधिष्ठिर ने उन्हें रोक दिया
  • व्यूह बंद हो गया
पूरी कथा पढ़िए — एक दिन का वरदान

जयद्रथ वही है जिसने वन पर्व में द्रौपदी को उठाने की कोशिश की थी और भीम के हाथों अपमान झेला था।

उसके बाद उसने तपस्या की। वरदान यह मिला कि वह एक दिन के लिए पांडवों को रोक सकेगा — पर अर्जुन को नहीं।

और वह दिन ठीक वही निकला जिस दिन अर्जुन मैदान में थे ही नहीं।

इसीलिए अर्जुन का ग़ुस्सा द्रोण या दुर्योधन पर नहीं, जयद्रथ पर उतरा। रोकने वाला वही था।

व्यास या परंपरा?

अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में घुसना अपनी माँ के गर्भ में सुना था — यह कहानी कहाँ से है?

  • यह मुख्य पाठ का हिस्सा है
  • यह गीता में है
  • यह पूरी तरह गढ़ी हुई है, किसी परंपरा में नहीं
  • यह बाद की परंपरा में प्रसिद्ध हुई; मुख्य पाठ में अभिमन्यु सिर्फ़ इतना कहते हैं कि वे घुसना जानते हैं, निकलना नहीं
पूरी कथा पढ़िए — आधा ज्ञान

पाठ में यह अधूरापन बताया जाता है, समझाया नहीं जाता। अभिमन्यु कहते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।

गर्भ में सुनने वाली कथा इस अधूरेपन को एक साफ़ कारण दे देती है — सुभद्रा बीच में सो गईं, इसलिए बाक़ी नहीं सुना गया।

इसीलिए वह इतनी लोकप्रिय है। वह एक खटकती हुई बात को समझाकर बंद कर देती है।

पाठ उसे खुला छोड़ता है, और खुला रहने से वह ज़्यादा भारी लगती है।

किसका बेटा?

मैं अर्जुन और सुभद्रा का पुत्र हूँ, और कृष्ण मेरे मामा हैं। मैं तेरहवें दिन मारा गया। मैं कौन हूँ?

  • घटोत्कच
  • इरावान
  • अभिमन्यु
  • वृषसेन
पूरी कथा पढ़िए — जो वंश बचा

अभिमन्यु का विवाह विराट पर्व के अंत में उत्तरा से हुआ था।

उनकी मृत्यु के समय उत्तरा गर्भवती थीं, और उसी गर्भ से परीक्षित जन्मे।

युद्ध के बाद हस्तिनापुर की गद्दी परीक्षित को ही मिलती है — यानी पूरा वंश इसी एक बच्चे से आगे बढ़ता है।

इसलिए अभिमन्यु की मौत सिर्फ़ शोक की बात नहीं। उस गर्भ पर आगे एक और हमला होगा, और महाभारत का सबसे बड़ा दाँव वही बनेगा।

क्या हुआ?

अर्जुन ने प्रतिज्ञा की कि अगले दिन सूर्यास्त से पहले जयद्रथ मारा जाएगा। दिन ढल गया और जयद्रथ ज़िंदा था। फिर?

  • अर्जुन आग में चले गए
  • अंधकार हटते ही प्रकाश फिर दिखा, जयद्रथ बाहर आ चुका था, और अर्जुन ने उसी क्षण बाण चलाया
  • जयद्रथ भाग गया
  • प्रतिज्ञा टाल दी गई
पूरी कथा पढ़िए — सिर जो ज़मीन पर नहीं गिरना था

जयद्रथ के पिता का वरदान था कि जो उसका सिर ज़मीन पर गिराएगा, उसका अपना सिर फट जाएगा।

कृष्ण ने अर्जुन को यह पहले ही बता दिया था, इसलिए अर्जुन ने कटा हुआ सिर बाणों से हवा में सँभाले रखा।

वे उसे दूर ले गए और उसके पिता की गोद में गिराया, जो पास ही तपस्या में बैठे थे।

पिता चौंककर उठे तो सिर उनकी गोद से ज़मीन पर गिर गया, और शर्त के अनुसार उन्हीं का सिर फट गया। महाभारत में वरदान अक्सर इसी तरह पलटते हैं।

किसने कहा?

"अश्वत्थामा मारा गया।" — यह वाक्य द्रोण को किसके मुँह से सुनना पड़ा, तब जाकर उन्होंने हथियार रखे?

  • भीम
  • कृष्ण
  • युधिष्ठिर
  • धृष्टद्युम्न
पूरी कथा पढ़िए — आधा सच, जो पूरा झूठ था

भीम ने अश्वत्थामा नाम के एक हाथी को मारा था, इसलिए वाक्य तकनीकी रूप से ग़लत नहीं था।

युधिष्ठिर ने कहा — अश्वत्थामा मारा गया, हाथी। दूसरा हिस्सा उन्होंने धीमे कहा, और उसी समय शंख बजा दिए गए।

द्रोण ने सिर्फ़ पहला हिस्सा सुना और धनुष रख दिया। पूरा युद्ध इसी एक वाक्य की आड़ में मुड़ जाता है।

कहा जाता है कि युधिष्ठिर का रथ, जो अब तक ज़मीन से कुछ ऊपर चलता था, उसी क्षण नीचे आ गया। यही उनकी सज़ा थी।

पहेली

मैं एक जानवर हूँ। मुझे इसलिए मारा गया ताकि मेरा नाम एक वाक्य में इस्तेमाल किया जा सके। मैं कौन हूँ?

  • अश्वत्थामा नाम का हाथी
  • कर्ण का घोड़ा
  • द्रोण का घोड़ा
  • भीम का हाथी
पूरी कथा पढ़िए — नाम से लड़ी गई लड़ाई

द्रोण को रोकने का कोई रास्ता नहीं बचा था। वे उस दिन अकेले पूरी सेना पर भारी पड़ रहे थे।

कृष्ण ने कहा कि वे हथियार तभी छोड़ेंगे जब उन्हें लगे कि बेटा मारा गया, और यह बात युधिष्ठिर के मुँह से निकलनी चाहिए।

भीम ने हाथी मारकर उस वाक्य को सच होने की एक गुंजाइश दे दी, ताकि युधिष्ठिर पूरी तरह झूठ न बोलें।

पाठ इस बचाव को मानता नहीं। सज़ा फिर भी मिलती है, और असली अश्वत्थामा जीवित रहकर आगे का सबसे बुरा काम करता है।

क्या हुआ?

कर्ण के पास इंद्र की दी हुई शक्ति थी, जो एक ही बार चल सकती थी और निशाना नहीं चूकती थी। उन्होंने उसे किस पर चलाया?

  • अर्जुन पर
  • घटोत्कच पर
  • भीम पर
  • धृष्टद्युम्न पर
पूरी कथा पढ़िए — जिस मौत पर कृष्ण नाचे

घटोत्कच भीम और हिडिंबा के पुत्र थे, और रात का समय उनके पक्ष में माना जाता था।

उस रात उन्होंने कौरव सेना का इतना नुक़सान किया कि दुर्योधन ने कर्ण से वह अस्त्र चलाने को कह दिया।

पांडव शोक में डूब गए। कृष्ण रथ पर खड़े होकर ख़ुश हुए, और अर्जुन ने बुरा माना।

कृष्ण का कारण साफ़ था — जब तक वह शक्ति कर्ण के पास थी, अर्जुन एक दिन भी सुरक्षित नहीं थे। घटोत्कच ने वह अस्त्र अपने ऊपर लेकर ख़त्म कर दिया।

ऐसा क्यों?

द्रोण का वध किया धृष्टद्युम्न ने। यह उन्हीं के हाथों क्यों हुआ?

  • क्योंकि वे सबसे बड़े योद्धा थे
  • क्योंकि अर्जुन ने मना कर दिया था
  • क्योंकि उन्हें कृष्ण ने चुना था
  • क्योंकि द्रुपद ने द्रोण से बदले के लिए यज्ञ कराया था, और धृष्टद्युम्न उसी से जन्मे माने जाते हैं
पूरी कथा पढ़िए — जो बात आदि पर्व में शुरू हुई थी

द्रोण ने अपने शिष्यों से गुरुदक्षिणा में द्रुपद को बंदी बनवाया था, और फिर आधा राज्य लेकर छोड़ दिया था।

द्रुपद उस अपमान को भूले नहीं। उन्होंने यज्ञ कराया, और उसी से धृष्टद्युम्न और द्रौपदी उत्पन्न हुए माने जाते हैं।

यानी पांडवों का सेनापति और उनकी पत्नी, दोनों उसी एक पुरानी शत्रुता से आते हैं।

पर पूरा होते समय यह बदला ऐसा नहीं दिखता जैसा सोचा गया था। द्रोण लड़ते हुए नहीं मरे — वे हथियार रखकर ध्यान में बैठे थे।

कौन हूँ मैं?

मैंने अपने पिता को हथियार रखवाकर मारे जाते देखा, और उसी रात मैंने वह अस्त्र छोड़ा जिसके सामने लड़ने वाला ही मरता है। मैं कौन हूँ?

  • अश्वत्थामा
  • कृपाचार्य
  • कर्ण
  • दुर्योधन
पूरी कथा पढ़िए — जिसका इलाज लड़ना नहीं था

नारायणास्त्र का नियम उलटा था — जो उसका सामना करे, उसी पर वह और भयंकर होता जाए।

कृष्ण ने सबसे कहा कि हथियार डालो, रथ से उतरो और ज़मीन पर लेट जाओ।

भीम ने मना कर दिया और अकेले लड़ते रहे। अस्त्र का पूरा ज़ोर उन्हीं पर आ गया, और अर्जुन-कृष्ण ने ज़बरदस्ती उनके हथियार छुड़ाए।

अस्त्र शांत हो गया। अश्वत्थामा का ग़ुस्सा नहीं — और वही आगे सौप्तिक पर्व बनेगा।

तथ्य

नारायणास्त्र से बचने का तरीक़ा क्या था?

  • उसे दूसरे अस्त्र से काटना
  • भाग जाना
  • हथियार डालकर ज़मीन पर लेट जाना
  • ढाल के पीछे छिपना
पूरी कथा पढ़िए — एक अस्त्र जो ग़ुस्से से चलता था

यह महाभारत के गिने-चुने अस्त्रों में है जिनका जवाब ताक़त नहीं है।

पांडव पक्ष का एक साथ हथियार डालकर उतर जाना अपने आप में अजीब दृश्य है, और पाठ उसे बिना मज़ाक़ के बताता है।

भीम का मना करना उनके स्वभाव के अनुसार ही है — वे किसी भी हालत में हथियार नहीं छोड़ते।

इसीलिए उन्हें बचाने के लिए ज़बरदस्ती करनी पड़ी। बचाव उनकी अपनी मर्ज़ी से नहीं हुआ।

सही क्रम

द्रोण पर्व की इन घटनाओं का सही क्रम कौन-सा है?

  • जयद्रथ-वध → अभिमन्यु का वध → घटोत्कच का वध → द्रोण का वध
  • अभिमन्यु का वध → घटोत्कच का वध → जयद्रथ-वध → द्रोण का वध
  • अभिमन्यु का वध → जयद्रथ-वध → द्रोण का वध → घटोत्कच का वध
  • अभिमन्यु का वध → जयद्रथ-वध → घटोत्कच का वध → द्रोण का वध
पूरी कथा पढ़िए — पाँच दिन

द्रोण ग्यारहवें दिन से पंद्रहवें दिन तक, यानी पाँच दिन, कौरव सेना के सेनापति रहे।

इन पाँच दिनों में युद्ध का सबसे बड़ा हिस्सा निपट जाता है, और महाभारत का सबसे लंबा पर्वों में से एक यही है।

चौदहवाँ दिन अकेले इतना लंबा है कि वह रात में भी चलता रहता है — जयद्रथ-वध और घटोत्कच, दोनों उसी एक दिन-रात के हैं।

हर बड़ी घटना में कोई न कोई नियम टूटता है, और आख़िर तक यह गिनना मुश्किल हो जाता है कि किस पक्ष ने ज़्यादा तोड़े।

ऐसा क्यों?

अभिमन्यु के वध को महाभारत नियम-भंग क्यों मानता है?

  • क्योंकि वे निहत्थे थे
  • क्योंकि एक अकेले योद्धा को कई महारथियों ने एक साथ घेरकर मारा
  • क्योंकि वे बच्चे थे
  • क्योंकि वह रात का समय था
पूरी कथा पढ़िए — जिस दिन गिनती बदल गई

युद्ध से पहले नियम तय हुए थे — बराबरी के हथियार से, निहत्थे पर नहीं, एक पर कई नहीं।

अभिमन्यु के साथ ये सब एक साथ टूटे। रथ टूटा, सारथी मारा गया, धनुष कटा, तलवार टूटी, और आख़िर में वे पहिया उठाकर लड़े।

इसके बाद पांडव पक्ष भी नियमों को लेकर वैसा सख़्त नहीं रहा। द्रोण का वध, कर्ण का वध और दुर्योधन का वध — तीनों में कुछ न कुछ टूटता है।

महाभारत इसे संयोग की तरह नहीं दिखाता। जो पहले टूटता है, वही आगे टूटने की इजाज़त बन जाता है।