
पर्व ८
कर्ण पर्व
दो दिन का सेनापति, जिसे उसके अपने ही सारथी ने पूरे रास्ते तोड़ा
कर्ण सेनापति बने
द्रोण के बाद कर्ण सेनापति बने। उन्होंने एक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि अर्जुन के रथ पर कृष्ण हैं, और उन्हें भी उसी दर्जे का सारथी चाहिए। उन्होंने शल्य का नाम लिया, मद्र देश के राजा और नकुल-सहदेव के मामा।
शल्य असल में पांडवों की ओर से लड़ने आ रहे थे। रास्ते में उनका बहुत स्वागत हुआ, पड़ाव, भोजन, सब कुछ। उन्होंने समझा कि यह पांडवों ने कराया है, और ख़ुश होकर कहा कि जो माँगना हो माँग लो। तब दुर्योधन सामने आया, यह सब उसी ने कराया था। उसने वही माँगा, कि शल्य उसकी ओर से लड़ें। शल्य वचन दे चुके थे। पर वहाँ से वे सीधे पांडवों के पास गए और सारी बात बता दी। युधिष्ठिर ने उनसे एक चीज़ माँगी, कि अगर कभी वे कर्ण का रथ हाँकें, तो कर्ण का मन तोड़ते रहें। शल्य ने हाँ कह दी।
शल्य को यह अपमान लगा, एक राजा और किसी का रथ हाँके। दुर्योधन ने मना लिया, शल्य मान गए, पर एक शर्त पर, कि वे जो चाहेंगे, वह कहेंगे, और कर्ण उन्हें रोकेंगे नहीं। कर्ण मान गए। शल्य रथ पर बैठे, कर्ण की ओर से, पर कर्ण के लिए नहीं।
सारथी की शर्त
रथ चला, और शल्य ने बोलना शुरू किया। वे लगातार कहते रहे कि अर्जुन बड़े हैं, कर्ण उनके सामने कुछ नहीं, कि यह लड़ाई पहले से तय है। एक बार कर्ण ने कहा कि वे अर्जुन को मार देंगे। शल्य ने हँसकर कहा कि यही बात वे कई बार कह चुके हैं, और हर बार अर्जुन ज़िंदा लौटे हैं। कर्ण ने उन्हें रोका नहीं, वे रोक भी नहीं सकते थे, शर्त यही थी। जो आदमी उनका रथ हाँक रहा था, वही उन्हें तोड़ता रहा, और युधिष्ठिर से किया वचन निभाता रहा। रथ आगे बढ़ता रहा। यह इस पर्व की असली लड़ाई है, और वह रथ के भीतर लड़ी जा रही थी।
दुःशासन का वध
उसी दिन भीम को दुःशासन मिला। भीम ने वही किया जो उन्होंने भरी सभा में कहा था, उन्होंने उसकी छाती चीर दी। सभा वाली प्रतिज्ञा शब्दशः पूरी हुई।
चार भाई छोड़े गए
कर्ण उस दिन युधिष्ठिर से भिड़े और उन्हें बुरी तरह घायल किया। पर मारा नहीं, उन्होंने छोड़ दिया। फिर नकुल मिले, फिर सहदेव, फिर भीम, हर बार वही हुआ, कर्ण जीते, और छोड़ दिया। कुंती को दिया वचन वे शब्दशः निभा रहे थे। युधिष्ठिर घायल होकर शिविर लौट आए। अर्जुन उन्हें देखने आए। युधिष्ठिर ग़ुस्से में थे, उन्होंने अर्जुन से कहा कि तुम्हारा गांडीव किसी काम का नहीं, बेहतर है किसी और को दे दो। अर्जुन ने तलवार निकाल ली, उनकी एक प्रतिज्ञा थी कि जो कोई उनसे गांडीव छोड़ने को कहेगा, वे उसे मार देंगे, और कहने वाले उनके बड़े भाई थे। कृष्ण ने बीच में आकर रास्ता निकाला, उन्होंने कहा कि बड़े का अपमान करना उसे मारने के बराबर है। अर्जुन ने युधिष्ठिर को कड़वी बातें कहीं, और प्रतिज्ञा टूटी नहीं। फिर युधिष्ठिर ने ख़ुद कहा कि गलती उनकी थी।
रथ का पहिया
कर्ण और अर्जुन आमने-सामने आए। दोनों सेनाएँ लड़ना छोड़कर देखने लगीं। लड़ाई बराबरी की थी। कर्ण ने अर्जुन का मुकुट गिरा दिया, अर्जुन ने कर्ण का रथ पीछे हटा दिया। कर्ण ने नागास्त्र चलाया, उसमें अश्वसेन नाम का एक नाग बैठा था, जिसकी माँ खांडव-दहन में मारी गई थी और जो अर्जुन से बदला लेना चाहता था। बाण सीधे अर्जुन के सिर की ओर आया। कृष्ण ने रथ को पैर से दबाकर ज़मीन में धँसा दिया, रथ नीचे बैठ गया, और बाण मुकुट लेकर निकल गया। अश्वसेन लौटकर आया और कर्ण से कहा कि उसे फिर चलाइए, इस बार निशाना नहीं चूकेगा। कर्ण ने मना कर दिया, उन्होंने कहा कि वे एक ही बाण दो बार नहीं चलाते।
दोनों के फिर भिड़ने से पहले अर्जुन ने कर्ण के बेटे वृषसेन को उनकी आँखों के सामने मार डाला, अभिमन्यु का उत्तर, जिसे इसी तरह घेरकर मारा गया था।
फिर कर्ण के रथ का पहिया ज़मीन में धँस गया। उन्होंने उतरकर पहिया निकालना शुरू किया, और अर्जुन से कहा कि रुक जाइए, नियम यह है कि निहत्थे पर बाण नहीं चलाया जाता। कृष्ण ने उत्तर दिया, उन्होंने कर्ण को एक-एक करके वे सब मौक़े गिनाए जब उन्होंने ख़ुद नियम नहीं माना था, द्यूत की सभा, चीरहरण, चक्रव्यूह में अभिमन्यु का घेरा जाना। कर्ण चुप रहे।
पहिया अपने आप नहीं धँसा था। बरसों पहले कर्ण के हाथों अनजाने में एक ब्राह्मण की गाय मारी गई थी, ब्राह्मण ने शाप दिया था कि जिस दिन वे अपनी सबसे बड़ी लड़ाई लड़ेंगे, उसी दिन धरती उनके रथ का पहिया निगल लेगी, वह दिन यही था। फिर उन्होंने वह अस्त्र याद करना चाहा जो परशुराम से सीखा था, और वह याद ही नहीं आया। कर्ण ने ब्राह्मण बनकर परशुराम से विद्या ली थी, और सच खुलने पर परशुराम ने शाप दिया था कि जिस समय सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी, विद्या याद नहीं आएगी, वह समय भी यही था।
अर्जुन ने बाण चलाया। कर्ण गिरे।
टिप्पणी: कर्ण का सेनापति बनना, शल्य को सारथी माँगना और उनकी शर्त, दुःशासन का वध, कर्ण का चारों भाइयों को छोड़ देना, युधिष्ठिर और अर्जुन के बीच गांडीव वाला प्रसंग, पहिये का धँसना, कृष्ण का उत्तर और दोनों शाप — सब व्यास रचित महाभारत के कर्ण पर्व में हैं। दोनों शापों की पूरी कथा शांति पर्व में आती है — गाय वाला शाप पहिये पर उतरता है और परशुराम वाला विद्या पर, और दोनों एक ही क्षण में पूरे होते हैं। कर्ण का चारों भाइयों को जीवित छोड़ना उसी वचन का पालन है जो उन्होंने उद्योग पर्व में कुंती को दिया था। कर्ण की दानवीरता की कई प्रसिद्ध कथाएँ — जैसे मरते समय सोने का दाँत तोड़कर दान करना — बाद की परंपरा और लोककथाओं से आई हैं, मुख्य पाठ से नहीं।
स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), कर्ण पर्व