
पर्व १७
महाप्रस्थानिक पर्व
छह लोग उत्तर की ओर चले, और एक कुत्ता पीछे-पीछे चलता रहा।
आख़िरी यात्रा
अर्जुन लौटे और सब बता दिया। पांडवों ने तय किया कि अब बहुत हुआ। परीक्षित को राजा बनाया गया, उत्तरा का वही बेटा, जो मरा हुआ जन्मा था। फिर पाँचों भाई और द्रौपदी ने राजसी वस्त्र उतार दिए और उत्तर की ओर चल दिए। रास्ते में अग्नि मिले और उन्होंने अर्जुन से कहा कि गांडीव लौटा दें, वह धनुष वरुण का था और अब लौटना चाहिए, उसके साथ वे दोनों तरकश भी, जिनके बाण कभी ख़त्म नहीं होते थे। अर्जुन ने तीनों पानी में छोड़ दिए। और एक कुत्ता कहीं से आकर उनके पीछे चलने लगा।
एक-एक करके
रास्ता ऊपर चढ़ता गया। सबसे पहले द्रौपदी गिरीं। भीम ने पूछा कि इन्होंने क्या ग़लत किया था। युधिष्ठिर ने बिना रुके उत्तर दिया, कि वे पाँचों में अर्जुन की ओर अधिक झुकी हुई थीं। फिर सहदेव गिरे, युधिष्ठिर ने कहा कि उन्हें अपनी बुद्धि का घमंड था, वे मानते थे कि समझ में उनके बराबर कोई नहीं। फिर नकुल, कारण यह बताया गया कि उन्हें अपने रूप का घमंड था। फिर अर्जुन, युधिष्ठिर ने कहा कि उन्होंने एक बार कहा था कि वे अकेले एक ही दिन में सारे शत्रुओं को ख़त्म कर देंगे, और वह बात पूरी नहीं हुई। फिर भीम, कारण दो बताए गए, अपनी ताक़त का घमंड, और यह कि खाते समय वे दूसरों का ध्यान नहीं रखते थे। हर बार भीम पूछते, और हर बार युधिष्ठिर एक कारण बताकर आगे बढ़ जाते, बिना पलटे।
आख़िर में सिर्फ़ दो बचे, युधिष्ठिर और वह कुत्ता।
कुत्ता और इंद्र
तब इंद्र रथ लेकर आए। उन्होंने कहा कि चलिए, स्वर्ग चलते हैं। युधिष्ठिर ने कहा कि कुत्ता भी आएगा। इंद्र ने कहा कि कुत्ते स्वर्ग नहीं जाते। युधिष्ठिर ने कहा कि तो वे भी नहीं जाएँगे, यह कुत्ता पूरे रास्ते साथ रहा है और शरण में आया है, और शरण में आए को छोड़ना उनसे नहीं होगा। उन्होंने रथ पर चढ़ने से मना कर दिया। तब कुत्ता अपने रूप में आ गया, वे धर्म थे, युधिष्ठिर के अपने पिता, वही जो बरसों पहले झील पर यक्ष बनकर मिले थे।
टिप्पणी: परीक्षित का राज्याभिषेक, गांडीव का लौटाया जाना, छहों का उत्तर की ओर चलना, एक-एक करके गिरना और कुत्ते वाला प्रसंग — सब व्यास रचित महाभारत के महाप्रस्थानिक पर्व में हैं। गिरने के कारण युधिष्ठिर के मुँह से आते हैं, पाठ के मुँह से नहीं — यह उनका कहा हुआ है, और पाठ उस पर कोई मुहर नहीं लगाता। कुत्ता धर्म हैं, वही जो वन पर्व में यक्ष बनकर आए थे — यानी युधिष्ठिर की पहली और आख़िरी परीक्षा एक ही ने ली।
स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), महाप्रस्थानिक पर्व