पर्व १६

मौसल पर्व

छत्तीस साल बाद गांधारी का शाप आया, और यादव आपस में लड़कर ख़त्म हो गए।

ऋषियों का शाप

युद्ध को छत्तीस साल हो चुके थे। द्वारका में सब ठीक चल रहा था, यादव युद्ध जीत चुके थे, धन में थे, समृद्धि में थे, और उनके सामने अब कोई शत्रु नहीं बचा था, न बाहर, न भीतर, ऐसा लगता था। फिर कुछ ऋषि द्वारका आए। यादव कुल के कुछ लड़कों ने मज़ाक सूझा, उस तरह का मज़ाक जो अक्सर बहुत भारी पड़ता है। उन्होंने कृष्ण के बेटे साम्ब को स्त्री के कपड़े पहनाए, पेट पर कुछ बाँधा, और ऋषियों के पास ले गए। उन्होंने पूछा कि यह स्त्री गर्भवती है, बताइए क्या जनेगी। ऋषि हँसी-मज़ाक के मूड में नहीं थे, उन्होंने उत्तर दिया, कि वह एक लोहे का मूसल जनेगा, जो पूरे यादव कुल का नाश करेगा।

लोहे का मूसल

वैसा ही हुआ। साम्ब से एक लोहे का मूसल निकला, ठीक वैसा ही जैसा ऋषियों ने कहा था। राजा उग्रसेन घबरा गए, उसे घिसवाकर चूरा करा दिया और समुद्र में फिंकवा दिया, यह सोचकर कि ख़तरा टल गया। चूरा किनारे लगा और वहाँ एक तरह की घास उग आई। एक टुकड़ा बचा था, जो घिस नहीं सका, उसे एक मछली निगल गई, और वह टुकड़ा घूमते-घूमते आगे एक शिकारी के पास पहुँचा।

प्रभास

बरसों बाद यादव प्रभास तीर्थ गए। वहाँ उत्सव हुआ, और उसमें बहुत मदिरा पी गई। फिर पुरानी बातें निकलीं, युद्ध की बातें, कि किसने किसे कैसे मारा, कौन किस तरफ़ था, कौन सच में वीर था और कौन नहीं। बहस झगड़े में बदली, झगड़ा हाथापाई में। जो हथियार पास थे, वे थोड़ी ही देर में ख़त्म हो गए। तब किसी ने किनारे उगी वह घास उखाड़ी, हताशा में, बिना यह जाने कि वह क्या है। वह घास हाथ में आते ही लोहे के मूसल की तरह कठोर हो जाती थी। उसी शाम यादवों के लगभग सभी प्रमुख योद्धा आपस में लड़कर मारे गए, वही लोग जो समुद्र पार लंका तक जीत चुके थे, अपने ही घर के आँगन में एक-दूसरे को मार बैठे। गांधारी का शाप, जो स्त्री पर्व में दिया गया था, यहाँ पूरा हुआ।

कृष्ण का अंत

बलराम किनारे जाकर बैठ गए और वहीं शरीर छोड़ दिया। पाठ कहता है कि उनके मुँह से एक सफ़ेद नाग निकला और समुद्र की ओर चला गया। कृष्ण एक पेड़ के नीचे लेट गए, थके हुए, अकेले। उनका पैर ऊपर उठा हुआ था। दूर से एक शिकारी ने उस पैर को हिरन समझा और बाण चला दिया। उसका नाम जरा था, और उसका बाण उसी लोहे के बचे हुए टुकड़े से बना था, वही टुकड़ा जो बरसों पहले समुद्र में फेंका गया था। कृष्ण ने उसे कुछ नहीं कहा, कोई शिकायत नहीं। गांधारी ने कहा था कि वे अकेले मरेंगे। वैसा ही हुआ।

द्वारका का डूबना

अर्जुन द्वारका पहुँचे। जो बचे थे, ज़्यादातर स्त्रियाँ और बच्चे, उन्हें लेकर वे हस्तिनापुर की ओर चले। रास्ते में लुटेरों ने उन्हें घेर लिया। अर्जुन ने गांडीव उठाया, वही धनुष जिसने कभी पूरी कौरव सेना रोक दी थी। और वे उन्हें रोक नहीं सके। धनुष वही था, पर उनके हाथों में वह पुरानी शक्ति नहीं रही, जैसे एक युग ख़त्म हो चुका हो और हथियार को पता चल गया हो। कई स्त्रियों को लुटेरे उठा ले गए, और अर्जुन खड़े देखते रहे, असहाय। पीछे द्वारका समुद्र में डूब गई।

टिप्पणी: ऋषियों का शाप, लोहे का मूसल, प्रभास में यादवों का आपस में लड़ना, बलराम और कृष्ण की मृत्यु, जरा नाम का शिकारी, अर्जुन का गांडीव न चला पाना और द्वारका का डूबना — सब व्यास रचित महाभारत के मौसल पर्व में हैं। गांधारी का शाप स्त्री पर्व का है और यहाँ, छत्तीस वर्ष बाद, पूरा होता है। अर्जुन का लुटेरों के सामने हार जाना पाठ में है — वही गांडीव, वही हाथ, और वही आदमी हार जाता है।

स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), मौसल पर्व

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

ऋषियों ने साम्ब के बारे में क्या कहा, और उसका नतीजा क्या हुआ?

  • कि वह राजा बनेगा
  • कि उसे कोई रोग होगा
  • कि वह एक लोहे का मूसल जनेगा, जो यादव कुल का नाश करेगा
  • कि द्वारका डूब जाएगी
पूरी कथा पढ़िए — मज़ाक़ जो भारी पड़ा

यादव लड़कों ने साम्ब को स्त्री का वेश पहनाकर ऋषियों से पूछा कि यह क्या जनेगी।

ऋषि उस समय द्वारका के अतिथि थे। उत्तर मज़ाक़ का नहीं आया।

मूसल सचमुच निकला। उसे घिसवाकर चूरा किया गया और समुद्र में डाल दिया गया।

चूरा किनारे लगकर घास बन गया, और आख़िरी न घिसा हुआ टुकड़ा एक मछली निगल गई। दोनों आगे काम आते हैं।

पहेली

मैं समुद्र किनारे उगी घास थी। जिसने मुझे तोड़ा, उसके हाथ में मैं लोहे का मूसल बन गई। मैं कहाँ से आई?

  • उसी मूसल के चूरे से, जो समुद्र में फेंका गया था
  • देवताओं ने उगाई थी
  • वह साधारण घास थी
  • कृष्ण ने उगाई थी
पूरी कथा पढ़िए — जिससे बचने की कोशिश ने ही रास्ता बनाया

मूसल को नष्ट करने के लिए ही उसे घिसा और समुद्र में डाला गया था।

वही चूरा किनारे लगकर एरका घास बन गया, ठीक उसी जगह जहाँ आगे यादव इकट्ठा हुए।

प्रभास में झगड़ा हुआ तो किसी के पास हथियार नहीं था। लोगों ने वही घास तोड़ी, और वह हाथ में आते ही मूसल हो गई।

महाभारत में शाप अक्सर इसी तरह पूरे होते हैं — बचने की कोशिश ही उसका रास्ता बन जाती है।

ऐसा क्यों?

अर्जुन द्वारका की स्त्रियों और बच्चों को लुटेरों से क्यों नहीं बचा सके?

  • वे अकेले थे
  • वे घायल थे
  • लुटेरे बहुत ज़्यादा थे
  • गांडीव वही था, पर उनके हाथों में पुरानी शक्ति नहीं रही
पूरी कथा पढ़िए — जब हाथ ने साथ छोड़ा

यह वही अर्जुन हैं जिन्होंने अकेले कौरव सेना रोकी थी और भीष्म-द्रोण-कर्ण को पीछे हटाया था।

यहाँ साधारण लुटेरों के सामने वही धनुष उनके हाथ में पुरानी तरह नहीं चलता। अर्जुन इसे अंत में नियति का काम मानते हैं।

अर्जुन व्यास के पास जाकर पूछते हैं कि यह कैसे हुआ, और व्यास कहते हैं कि जो करना था वह हो चुका।

इसके तुरंत बाद पांडव सब छोड़कर निकल पड़ते हैं। अर्जुन के हाथ का चुक जाना ही वह संकेत है।

तथ्य

कृष्ण की मृत्यु किस तरह हुई?

  • यादवों के झगड़े में
  • जरा नाम के शिकारी के बाण से, जिसने उनके पैर को हिरन समझ लिया
  • समुद्र में डूबकर
  • बलराम के साथ योग से
पूरी कथा पढ़िए — बचा हुआ टुकड़ा

कृष्ण वन में एक पेड़ के नीचे पैर ऊपर किए लेटे थे। शिकारी को पत्तों के बीच वह पैर हिरन जैसा दिखा।

बाण की नोक वही लोहे का आख़िरी टुकड़ा था, जिसे मछली निगल गई थी और जो वहाँ से शिकारी तक पहुँचा।

पास आकर जरा को पता चला कि उसने क्या किया। कृष्ण ने उसे दोष नहीं दिया।

बलराम इससे पहले जा चुके थे — समुद्र किनारे बैठकर, योग से। दोनों भाइयों का अंत लड़ाई में नहीं होता।

किसने कहा?

"छत्तीस वर्ष बाद तुम्हारा कुल आपस में लड़कर ख़त्म हो जाएगा।" — यह शाप किसने दिया था, और वह कहाँ पूरा होता है?

  • व्यास ने; आश्रमवासिक पर्व में
  • दुर्वासा ने; आदि पर्व में
  • गांधारी ने, स्त्री पर्व में; और वह यहाँ, मौसल पर्व में पूरा होता है
  • कुंती ने; उद्योग पर्व में
पूरी कथा पढ़िए — सबसे लंबी प्रतीक्षा

गांधारी ने यह शाप युद्ध के तुरंत बाद दिया था, मैदान पर, अपने सौ बेटों के शरीर देखने के बाद।

कृष्ण ने उसे काटा नहीं। उन्होंने कहा था कि यादवों का विनाश पहले से ही नियति में था।

बीच के छत्तीस वर्ष महाभारत में लगभग ख़ाली हैं। कथा शांत रहती है और शाप चलता रहता है।

मौसल पर्व में वह अक्षरशः पूरा होता है — यादव आपस में लड़कर ख़त्म होते हैं, और कृष्ण जंगल में अकेले मारे जाते हैं।