पर्व २

सभा पर्व

एक हँसी, और एक खेल — और उसके बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा

मय की बनाई सभा

मय दानव ने अपना वादा निभाया। उसने इंद्रप्रस्थ में एक सभा बनाई, और वह सभा सिर्फ़ बड़ी नहीं थी, वह भ्रम पैदा करने वाली थी। उसमें कहीं फ़र्श पानी जैसा दिखता था, और कहीं पानी फ़र्श जैसा। कहीं दरवाज़ा दीवार लगता था, और जहाँ दीवार कुछ नहीं थी, वहाँ आदमी टकरा जाता था। देखने वाले दंग रह जाते थे, कोई भी वहाँ पहली बार आकर धोखा खाए बिना नहीं निकल सकता था।

जरासंध-वध

युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करना चाहते थे, वह यज्ञ जिससे राजा अपनी सर्वोच्चता की घोषणा करता है। पर उसके लिए ज़रूरी था कि कोई बड़ा राजा चुनौती देने वाला न बचे। सबसे बड़ी रुकावट मगध का राजा जरासंध था। उसने बहुत से राजाओं को क़ैद कर रखा था, और कृष्ण से उसकी पुरानी दुश्मनी थी। कृष्ण, भीम और अर्जुन ब्राह्मणों के भेस में उसके पास पहुँचे और मल्ल-युद्ध माँगा। जरासंध ने भीम को चुना।

लड़ाई कई दिन चली। जरासंध थकता नहीं था, उसका शरीर दो टुकड़ों से जुड़कर बना था, और चीरने पर फिर जुड़ जाता था। भीम बार-बार उसे तोड़ते, और वह बार-बार जुड़कर खड़ा हो जाता, जैसे उसकी मौत का कोई रास्ता ही न हो। आख़िर कृष्ण ने एक तिनका उठाया और उसे बीच से चीरकर दो अलग दिशाओं में फेंक दिया, चुपचाप, इशारे में। भीम समझ गए। उन्होंने जरासंध को चीरा और दोनों टुकड़ों को उलटी दिशा में फेंक दिया, ताकि वे दोबारा न जुड़ें। जरासंध मारा गया, उसके क़ैदी राजा छूट गए।

राजसूय और शिशुपाल

अब यज्ञ हो सकता था। सब राजा आए। यज्ञ में सबसे पहले किसका सम्मान हो, यह तय करना था, और युधिष्ठिर ने कृष्ण को चुना। चेदि के राजा शिशुपाल को यह मंज़ूर नहीं था। वह खड़ा हुआ और भरी सभा में कृष्ण को गालियाँ देने लगा, कि यह ग्वाला है, राजा भी नहीं, और इसे सबसे ऊपर बिठाया जा रहा है। कृष्ण चुप बैठे रहे और गिनते रहे। उन्होंने शिशुपाल की माँ को वचन दिया था कि सौ अपराध तक वे कुछ नहीं कहेंगे। सौ पूरे हुए, और एक और हुआ। कृष्ण ने चक्र चलाया, और शिशुपाल का सिर गिर गया। पूरी सभा में सन्नाटा छा गया। यज्ञ पूरा हुआ, युधिष्ठिर उस दिन सबसे बड़े राजा थे।

दुर्योधन का गिरना

दुर्योधन भी उस यज्ञ में था। यज्ञ के बाद वह उसी सभा में घूम रहा था, मय दानव वाली सभा में, जहाँ आँखें धोखा खाती थीं। वह एक जगह पहुँचा जहाँ फ़र्श जैसा दिखने वाला हिस्सा असल में पानी था। वह उसमें गिर पड़ा, कपड़े भीग गए। और लोग हँस पड़े। पाठ यह नहीं कहता कि द्रौपदी ने "अंधे का बेटा अंधा" कहा था — यह वाक्य बाद की परंपरा का है। पाठ इतना कहता है कि वह गिरा और उस पर हँसी हुई। पांडवों की बढ़ती ताक़त, उस सभा की चमक, और यह अपमान, सब उसके भीतर बैठ गया, एक ऐसी गाँठ जो अब खुलनी नहीं थी।

दुर्योधन हस्तिनापुर लौटा और उसने अपने मामा शकुनि से बात की। शकुनि ने कहा कि इन्हें युद्ध में नहीं हराया जा सकता, फिर उसने बताया कि कहाँ हराया जा सकता है।

पासे का खेल

युधिष्ठिर को द्यूत के लिए बुलावा भेजा गया। वे जानते थे कि यह ठीक नहीं है, पर बुलाए जाने पर द्यूत से इनकार करना उस समय अपमान माना जाता था, और क्षत्रिय-धर्म ऐसा बुलावा ठुकराने की इजाज़त नहीं देता था। वे आ गए। पासे शकुनि फेंक रहा था। युधिष्ठिर हारते गए, पहले मोती और सोना, फिर रथ, फिर हाथी, फिर दास और दासियाँ, फिर घोड़े, फिर पूरी सेना। हर बार शकुनि पासे उठाता और कहता, जीत गया।

विदुर बीच में खड़े हुए। उन्होंने धृतराष्ट्र से कहा कि यह खेल नहीं है, कि इसे अभी रोक दीजिए, कि यह लड़का आपके कुल का नाश करेगा। दुर्योधन ने उन्हें बीच में ही चुप करा दिया। धृतराष्ट्र कुछ नहीं बोले।

फिर राज्य गया। फिर युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को दाँव पर लगाया, नकुल, सहदेव, अर्जुन, भीम, और एक-एक करके सब हार गए। फिर ख़ुद को लगाया, और हार गए। और फिर द्रौपदी को लगाया।

द्रौपदी का प्रश्न

दुःशासन द्रौपदी को बालों से पकड़कर सभा में खींच लाया। वह एक ही वस्त्र में थीं। उन्होंने सभा से एक सवाल पूछा, और वह सवाल आज तक खुला है, युधिष्ठिर ने पहले ख़ुद को हारा था या मुझे, अगर वे पहले ही ख़ुद को हार चुके थे, तो उनके पास मुझे दाँव पर लगाने का अधिकार बचा कहाँ। सभा चुप रह गई। भीष्म वहीं बैठे थे, उन्होंने कहा कि धर्म का यह प्रश्न सूक्ष्म है और वे उत्तर नहीं दे पा रहे। विदुर ने विरोध किया। दुर्योधन के अपने भाई विकर्ण ने भी कहा कि द्रौपदी को जीता हुआ नहीं माना जा सकता, सभा में कुछ लोगों ने उसकी बात का समर्थन किया। कर्ण ने विकर्ण को चुप करा दिया।

फिर दुःशासन ने उनका चीर खींचना शुरू किया। लोकप्रिय कथा में यहीं कृष्ण चीर बढ़ाते हैं, दुःशासन खींचता रहता है और वस्त्र ख़त्म ही नहीं होता, आख़िर वह थककर बैठ जाता है। भीम ने उसी सभा में प्रतिज्ञा की कि वे दुःशासन की छाती चीरेंगे और दुर्योधन की जाँघ तोड़ेंगे। दोनों बातें आगे पूरी होंगी।

दूसरा दाँव

धृतराष्ट्र घबरा गए। उन्होंने द्रौपदी को वरदान देकर सब लौटा दिया, भाई, राज्य, सब। पांडव घर चले गए। और रास्ते से उन्हें फिर बुलाया गया। इस बार एक ही दाँव था, और शर्त यह थी, जो हारेगा, वह बारह वर्ष वन में रहेगा और तेरहवाँ वर्ष अज्ञातवास में, ऐसे कि कोई पहचान न पाए, पहचाने जाने पर फिर बारह वर्ष। युधिष्ठिर फिर खेले, फिर हारे।

टिप्पणी: मय दानव की सभा, जरासंध-वध, राजसूय, शिशुपाल-वध, द्यूत, द्रौपदी का सभा में प्रश्न और दूसरा द्यूत — सब व्यास रचित महाभारत के सभा पर्व में हैं। पर चीरहरण में कृष्ण का चीर बढ़ाना आलोचनात्मक संस्करण में इस रूप में नहीं मिलता — वहाँ वस्त्र बढ़ने की बात आती है, पर उस क्षण कृष्ण का नाम नहीं आता। बाद की पाठ-परंपराओं में यह बहुत प्रसिद्ध हुआ, और आज यही सबसे ज़्यादा दिखाया जाने वाला दृश्य है। द्रौपदी का "अंधे का बेटा अंधा" कहना भी पाठ में नहीं है — पाठ सिर्फ़ इतना कहता है कि दुर्योधन गिरा और हँसी हुई। द्रौपदी का प्रश्न — कि युधिष्ठिर पहले ख़ुद को हारे या उन्हें — पाठ में है, और पाठ उसका उत्तर नहीं देता।

स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), सभा पर्व

अब बताइए — कितना याद रहा?

पहेली

मुझमें फ़र्श वहाँ दिखता था जहाँ पानी था, और पानी वहाँ जहाँ फ़र्श। एक राजा मुझमें गिरा, और उसी गिरने से युद्ध की नींव पड़ी। मैं क्या हूँ?

  • इंद्रप्रस्थ का महल
  • लाक्षागृह
  • हस्तिनापुर का दरबार
  • मय दानव की बनाई सभा
पूरी कथा पढ़िए — कृतज्ञता से बनी इमारत

मय दानव खांडव वन की आग से बचकर निकला था, और अर्जुन ने उसे बचने दिया था।

बदले में उसने पांडवों के लिए वह सभा बनाई जिसकी माया की चर्चा दूर तक हुई — काँच, पानी और पत्थर इस तरह लगे कि आँख धोखा खा जाए।

यह ध्यान देने लायक़ है कि पूरा महाभारत ऐसी ही चीज़ों से चलता है। सभा कृतज्ञता में बनी थी, और उसी सभा में हुई हँसी से युद्ध निकला।

कौन हूँ मैं?

मैंने छियासी राजाओं को बंदी बना रखा था — सौ पूरे होने पर बलि देने के लिए। मुझे हराने तीन लोग ब्राह्मण के वेश में मेरे नगर तक आए। मैं कौन हूँ?

  • शिशुपाल
  • कंस
  • दुर्योधन
  • जरासंध
पूरी कथा पढ़िए — जो जुड़कर पैदा हुआ था

जरासंध की कथा उसके जन्म से शुरू होती है। मगध के राजा बृहद्रथ को दो रानियों से आधा-आधा बालक मिला था, और दोनों टुकड़े अलग-अलग बेजान थे।

जरा नाम की एक राक्षसी ने दोनों टुकड़े जोड़ दिए, और बालक जी उठा। उसी के नाम पर नाम पड़ा — जरासंध, यानी जरा का जोड़ा हुआ।

इसीलिए उसे मारने का तरीक़ा भी वही था। भीम ने उसे चीरकर दोनों हिस्से विपरीत दिशाओं में फेंका, ताकि वे फिर जुड़ न सकें।

कृष्ण ने यह इशारा शब्दों में नहीं दिया था। उन्होंने एक तिनका चीरकर दोनों टुकड़े उल्टी दिशाओं में फेंक दिए, और भीम समझ गए।

तथ्य

जरासंध का वध किसने और कैसे किया?

  • भीम ने, मल्ल-युद्ध में चीरकर
  • कृष्ण ने, सुदर्शन चक्र से
  • अर्जुन ने, बाण से
  • भीष्म ने, युद्ध में
पूरी कथा पढ़िए — तेरह दिन

जरासंध ने तीनों में से भीम को चुना, क्योंकि वह ख़ुद को उसके ही बराबर मानता था।

द्वंद्व तेरह दिन चला। दोनों बिना हथियार लड़े। जरासंध हर बार फिर खड़ा हो जाता।

भीम थकने लगे थे। तभी कृष्ण ने वह तिनका चीरकर फेंका।

ध्यान देने की बात यह है कि कृष्ण ने ख़ुद कुछ नहीं किया — न अस्त्र चलाया, न लड़े। उन्होंने सिर्फ़ बताया कि कैसे। महाभारत में उनकी भूमिका बार-बार यही रहती है।

किसने कहा?

राजसूय में कृष्ण को पहला सम्मान दिए जाने पर भरी सभा में किसने विरोध किया, और गालियाँ दीं?

  • जरासंध
  • दुर्योधन
  • कर्ण
  • शिशुपाल
पूरी कथा पढ़िए — सौ की गिनती

शिशुपाल कृष्ण की बुआ का पुत्र था — यानी दोनों भाई लगते थे।

जन्म के समय एक भविष्यवाणी हुई थी कि जिसकी गोद में जाकर बालक का अतिरिक्त अंग गिर जाएगा, उसी के हाथों उसकी मृत्यु होगी। कृष्ण की गोद में ऐसा ही हुआ।

माता ने कृष्ण से वचन माँगा कि वे उसके अपराध क्षमा करेंगे। कृष्ण ने सौ की सीमा तय की।

राजसूय की सभा में गिनती पूरी हुई। कृष्ण ने चेतावनी दी, शिशुपाल नहीं रुका, और सुदर्शन चल गया।

व्यास या परंपरा?

द्रौपदी का दुर्योधन को "अंधे का पुत्र अंधा" कहना — इस प्रसंग के बारे में कौन-सा कथन सही है?

  • यह सभा पर्व का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है
  • यह आलोचनात्मक संस्करण में नहीं मिलता; बाद की परंपरा से आया है
  • यह द्रौपदी ने द्यूत-सभा में कहा था
  • यह विदुर ने कहा था
पूरी कथा पढ़िए — हँसी किसकी थी

यह उन जगहों में से है जहाँ लोकप्रिय स्मृति ने कथा को कहीं ज़्यादा नुकीला बना दिया है।

पाठ में दुर्योधन गिरता है और आसपास के लोग हँसते हैं। पाठ इसे लंबा नहीं खींचता।

"अंधे का पुत्र अंधा" वाला ताना बाद की कथा-परंपरा और आधुनिक रूपांतरणों से आया, और इतना चल गया कि आज लोग उसे मूल मान लेते हैं।

फ़र्क़ मायने रखता है। उस एक वाक्य के साथ पूरा युद्ध एक स्त्री के ताने से निकलता दिखता है। उसके बिना यह वही रहता है जो पाठ कहता है — एक अपमानित आदमी की अपनी ईर्ष्या।

क्या हुआ?

मय की सभा में दुर्योधन के साथ क्या हुआ?

  • उस पर हमला हुआ
  • उसे सभा में आने से रोक दिया गया
  • वह पानी को फ़र्श समझकर उसमें गिर पड़ा, और लोग हँस पड़े
  • उसने कृष्ण से बहस की
पूरी कथा पढ़िए — जो लौटकर कुछ नहीं बोला

महाभारत यहाँ बहुत कम शब्द ख़र्च करता है, और वही इस प्रसंग को भारी बनाता है।

दुर्योधन गिरता है, हँसी होती है, और वह चुपचाप निकल जाता है। कोई झगड़ा नहीं, कोई जवाब नहीं।

हस्तिनापुर पहुँचकर वह शकुनि से कहता है कि वह पांडवों का वैभव देखकर जल रहा है, और उसे चैन नहीं है। बाद के एक प्रसंग में वह ख़ुद बताता है कि द्रौपदी भी दूसरी स्त्रियों के साथ हँसी थीं।

शकुनि का सुझाव यही था कि युद्ध में इन्हें हराना कठिन है, पर पासों में आसान। पूरा महाभारत उसी सुझाव पर मुड़ जाता है।

ऐसा क्यों?

युधिष्ठिर हारते जा रहे थे, फिर भी खेलते रहे। पाठ इसका क्या कारण देता है?

  • उन्हें पासों का बहुत शौक़ था और वे रुक नहीं सके
  • वे जानते थे कि वे जीत जाएँगे
  • निमंत्रण क्षत्रिय-धर्म के अनुसार था, और बुलाए जाने पर द्यूत से इनकार करना अपमान माना जाता था
  • शकुनि ने उन्हें धमकाया था
पूरी कथा पढ़िए — जो इनकार नहीं कर सका

युधिष्ठिर को पता था कि शकुनि छल करेगा। विदुर ने चेताया भी था।

पर उस समय की रीति यह थी कि द्यूत के लिए बुलाए जाने पर क्षत्रिय मना नहीं करता। युधिष्ठिर ने कहा कि वे बुलावे पर आए हैं और लौट नहीं सकते।

यही महाभारत का ढंग है। कोई नियम, कोई वचन, कोई रीति — और उसी के भीतर रहते हुए सब कुछ नष्ट हो जाता है।

आगे वन में युधिष्ठिर इसे बार-बार याद करेंगे, और यह मानेंगे कि दोष उनका अपना था।

सही क्रम

इन घटनाओं का सही क्रम कौन-सा है?

  • जरासंध-वध → राजसूय यज्ञ → दुर्योधन का गिरना → द्यूत
  • राजसूय यज्ञ → जरासंध-वध → द्यूत → दुर्योधन का गिरना
  • दुर्योधन का गिरना → जरासंध-वध → राजसूय यज्ञ → द्यूत
  • जरासंध-वध → दुर्योधन का गिरना → राजसूय यज्ञ → द्यूत
पूरी कथा पढ़िए — चढ़ाई, और फिर गिरावट

सभा पर्व की बनावट साफ़ दो हिस्सों में है।

पहला हिस्सा चढ़ाई है — सभा बनती है, जरासंध हटता है, चारों दिशाएँ जीती जाती हैं, राजसूय होता है, युधिष्ठिर सम्राट बनते हैं।

दूसरा हिस्सा गिरावट है, और वह एक हँसी से शुरू होकर एक ही अध्याय में सब कुछ ले जाती है।

यानी पांडव इस पर्व में सबसे ऊँचे पहुँचते हैं और उसी पर्व में सबसे नीचे गिरते हैं। यह संयोग नहीं, रचना है।

किसका बेटा?

मैं धृतराष्ट्र का पुत्र था। मैंने ही द्रौपदी को बालों से पकड़कर सभा में खींचा। मैं कौन हूँ?

  • विकर्ण
  • दुःशासन
  • युयुत्सु
  • शकुनि
पूरी कथा पढ़िए — उसी सभा का एक और बेटा

सौ भाइयों में सिर्फ़ एक खड़ा हुआ — विकर्ण।

उसने कहा कि युधिष्ठिर पहले ही ख़ुद को हार चुके थे, इसलिए द्रौपदी को दाँव पर लगाने का अधिकार उनके पास नहीं था; और यह भी कि द्यूत का निमंत्रण ही छल था।

कुछ देर के लिए सभा में उसका समर्थन भी हुआ। फिर कर्ण ने उसे चुप करा दिया।

विकर्ण आगे कुरुक्षेत्र में अपने भाइयों की ओर से ही लड़ता है और भीम के हाथों मारा जाता है। भीम उसे मारने से पहले याद करते हैं कि इसने उस दिन सही बात कही थी।

पहेली

मैं युद्ध नहीं हूँ, पर मैंने वह कर दिया जो युद्ध नहीं कर पाता। मुझसे एक राज्य, पाँच भाई और एक रानी हारी गई। मैं क्या हूँ?

  • सुदर्शन चक्र
  • पासे
  • राजसूय यज्ञ
  • मय की सभा
पूरी कथा पढ़िए — शकुनि के पासे

यह लगभग सब मानते हैं कि शकुनि के पासे वश में थे और मनचाहा अंक देते थे।

पाठ इस बात पर उतना नहीं ठहरता जितनी लोकप्रिय कथा। वहाँ शकुनि को कुशल खिलाड़ी और छल में निपुण बताया गया है, और युधिष्ठिर उसके सामने बच्चे जैसे हैं।

पासों के हड्डियों से बने होने या जादुई होने वाली कथाएँ बाद की परंपराओं में मिलती हैं।

पाठ जो साफ़ कहता है वह इतना है — खेल बराबरी का नहीं था, और यह सबको पता था। विदुर ने पहले ही कह दिया था।

तथ्य

दूसरे द्यूत की शर्त क्या थी?

  • सिर्फ़ राज्य हारना
  • चौदह वर्ष वनवास
  • बारह वर्ष वनवास और तेरहवाँ वर्ष अज्ञातवास
  • आजीवन निर्वासन
पूरी कथा पढ़िए — तेरहवाँ वर्ष

पहला द्यूत धृतराष्ट्र के वरों से पलट चुका था — पांडवों को सब लौटा दिया गया था।

रास्ते में ही दूत पहुँचा और दूसरा खेल हुआ, जिसमें एक ही दाँव था।

शर्त में असली पेच तेरहवाँ वर्ष था। बारह वर्ष वन में रहना कठिन ज़रूर था, पर सीधा। अज्ञातवास का अर्थ था बिना पहचाने पूरा एक वर्ष निकालना — और पकड़े जाने पर फिर से बारह वर्ष।

वही तेरहवाँ वर्ष आगे विराट पर्व बनेगा, और उसी पर दुर्योधन की पूरी उम्मीद टिकी रहेगी।

व्यास या परंपरा?

सभा में द्रौपदी के वस्त्र खींचे जाने के समय कृष्ण द्वारा साड़ी को अनंत कर देना — इसके बारे में कौन-सा कथन सही है?

  • यह पाठ का सबसे विस्तृत वर्णन है
  • यह सभा पर्व नहीं, वन पर्व में आता है
  • यह रामायण से आया है
  • यह आलोचनात्मक संस्करण में नहीं मिलता; बाद की पाठ-परंपराओं में यह बहुत प्रसिद्ध हुआ
पूरी कथा पढ़िए — जिस सवाल का जवाब नहीं मिला

द्रौपदी ने सभा में रोने या दया माँगने के बजाय एक क़ानूनी प्रश्न रखा: युधिष्ठिर ने पहले ख़ुद को हारा या मुझे?

अगर वे ख़ुद को पहले हार चुके थे, तो वे दास थे — और दास के पास किसी को दाँव पर लगाने का अधिकार नहीं होता।

भीष्म भी स्पष्ट उत्तर नहीं दे सके। उन्होंने कहा कि धर्म की गति बहुत सूक्ष्म है और इस प्रश्न का निर्णय आसान नहीं। बड़े-बुज़ुर्गों में से कोई निर्णय नहीं दे पाया — विकर्ण ने ज़रूर द्रौपदी के सवाल का समर्थन किया।

यही इस प्रसंग की असली ताक़त है। बाद की लोकप्रिय परंपराओं में इसे चमत्कारिक वस्त्र-वृद्धि के रूप में बहुत विस्तार मिला; पर पाठ में जो चीज़ सभा को हिला देती है, वह एक स्त्री का सवाल है जिसका जवाब किसी के पास नहीं।