पर्व १०

सौप्तिक पर्व

युद्ध ख़त्म हो चुका था। सबसे बुरा काम उसके बाद हुआ।

जंगल में तीन

कौरव पक्ष में लड़ सकने वाले तीन ही बचे थे, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा। तीनों रात में एक जंगल में जा बैठे। दुर्योधन अभी ज़िंदा था, टूटी जाँघ लिए मैदान में पड़ा हुआ।

उल्लू और कौवे

अश्वत्थामा को नींद नहीं आ रही थी। उन्होंने ऊपर देखा। एक पेड़ पर कौवे सो रहे थे। तभी एक उल्लू आया और एक-एक करके उन सोते हुए कौवों को मार गया। अश्वत्थामा देखते रहे। फिर उन्होंने अपने साथियों को जगाया और कहा कि रास्ता मिल गया है।

कृपाचार्य की मनाही

कृपाचार्य ने रोका। उन्होंने कहा कि सोते हुए लोगों को मारना क्षत्रिय का काम नहीं है, कि इससे यश नहीं मिलेगा, और कि रात हो चुकी है, सुबह देखी जाए। अश्वत्थामा ने सुना नहीं। उन्होंने कहा कि उनके पिता को भी नियम से नहीं मारा गया था। तीनों शिविर की ओर चल पड़े।

शिविर का द्वार

शिविर के द्वार पर एक आकृति खड़ी थी, बहुत बड़ी, और अश्वत्थामा के हर हथियार को निगल जाती थी। अश्वत्थामा समझ गए कि यह द्वार हथियार से नहीं खुलेगा। उन्होंने वहीं एक वेदी बनाई, आग जलाई, और स्वयं को ही आहुति के रूप में आगे कर दिया। तब महादेव प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि पांचाल अब तक इसलिए बचे हुए थे क्योंकि कृष्ण उनकी रक्षा कर रहे थे, और अब उनका समय पूरा हो चुका है। फिर उन्होंने अश्वत्थामा को एक तलवार दी, और स्वयं उनके शरीर में प्रवेश कर गए। द्वार खुल गया। पाठ इसे इसी तरह कहता है, कि जो उस रात हुआ, वह अश्वत्थामा अकेले नहीं कर रहे थे।

धृष्टद्युम्न का वध

भीतर सब सो रहे थे। अश्वत्थामा ने पहले धृष्टद्युम्न को खोजा, वही, जिसने उनके पिता का सिर काटा था। उन्होंने उसे नींद से जगाया, ज़मीन पर गिराया, और लात-घूँसों से मार डाला। धृष्टद्युम्न ने तलवार माँगी, ताकि योद्धा की तरह मरें, अश्वत्थामा ने नहीं दी। फिर वे बाक़ी शिविर में गए। द्रौपदी के पाँचों बेटे उसी रात मारे गए, शिखंडी मारा गया, बाक़ी जो बचे थे, वे भी। बाहर कृपाचार्य और कृतवर्मा द्वारों पर खड़े थे, जो भी भागकर निकला, उसे उन्होंने वहीं मार दिया, फिर उन्होंने शिविर में आग लगा दी। पूरी सेना एक रात में ख़त्म हो गई। पाँचों पांडव उस रात शिविर में थे ही नहीं, वे कृष्ण के साथ बाहर ठहरे थे।

मणि और ब्रह्मशिर

सुबह जब यह पता चला, द्रौपदी ज़मीन पर बैठ गईं, उन्होंने कहा कि जब तक अश्वत्थामा के सिर की मणि उन्हें नहीं मिलती, वे नहीं उठेंगी, वह मणि उनके सिर में जन्म से लगी थी। पांडव पीछे गए, अश्वत्थामा घिर गए, और उन्होंने ब्रह्मशिर अस्त्र छोड़ दिया, अर्जुन ने भी वही अस्त्र छोड़ा। व्यास और नारद बीच में आ गए और कहा कि दोनों लौटा लो, नहीं तो कुछ नहीं बचेगा। अर्जुन ने लौटा लिया, अश्वत्थामा नहीं लौटा सके, उन्हें लौटाना आता ही नहीं था। तब उन्होंने उसे पांडव स्त्रियों के गर्भ की ओर मोड़ दिया, उत्तरा के गर्भ में जो बच्चा था, वह उसी अस्त्र से मारा गया। कृष्ण ने वहीं वचन दिया, कि वह बच्चा मरा हुआ ही जन्मेगा, पर वे उसे जिला देंगे। अश्वत्थामा की मणि उतार ली गई, और उन्हें शाप मिला, तीन हज़ार वर्ष तक भटकते रहना, घावों के साथ, अकेले।

टिप्पणी: उल्लू वाला दृश्य, कृपाचार्य का मना करना, शिव का द्वार खोलना, धृष्टद्युम्न का वध, द्रौपदी के पाँच पुत्रों का मारा जाना, मणि, ब्रह्मशिर और कृष्ण का वचन — सब व्यास रचित महाभारत के सौप्तिक पर्व में हैं। पर अश्वत्थामा की अमरता — कि वे आज भी भटक रहे हैं — बाद की धार्मिक परंपरा से आई है। पाठ में शाप तीन हज़ार वर्ष का है, अमरता का नहीं। यह पर्व पूरी कथा का सबसे अंधेरा हिस्सा है, और पाठ इसे बचाने की कोशिश नहीं करता।

स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), सौप्तिक पर्व

अब बताइए — कितना याद रहा?

ऐसा क्यों?

अश्वत्थामा ने रात में सोते हुए शिविर पर हमला किया। पाठ में उसे यह विचार कहाँ से आया?

  • कृतवर्मा ने सुझाया
  • एक उल्लू को पेड़ पर सोते कौवों को मारते देखकर
  • दुर्योधन ने मरते समय कहा था
  • शिव ने आदेश दिया
पूरी कथा पढ़िए — रात का जानवर

कौवे दिन में उस उल्लू को शाखा पर बैठने नहीं देते। रात में वही उल्लू उन्हें एक-एक करके मार गया।

अश्वत्थामा ने इससे कोई नैतिक सीख नहीं ली। उसने इसे तरीक़ा समझा — जो सामने से नहीं जीता जा सकता, उसे सोते हुए मारा जा सकता है।

महाभारत पहले यह दृश्य रखता है, फिर दिखाता है कि अश्वत्थामा ने उससे क्या निष्कर्ष निकाला — और उसके तुरंत बाद कृपाचार्य का विरोध।

सौप्तिक पर्व का केंद्र इसी एक रात का नरसंहार है; उसके बाद पीछा, ब्रह्मशिर और दंड भी इसी पर्व में हैं। यह महाभारत के छोटे और सबसे अँधेरे पर्वों में से एक है।

किसने कहा?

सोते हुए और निहत्थे लोगों को मारना क्षत्रिय-धर्म के विरुद्ध है — अश्वत्थामा को यह किसने समझाया?

  • कृतवर्मा
  • व्यास
  • शिव
  • कृपाचार्य
पूरी कथा पढ़िए — जिसने रोकने की कोशिश की, और फिर साथ चला गया

कृपाचार्य अश्वत्थामा के मामा हैं, और युद्ध भर कौरव पक्ष पर रहे हैं।

उन्होंने इसे क्षत्रिय-धर्म के विरुद्ध बताया, और सुबह तक रुककर धृतराष्ट्र और विदुर से कर्तव्य पूछने को कहा।

अश्वत्थामा का उत्तर यह था कि नियम पहले ही टूट चुके हैं — उसके पिता के साथ, अभिमन्यु के साथ, कर्ण के साथ, दुर्योधन के साथ।

फिर भी कृपाचार्य और कृतवर्मा साथ गए, और द्वारों पर खड़े होकर भागने वालों को मारा। मना करना और फिर साथ चले जाना, दोनों एक ही रात में हैं।

क्या हुआ?

पांडव उस रात शिविर में क्यों नहीं मारे गए?

  • अश्वत्थामा ने उन्हें जान-बूझकर छोड़ दिया
  • वे जाग रहे थे और लड़े
  • वे उस रात शिविर में थे ही नहीं; कृष्ण के साथ बाहर ठहरे थे
  • शिव ने उन्हें बचा लिया
पूरी कथा पढ़िए — एक रात, जो बाहर बीती

पाँचों भाई और कृष्ण उस रात शिविर से बाहर थे। पाठ इसे किसी चेतावनी या भविष्यवाणी से नहीं जोड़ता।

इसका असर यह हुआ कि जीतने वाले बच गए और उनके साथ के लोग मारे गए — सेनापति धृष्टद्युम्न, शिखंडी, उत्तमौजा, युधामन्यु।

द्रौपदी के पाँचों पुत्र भी उसी रात मारे गए। वे शोर सुनकर उठे और सामने आ गए।

इसलिए सुबह जो बचता है, वह जीत नहीं है। पाँच भाई ज़िंदा हैं और उनके आगे कोई नहीं है।

किसका बेटा?

हम पाँच थे, और द्रौपदी हमारी माँ थीं। हम युद्ध में नहीं, युद्ध के बाद एक रात में मारे गए। हम कौन हैं?

  • द्रौपदी के पाँच पुत्र
  • उपपांडव नहीं, बल्कि पांडव स्वयं
  • घटोत्कच और उसके भाई
  • अभिमन्यु और उसके भाई
पूरी कथा पढ़िए — जो वंश नहीं बचा

द्रौपदी के पाँच पुत्र थे, हर पांडव से एक। पाठ उन्हें अलग-अलग नाम देता है, पर कथा में वे लगभग हमेशा साथ आते हैं।

युद्ध के अठारह दिन वे बच गए। मारे वे तब गए जब युद्ध ख़त्म हो चुका था।

इससे पांडवों की अगली पीढ़ी लगभग समाप्त हो जाती है। वंश की एकमात्र आशा उत्तरा के गर्भ में पल रहा बच्चा बचता है।

हस्तिनापुर की गद्दी आख़िर में उसी परीक्षित को मिलती है — अभिमन्यु का पुत्र, यानी पोता, बेटा नहीं। और उसी गर्भ पर इसी रात हमला होता है।

क्या हुआ?

अश्वत्थामा ने ब्रह्मशिर अस्त्र छोड़ा, और उसे लौटाना उसे आता नहीं था। व्यास के कहने पर उसने क्या किया?

  • उसने उसे आसमान की ओर मोड़ दिया
  • उसने उसे अपने ऊपर मोड़ लिया
  • अर्जुन ने उसे रोक लिया
  • उसने उसे पांडव स्त्रियों के गर्भ की ओर मोड़ दिया
पूरी कथा पढ़िए — आख़िरी वार, जो किसी योद्धा पर नहीं था

अर्जुन ने अपना अस्त्र लौटा लिया, क्योंकि उन्हें लौटाना आता था। अश्वत्थामा को सिर्फ़ चलाना आता था।

व्यास और नारद ने उससे कहा कि इसे कहीं और मोड़ दे। उसने जो चुना, वह अजन्मे बच्चे थे।

कृष्ण ने कहा कि वह बच्चा फिर भी जीवित रहेगा — और वही परीक्षित है, जिससे वंश आगे चलता है।

अश्वत्थामा को तीन हज़ार वर्ष अकेले भटकने का शाप मिला, और सिर की मणि उतार ली गई। मणि द्रौपदी के सामने रखी गई, और उन्होंने वह युधिष्ठिर को दे दी।

तथ्य

द्रौपदी ने अश्वत्थामा से क्या माँगा?

  • उसका सिर
  • उसके सिर में जन्म से लगी मणि
  • उसका बंदी बनाया जाना
  • कुछ नहीं
पूरी कथा पढ़िए — जो माँगा नहीं गया

द्रौपदी ने कहा कि वे तब तक अन्न नहीं लेंगी जब तक वह मणि सामने नहीं आती।

पर उन्होंने अश्वत्थामा की मृत्यु नहीं माँगी। उन्होंने कहा कि वह द्रोणाचार्य का पुत्र है, इसलिए उसकी माता कृपी को वही शोक न मिले जो उन्हें मिला है।

यह उसी स्त्री का कहना है जिसने सभा पर्व में बाल खुले रखने की प्रतिज्ञा की थी और तेरह साल निभाई थी।

महाभारत इस पर कोई उपदेश नहीं देता। वह बस दोनों बातें एक ही व्यक्ति में रख देता है।

व्यास या परंपरा?

"अश्वत्थामा अमर है और आज भी भटक रहा है।" — यह कहाँ से है?

  • बाद की धार्मिक परंपरा से; महाभारत के इस प्रसंग में शाप तीन हज़ार वर्ष का है, अमरता का नहीं
  • यह पाठ में साफ़ लिखा है
  • यह गीता में है
  • यह शांति पर्व में है
पूरी कथा पढ़िए — तीन हज़ार वर्ष

कृष्ण का शाप बहुत ठोस है — तीन हज़ार वर्ष अकेले भटकना, बिना किसी संगत के, बिना किसी बस्ती के।

यानी यह मृत्यु से बचना नहीं, मृत्यु के बजाय कुछ और झेलना है।

बाद की परंपराओं में अश्वत्थामा चिरंजीवियों में गिने जाने लगे, और अलग-अलग जगहों पर उनके दिखने की कथाएँ जुड़ती गईं।

फ़र्क़ मायने रखता है। तीन हज़ार वर्ष का दंड ख़त्म होता है; अमरता नहीं होती, और वह सज़ा से ज़्यादा एक दर्जा बन जाती है।

सही क्रम

सौप्तिक पर्व की इन घटनाओं का सही क्रम कौन-सा है?

  • उल्लू का दिखना → शिव का द्वार खोलना → ब्रह्मशिर छोड़ा जाना → धृष्टद्युम्न का वध
  • शिव का द्वार खोलना → उल्लू का दिखना → धृष्टद्युम्न का वध → ब्रह्मशिर छोड़ा जाना
  • उल्लू का दिखना → शिव का द्वार खोलना → धृष्टद्युम्न का वध → ब्रह्मशिर छोड़ा जाना
  • धृष्टद्युम्न का वध → उल्लू का दिखना → शिव का द्वार खोलना → ब्रह्मशिर छोड़ा जाना
पूरी कथा पढ़िए — सबसे छोटा और सबसे भारी

सौप्तिक पर्व महाभारत के छोटे पर्वों में है, और उसका केंद्रीय नरसंहार एक ही रात में घटता है। उसका परिणाम अगले दिन सामने आता है।

इसमें कोई सेना नहीं है, कोई व्यूह नहीं है, कोई नियम नहीं है। अठारह दिन की लड़ाई के बाद यह एक कमरे-कमरे की हत्या है।

जीत और हार दोनों यहाँ अपना मतलब खो देती हैं। जो जीते वे बच गए, पर उनके पास बचा कुछ नहीं।

इसके बाद का पर्व लड़ाई का नहीं, गिनने का है — कौन-कौन मरा, और उन्हें कौन देखने आया।