
पर्व ९
शल्य पर्व
अठारहवाँ दिन, और एक राजा जो अपनी सेना के बचे हुए हिस्से से भागकर पानी में जा छिपा
शल्य-वध
कर्ण के बाद शल्य सेनापति बने। वे आधे दिन से भी कम समय सेनापति रहे। युधिष्ठिर ने उन्हें मारा, शक्ति नाम का भाला फेंककर। पूरे युद्ध में यह उनका सबसे बड़ा वध है, और आते ही चला गया सेनापतित्व शायद ही किसी और के हिस्से आया हो।
शकुनि-वध
उसके बाद जो बचा था वह सेना नहीं थी, बिखरे हुए योद्धा थे, और उनमें भी उम्मीद नहीं बची थी। शकुनि मारा गया, सहदेव के हाथों, वही शकुनि, जिसने पासे फेंके थे, जिसकी एक चाल से पूरा युद्ध शुरू हुआ था। दुर्योधन के भाई एक-एक करके ख़त्म हो गए, भीम ने उन सबको मारने की प्रतिज्ञा की थी, और वह भी पूरी हुई, एक-एक करके, जैसे कोई पुरानी सूची निपटाई जा रही हो।
शाम तक दुर्योधन अकेला था। मैदान में उसके साथ न कोई सेनापति बचा था, न कोई भाई, न कोई सेना। वह मैदान छोड़कर निकल गया और एक सरोवर में जा छिपा, पानी के भीतर, अपनी माया से, जैसे पानी उसे इस युद्ध से बाहर रख सकता हो।
सरोवर में दुर्योधन
पांडव उसे ढूँढ़ते हुए वहीं पहुँचे। वे किनारे खड़े होकर उसे ललकारने लगे। दुर्योधन ने भीतर से कहा कि सब मर चुके हैं, अब राज्य लेकर क्या करेगा, वह थक चुका है, अकेला रह गया है। युधिष्ठिर ने कहा कि बाहर आओ, और फिर उन्होंने एक बात कह दी जो नहीं कहनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि हम पाँच में से किसी एक को चुन लो, अपनी पसंद के हथियार से लड़ो, और अगर जीत गए तो पूरा राज्य तुम्हारा। कृष्ण नाराज़ हुए, उन्होंने कहा कि दुर्योधन तेरह वर्ष से गदा का अभ्यास कर रहा है, और युधिष्ठिर ने जीता हुआ युद्ध एक वाक्य में दाँव पर लगा दिया। दुर्योधन बाहर आया और भीम को चुना, हथियार चुना गदा।
बलराम का आना
लड़ाई शुरू होने से पहले बलराम आ पहुँचे, वे तीर्थयात्रा पर थे और पूरे युद्ध से बाहर रहे थे, न किसी पक्ष में लड़े, न किसी को रोका। भीम और दुर्योधन, दोनों उनके ही शिष्य थे, और गदा उन्हीं से सीखी थी। वे देखने बैठ गए, दोनों तरफ़ से बराबर दूरी बनाए हुए।
गदा-युद्ध
लड़ाई लंबी चली, और दुर्योधन भारी पड़ने लगा, गदा में उसकी पकड़ भीम से बेहतर थी। कृष्ण ने अर्जुन की ओर देखा, और अर्जुन ने अपनी जाँघ थपथपाई। भीम ने इशारा समझ लिया, उन्होंने गदा से दुर्योधन की जाँघ पर वार किया। गदा-युद्ध का नियम था कि कमर के नीचे वार नहीं किया जाता। बलराम खड़े हो गए, उन्होंने कहा कि यह अधर्म है, और वे भीम को मारने के लिए बढ़े। कृष्ण ने उन्हें रोका, उन्होंने याद दिलाया कि भीम ने सभा वाले दिन प्रतिज्ञा की थी, उस दिन, जब दुर्योधन ने द्रौपदी को अपनी जाँघ दिखाई थी, और वह प्रतिज्ञा भी उतनी ही पुरानी थी जितना पुराना यह युद्ध। बलराम माने नहीं, पर लौट गए। दुर्योधन वहीं पड़ा रह गया, टूटी जाँघ के साथ, ज़िंदा, अकेला, मैदान के बीचोंबीच। अठारहवाँ दिन ख़त्म हुआ।
टिप्पणी: शल्य का आधे दिन में मारा जाना, शकुनि का वध, दुर्योधन का सरोवर में छिपना, युधिष्ठिर की शर्त, बलराम का लौटना और जाँघ पर वार — सब व्यास रचित महाभारत के शल्य पर्व में हैं। भीम की प्रतिज्ञा सभा पर्व की है और यहाँ शब्दशः पूरी होती है। पाठ यह नहीं कहता कि वार सही था — बलराम का विरोध वहीं दर्ज है, और कृष्ण का उत्तर भी।
स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), शल्य पर्व