
पर्व १२
शांति पर्व
जीत के बाद युधिष्ठिर ने राज लेने से मना कर दिया। पर्व वहीं से खुलता है, और वही सवाल राजधर्म से मोक्षधर्म तक फैल जाता है।
युधिष्ठिर का इनकार
युद्ध जीत लिया गया था। और युधिष्ठिर बैठ गए। उन्होंने कहा कि यह राज्य अपने ही लोगों को मारकर मिला है, भाइयों को, गुरुओं को, पितामह को। ऐसा राज्य वे नहीं लेंगे, वे वन चले जाएँगे। यह पूरे महाभारत का सबसे लंबा पर्व यहीं से खुलता है।
भाइयों का उत्तर
भीम ने सबसे पहले कहा। उन्होंने कहा कि तेरह साल की तपस्या के बाद अब यह बात करना, तब पासे फेंकने जैसा ही है, कि जो हो चुका उसे न लेना उसे और बेकार कर देना है। उन्होंने यह भी कहा कि युधिष्ठिर हर बार वही करते हैं, जब कुछ करने का समय होता है तब सोचते हैं, और जब सोचने का समय होता है तब वचन दे देते हैं। अर्जुन ने अलग बात कही, उन्होंने कहा कि राज्य छोड़ देना भी एक तरह का सुख ढूँढ़ना है, और तपस्वी बन जाना अपने आप में कोई बड़ा काम नहीं, राजा का काम राज करना है। द्रौपदी ने सबसे तीखी बात कही, उन्होंने कहा कि जिनके पाँच बेटे एक रात में मारे गए हैं, वे अब यह सुनने आई हैं कि यह सब बेकार था।
व्यास आए, नारद आए। आख़िर युधिष्ठिर मान गए, और राज्याभिषेक हुआ। पर सवाल ख़त्म नहीं हुआ था। तब कृष्ण ने कहा कि इसका उत्तर एक ही आदमी दे सकता है, भीष्म, जो अब भी शरशय्या पर हैं और जिनका समय अभी पूरा नहीं हुआ।
शरशय्या तक
सब मैदान की ओर चले। भीष्म वहीं थे, बाणों पर, जहाँ वे दसवें दिन से पड़े थे। युधिष्ठिर उनके पास बैठ गए और पूछने लगे। जो उत्तर मिले, वे इस पर्व के तीन हिस्से हैं।
राजधर्म
पहला हिस्सा राजा के धर्म का है। भीष्म ने बताया कि राजा की ज़रूरत क्यों पड़ी। उन्होंने कहा कि शुरू में कोई राजा नहीं था और किसी की ज़रूरत भी नहीं थी, लोग अपने आप धर्म और नियम पर टिके हुए थे। फिर वह टूटा, तब दंड की ज़रूरत पड़ी, और दंड चलाने के लिए राजा की। यानी इस कथा में राजा की ज़रूरत इसलिए पैदा होती है क्योंकि समाज अपने आप नियम पर नहीं टिक पाया, राजा यहाँ शुरुआत नहीं है, वह बाद में बना एक इंतज़ाम है।
आपद्धर्म
दूसरा हिस्सा सबसे कठिन है। आपद्धर्म का मतलब है, संकट के समय का धर्म। इसमें वे सवाल हैं जहाँ सामान्य नियम काम नहीं करते, जब भूख हो, जब राज्य डूब रहा हो, जब सच बोलने से कोई मर जाए, तब क्या करें। पर्व यहाँ कोई आसान उत्तर नहीं देता, वह कहानियाँ सुनाता है, और हर कहानी में नियम एक तरफ़ और हालात दूसरी तरफ़ होते हैं।
इसी हिस्से में विश्वामित्र की वह कथा आती है जहाँ अकाल में भूख से मरते हुए उन्होंने एक चांडाल के घर से कुत्ते की जाँघ लेकर खाने का निश्चय किया, और उसी से बहस भी की। चांडाल ने रोकते हुए कहा कि यह उनके लिए नहीं है, विश्वामित्र ने उत्तर दिया कि जीवित रहना पहले है, जो बचेगा, वही आगे धर्म कर सकेगा। पाठ इसे सीधे-सीधे ग़लत नहीं कहता, वह नियम और हालात, दोनों को सामने रखकर सवाल खुला छोड़ देता है।
मोक्षधर्म
तीसरा हिस्सा, मोक्षधर्म, सबसे लंबा है। यहाँ बात राज्य से हटकर मुक्ति पर चली जाती है, जन्म, मृत्यु, आत्मा, और वह सवाल कि आदमी करे तो क्या करे। भीष्म कहते हैं कि सुख और दुख दोनों आते-जाते रहते हैं, और जो आदमी उनके पीछे भागता रहता है वह कभी शांत नहीं होता। वे बार-बार लौटकर एक ही बात पर आते हैं, कि बाहर का कुछ भी अपना नहीं है, न राज्य, न शरीर, न वह सब जो जीतकर लिया गया। पर वे यह नहीं कहते कि काम छोड़ दो, वे कहते हैं कि काम करो और फल से मत चिपको। यह वही बात है जो कृष्ण ने युद्ध से पहले अर्जुन से कही थी, पर यहाँ वह उस आदमी से कही जा रही है जो युद्ध जीत चुका है और उसी से दुखी है।
इसी हिस्से में व्यास और उनके पुत्र शुक की कथा आती है। शुक जन्म से ही विरक्त थे, और व्यास उन्हें रोकने की कोशिश करते हैं, पर कोशिश काम नहीं आती, शुक चले जाते हैं और व्यास पीछे पुकारते रह जाते हैं।
इसी बीच नारद युधिष्ठिर को कर्ण की पूरी कथा सुनाते हैं, जन्म से लेकर अंत तक। युधिष्ठिर उसे पहली बार पूरा सुनते हैं, युद्ध ख़त्म होने के बाद। पढ़ने वाला यह कथा अध्याय एक में ही पढ़ चुका होता है, युधिष्ठिर अब सुन रहे हैं। यानी पूरे युद्ध में एक बात ऐसी थी जो पाठक को मालूम थी और लड़ने वाले को नहीं, और जब तक वह उन तक पहुँची, तब तक कुछ बदला नहीं जा सकता था।
टिप्पणी: युधिष्ठिर का इनकार, भीम का उत्तर, राज्याभिषेक, भीष्म के पास जाना, राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्षधर्म — सब व्यास रचित महाभारत के शांति पर्व में हैं। यह पूरे महाभारत का सबसे लंबा पर्व है, और इसमें कथा सबसे कम है। राजा के जन्म की वह व्याख्या — कि पहले राजा नहीं था और ज़रूरत तब पड़ी जब लोग अपने आप धर्म पर नहीं रहे — इसी पर्व की है, और यह भारतीय राजनीतिक चिंतन के सबसे पुराने हिस्सों में गिनी जाती है।
स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), शांति पर्व