
पर्व ११
स्त्री पर्व
इस पर्व में कोई नहीं लड़ता। सब गिनने आते हैं कि कौन-कौन नहीं रहा।
लोहे की मूर्ति
युद्ध के बाद पांडव धृतराष्ट्र के पास गए। धृतराष्ट्र ने कहा कि भीम को गले लगाना है। कृष्ण जानते थे कि यह क्या है, सौ बेटे मारे गए थे, और दुःशासन तथा दुर्योधन को भीम ने ही मारा था, एक अंधे बूढ़े के हाथों में जितनी ताक़त बच सकती है, वह इतनी ही थी कि किसी को भींच सके। उन्होंने भीम को पीछे खींच लिया और उनकी जगह लोहे की एक मूर्ति आगे कर दी। धृतराष्ट्र ने उसे बाहों में भर लिया और भींच दिया। मूर्ति टूट गई, टुकड़े ज़मीन पर बिखर गए। फिर वे रोने लगे, उन्होंने कहा कि उन्होंने भीम को मार दिया। कृष्ण ने बताया कि वह भीम नहीं था। धृतराष्ट्र चुप हो गए, शर्मिंदा भी, राहत में भी।
विदुर का दृष्टांत
विदुर ने धृतराष्ट्र को एक दृष्टांत सुनाया। एक आदमी जंगल में भागते-भागते एक कुएँ में गिर पड़ा। बीच में एक बेल पकड़कर लटक गया। नीचे साँप थे, ऊपर एक हाथी बेल को हिला रहा था, दो चूहे उसी बेल को कुतर रहे थे, और ऊपर एक छत्ते से शहद की बूँदें टपक रही थीं। आदमी उन बूँदों के लिए मुँह खोले लटका रहा, नीचे मौत, ऊपर मौत, और वह बीच में बस उस मीठी बूँद का इंतज़ार करता रहा। विदुर ने कहा कि आदमी की हालत यही है, और यही वजह है कि वह देखते हुए भी नहीं देखता।
मैदान
फिर स्त्रियाँ मैदान में आईं। इस पर्व का बड़ा हिस्सा यही है, कोई लड़ाई नहीं, सिर्फ़ मैदान में घूमती हुई माँएँ, पत्नियाँ और बहनें, जो शवों में अपने लोगों को पहचानने की कोशिश कर रही हैं। कोई अपने बेटे के पास बैठी है, कोई पति के पास, कोई सिर्फ़ खड़ी है, क्योंकि पहचानने लायक़ कुछ बचा नहीं। पाठ यहाँ नाम लेकर बताता है, किसी को छोड़ता नहीं।
उत्तरा अभिमन्यु के पास बैठी हैं, वही लड़की जिसका विवाह विराट पर्व के अंत में हुआ था, और जो अब गर्भवती विधवा है। कर्ण की पत्नियाँ हैं, दुःशासन की, जयद्रथ की। और सौ माँएँ नहीं हैं, एक माँ है, गांधारी, जिसके सौ बेटे इसी मैदान पर पड़े हैं। उन्होंने जीवन भर आँखों पर पट्टी बाँधे रखी थी, क्योंकि उनका पति देख नहीं सकता था, और वे नहीं चाहती थीं कि जो उन्हें दिखे वह उनके पति को न दिखे। आज उन्होंने वह पट्टी नहीं खोली। व्यास ने उन्हें दृष्टि दी, और वे बिना पट्टी हटाए सब देख सकीं, अपने सौ बेटों को, एक-एक करके।
गांधारी का शाप
गांधारी ने कृष्ण की ओर मुँह किया। उन्होंने कहा कि आप चाहते तो यह रोक सकते थे, आपके पास ताक़त थी, और आपने रोका नहीं। फिर उन्होंने शाप दिया, कि जैसे उनका कुल आपस में लड़कर ख़त्म हुआ, वैसे ही कृष्ण का अपना कुल भी आपस में लड़कर ख़त्म होगा, और वे अकेले मरेंगे। कृष्ण ने शाप स्वीकार कर लिया, बिना कोई सफ़ाई दिए। छत्तीस वर्ष बाद वही हुआ।
कुंती का सच
अंत में सबने मरे हुओं के लिए जल दिया। तभी कुंती ने युधिष्ठिर से कहा कि कर्ण के लिए भी जल दो। युधिष्ठिर ने पूछा क्यों, वह तो शत्रु था। तब कुंती ने वह बात कही जो उन्होंने अपने पाँचों बेटों से जीवन भर छिपाई थी, कि कर्ण उनका पुत्र था, पाँचों भाइयों से बड़ा। युधिष्ठिर ने सुना, स्तब्ध रह गए। फिर उन्होंने अपनी माँ को शाप दिया, कि आज से कोई स्त्री कोई बात छिपा नहीं सकेगी।
यह पूरे युद्ध का सबसे भारी क्षण है, और यह युद्ध ख़त्म होने के बाद आता है।
टिप्पणी: लोहे की मूर्ति, विदुर का कुएँ वाला दृष्टांत, गांधारी का शाप, कुंती का सच और युधिष्ठिर का उत्तर — सब व्यास रचित महाभारत के स्त्री पर्व में हैं। इस पर्व में कोई युद्ध नहीं है — पूरा पर्व युद्ध के बाद बचे लोगों के शोक पर है, और इस जगह उसका असर यह होता है कि जीत की उम्मीद करता हुआ पाठक वहीं ठिठक जाता है।
स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), स्त्री पर्व