
पर्व १८
स्वर्गारोहण पर्व
स्वर्ग में सबसे पहले दुर्योधन दिखा। युधिष्ठिर ने कहा कि ऐसा स्वर्ग नहीं चाहिए।
स्वर्ग में दुर्योधन
युधिष्ठिर स्वर्ग पहुँचे। और वहाँ सबसे पहले जो दिखा, वह दुर्योधन था, सिंहासन पर बैठा हुआ, सम्मान के साथ। युधिष्ठिर ने पूछा कि यह यहाँ कैसे। उन्हें बताया गया कि दुर्योधन मैदान में लड़ते हुए मरा था, और वीरों का स्वर्ग हर उस क्षत्रिय को मिलता है जो युद्ध में गिरे, चाहे वह किस ओर से लड़ा हो। युधिष्ठिर ने कहा कि उन्हें ऐसा स्वर्ग नहीं चाहिए। उन्होंने पूछा कि उनके भाई कहाँ हैं, द्रौपदी कहाँ हैं।
नरक का दृश्य
उन्हें ले जाया गया। रास्ता नीचे उतरता गया, और अँधेरा होता गया, बदबू आने लगी, चारों ओर से आवाज़ें आ रही थीं। देवदूत ने कहा कि बस, अब लौट चलिए। तभी अँधेरे से आवाज़ें आईं, रुकिए, मत जाइए, आपके आने से थोड़ी राहत मिल रही है। युधिष्ठिर ने पूछा कि आप कौन हैं। उत्तर आया, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी, कर्ण। युधिष्ठिर वहीं खड़े हो गए। उन्होंने देवदूत से कहा कि वे लौटकर नहीं जाएँगे, उन्होंने कहा कि अगर उनके यहाँ रहने से इन लोगों को कुछ राहत मिल रही है, तो यही उनका स्वर्ग है।
अँधेरे का हटना
उसी क्षण अँधेरा हट गया, बदबू, आवाज़ें, वह पूरा दृश्य, सब चला गया, देवता सामने खड़े थे। इंद्र ने बताया कि जो उन्होंने अभी देखा, वह दैवी माया थी, थोड़ी देर के लिए दिखाया गया एक दृश्य, और आख़िरी परीक्षा। उन्होंने कहा कि हर राजा को नरक एक बार देखना होता है, जिसने पहले अपने अच्छे कर्मों का फल भोग लिया, उसे बाक़ी हिसाब बाद में चुकाना पड़ता है, और जिसने पहले कष्ट भोग लिया, वह बाद में सुख में रहता है। युधिष्ठिर को यह इसलिए भी देखना पड़ा क्योंकि युद्ध में उन्होंने एक बार आधा सच कहा था, अश्वत्थामा के मरने की वह बात, जिसे सुनकर द्रोण ने हथियार रख दिए थे। पूरे जीवन में उनका वही एक झूठ था, और उसका हिसाब यहाँ हुआ।
सब मिले
फिर वे सब मिले, अपने असली रूप में। भाई अपने-अपने देवताओं में लौट गए, उन्हीं में, जिनसे वे जन्मे थे। द्रौपदी वहाँ थीं, कर्ण सूर्य के पास थे, अभिमन्यु, द्रौपदी के पाँचों बेटे, भीष्म, द्रोण, सब वहीं थे। जो मैदान पर आमने-सामने खड़े थे, वे यहाँ आमने-सामने नहीं थे।
कथा का अंत
और कथा वहीं लौट आती है जहाँ से शुरू हुई थी। जनमेजय का यज्ञ अब भी चल रहा है, आग जल रही है। वैशंपायन ने कथा पूरी की। जनमेजय सुनते रहे, यह जानते हुए कि जो सुना है, वह उनके अपने पूर्वजों की कथा है, और जो परीक्षित उनके पिता थे, वे इस कथा के आख़िरी हिस्से में पैदा हुए थे। पर एक घेरा और बाहर है। नैमिषारण्य के वन में ऋषि बैठे हैं, और सौति उन्हें यही सब सुना रहे हैं, जनमेजय का यज्ञ, वैशंपायन का सुनाना, और उसके भीतर की पूरी कथा। वहीं वे कथा ख़त्म करते हैं। यही महाभारत की बनावट है, कोई किसी को सुना रहा है, और सुनने वाला उसी कथा के भीतर खड़ा है।
टिप्पणी: दुर्योधन का स्वर्ग में दिखना, नरक का दृश्य, युधिष्ठिर का रुकने का निर्णय और अँधेरे का हट जाना — सब व्यास रचित महाभारत के स्वर्गारोहण पर्व में हैं। उन्हें दिखाया गया नरक-दृश्य एक दैवी माया और परीक्षा था — यह पाठ ख़ुद कहता है, और इंद्र वहीं इसका कारण भी बताते हैं। कथा जनमेजय के उसी सर्प-सत्र पर लौटती है जहाँ से शुरू हुई थी, और उसके बाहर एक घेरा और है: वही कथा सौति नैमिषारण्य में ऋषियों को सुना रहे हैं। कथा के भीतर कथा, और सुनने वाला उसी कथा का वंशज।
स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), स्वर्गारोहण पर्व