
पर्व ५
उद्योग पर्व
शांति की बात चलती रही। युद्ध भी।
कृष्ण का चुनाव
दोनों पक्ष कृष्ण के पास पहुँचे, दुर्योधन भी, अर्जुन भी। कृष्ण सो रहे थे। दुर्योधन पहले पहुँचा और सिरहाने बैठ गया, अर्जुन बाद में आए और पैरों के पास खड़े हो गए। कृष्ण की आँख खुली तो सामने अर्जुन दिखे। उन्होंने कहा कि दोनों आए हैं, पर पहले उन्होंने अर्जुन को देखा है, और अर्जुन उम्र में छोटे भी हैं, इसलिए चुनने का पहला मौक़ा उन्हीं का है। फिर उन्होंने शर्त रखी। एक तरफ़ वे ख़ुद थे, अकेले, और हथियार नहीं उठाएँगे। दूसरी तरफ़ उनकी पूरी सेना, नारायणी सेना। अर्जुन ने कृष्ण को चुना। दुर्योधन को यह मूर्खता लगी, और वह ख़ुश होकर लौटा कि उसे सेना मिल गई।
विदुर-नीति
पहले संजय गए। धृतराष्ट्र ने उन्हें भेजा था, और उनका काम समझाना था, पांडवों को, कि युद्ध से कुछ नहीं मिलेगा। युधिष्ठिर ने सुना और कहा कि वे भी युद्ध नहीं चाहते। पर उन्होंने यह भी कहा कि जो उनका है वह उन्हें चाहिए, और अगर वह नहीं मिलता तो वे लड़ेंगे। संजय लौट गए।
उस रात धृतराष्ट्र को नींद नहीं आई। उन्होंने विदुर को बुलाया। विदुर उस रात जो बोले, वह विदुर-नीति कहलाती है, राजा को क्या करना चाहिए, किसकी सुननी चाहिए, और कौन-सा आदमी अपना घर ख़ुद जलाता है। धृतराष्ट्र सुनते रहे। उन्होंने बीच में एक बार कहा कि वे जानते हैं क्या ठीक है, पर उनका बेटा नहीं मानेगा, और वे उसे मना नहीं कर सकते। यह पूरे महाभारत का सबसे साफ़ वाक्य है। राजा जानता है, और फिर भी नहीं रोकता।
दोनों ओर सेनाएँ जुटने लगीं। गिनती अक्षौहिणी में होती थी, रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकों का एक तय अनुपात वाला बड़ा दस्ता। पांडवों के पास सात अक्षौहिणी हुईं, कौरवों के पास ग्यारह। पांडवों ने सेनापति चुना धृष्टद्युम्न को, द्रुपद का बेटा, द्रौपदी का भाई। कौरवों ने भीष्म को चुना।
सेनापति बनने के बाद भीष्म ने दोनों ओर के योद्धाओं की गिनती की, कौन रथी है, कौन महारथी। कर्ण के नाम पर उन्होंने कहा कि वे अर्धरथी हैं, यानी आधे दर्जे के। कर्ण भरी सभा में यह सुनकर भड़क गए। उन्होंने वहीं कह दिया कि जब तक भीष्म सेना के आगे हैं, वे हथियार नहीं उठाएँगे। तो कर्ण पहले दस दिन बाहर बैठे रहे।
कृष्ण दूत बनकर
इस बीच संधि की कोशिशें चलती रहीं। आख़िर कृष्ण ख़ुद दूत बनकर हस्तिनापुर गए। उन्होंने बहुत घटाकर माँग रखी, पूरा राज्य नहीं, आधा नहीं, सिर्फ़ पाँच गाँव। दुर्योधन ने भरी सभा में कहा कि वह सुई की नोक बराबर ज़मीन भी नहीं देगा। फिर उसने कृष्ण को ही पकड़ लेने की कोशिश की। कृष्ण ने उसी सभा में अपना विराट रूप दिखाया, इतना बड़ा कि देखने वालों की आँखें बंद हो गईं। उन्हें पकड़ा नहीं जा सका। संधि यहीं ख़त्म हुई।
लौटते हुए कृष्ण ने कर्ण को अलग बुलाया और सच बता दिया, कि वे कुंती के पहले पुत्र हैं, पाँचों भाइयों से बड़े, और इसलिए राज्य पर पहला हक़ उन्हीं का है। कर्ण ने मना कर दिया। फिर कुंती ख़ुद आईं और वही बात कही। कर्ण ने उनसे कहा कि दुर्योधन ने उन्हें तब अपनाया था जब किसी को उनका कुल नहीं पता था, और अब पक्ष बदलना कृतघ्नता होगी। पर उन्होंने एक वचन दिया, वे अर्जुन के अलावा किसी भाई को नहीं मारेंगे। कुंती के पाँच बेटे तब भी पाँच ही रहेंगे, या तो कर्ण, या अर्जुन।
टिप्पणी: कृष्ण और दुर्योधन का चुनाव, अक्षौहिणी की गिनती, भीष्म और कर्ण का विवाद तथा कर्ण का पहले दस दिन युद्ध से बाहर रहना, कृष्ण का दूत बनकर जाना, पाँच गाँव की माँग, विराट रूप, और कर्ण से कृष्ण तथा कुंती की भेंट — सब व्यास रचित महाभारत के उद्योग पर्व में हैं। कर्ण का वचन भी पाठ में है, और वह आगे कर्ण पर्व में शब्दशः निभाया जाता है — वे युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव को हराते हैं पर छोड़ देते हैं।
स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), उद्योग पर्व