
पर्व ३
वन पर्व
बारह वर्ष, और उनमें सुनाई गई इतनी कथाएँ कि पर्व सबसे लंबा हो गया
वन की ओर
पांडव नगर से निकले। लोग साथ-साथ कुछ दूर तक चले, फिर धीरे-धीरे रुकते गए और लौट गए। द्रौपदी साथ थीं, और वे चुप नहीं थीं, इस पूरे पर्व में सबसे तीखी बातें उन्हीं की हैं। एक जगह उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि क्षमा हर समय धर्म नहीं होती, कि जो राजा अन्याय पर हाथ नहीं उठाता, वह धर्म नहीं निभा रहा, वह सिर्फ़ सह रहा है। युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, और उनका उत्तर वही था जो पूरे पर्व में रहेगा, जो वचन दिया गया है, वह पूरा होगा, भले ही उसकी क़ीमत यही हो। यह बहस बारह साल चलती है, बीच-बीच में लौटती रहती है, कभी सुलझी हुई और कभी अधूरी।
अर्जुन का तप
पांडवों को हथियार चाहिए थे। अर्जुन अकेले उत्तर की ओर तप करने गए। एक दिन तप के बीच एक जंगली सूअर उनकी ओर आया, अर्जुन ने बाण चलाया, उसी क्षण एक और बाण उसी सूअर में लगा। सामने एक किरात खड़ा था, भील के भेस में एक शिकारी। दोनों में झगड़ा हुआ कि शिकार किसका है, झगड़ा लड़ाई तक पहुँचा। अर्जुन ने पूरी ताक़त लगा दी और उस शिकारी को हिला भी नहीं सके। आख़िर उन्होंने हार मानकर मिट्टी की एक शिवलिंग बनाई और उस पर फूल चढ़ाए। फूल शिकारी के सिर पर जा गिरे। वह किरात शिव थे। शिव ने प्रकट होकर उन्हें पाशुपतास्त्र दिया, महाभारत के सबसे शक्तिशाली अस्त्रों में से एक, और जिसे अर्जुन आगे कभी चलाते नहीं।
फिर वे इंद्र के लोक गए और वहाँ बरसों दिव्य अस्त्र सीखते रहे। वहीं अप्सरा उर्वशी ने उनसे प्रणय का प्रस्ताव रखा। अर्जुन ने मना कर दिया, उन्होंने कहा कि उनके वंश की एक पूर्वज होने के नाते वे उनके लिए माँ समान हैं। उर्वशी ने अपमानित होकर शाप दिया कि वे एक वर्ष नपुंसक रहेंगे। इंद्र ने बाद में कहा कि यह शाप वरदान बनेगा, तेरहवें वर्ष में यही हुआ भी।
भीम और हनुमान
इधर भीम एक पहाड़ी रास्ते पर चल रहे थे। रास्ते के बीच एक बूढ़ा बंदर लेटा था, अपनी पूँछ फैलाए। भीम ने कहा कि पूँछ हटाओ। बंदर ने कहा, मैं बूढ़ा हूँ, तुम्हीं हटा दो। भीम ने हाथ लगाया, पूँछ हिली नहीं। उन्होंने पूरी ताक़त लगाई, तब भी नहीं। तब उन्होंने समझा कि यह कोई साधारण बंदर नहीं है, और पूछा कि आप कौन हैं। वे हनुमान थे, वायु के पुत्र, यानी भीम के अपने भाई, क्योंकि भीम भी वायु से ही जन्मे थे। हनुमान ने उन्हें आशीर्वाद दिया, और यह भी कहा कि युद्ध के समय वे अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठेंगे। आगे कुरुक्षेत्र में वही हुआ।
वन में सुनी कथाएँ
यह महाभारत के सबसे लंबे पर्वों में से एक है, और इसकी वजह लड़ाई नहीं है। वजह यह है कि वन में ऋषि आते-जाते रहे और कथाएँ सुनाते रहे, और वे कथाएँ पूरी की पूरी इसी पर्व में दर्ज हैं। नल और दमयंती की कथा यहीं है, नल भी जुए में सब कुछ हार गया था, और उसकी पत्नी ने उसे फिर खड़ा किया, यह कथा युधिष्ठिर को इसीलिए सुनाई गई। सावित्री की कथा भी यहीं है, वह स्त्री जो यम के पीछे-पीछे चलती रही और बातों से अपने पति के प्राण वापस ले आई। राम की कथा भी यहीं संक्षेप में सुनाई जाती है, यानी महाभारत के भीतर रामायण भी है, सुनाई हुई कथा के रूप में।
कर्ण का कवच-दान
कर्ण जन्म से कवच और कुंडल पहने हुए थे, शरीर से जुड़े हुए, और जब तक वे थे, उन्हें कोई मार नहीं सकता था। इंद्र, जो अर्जुन के पिता थे, यह जानते थे। एक दिन वे ब्राह्मण का भेस बनाकर कर्ण के पास आए, ठीक उस समय जब कर्ण सूर्य को अर्घ्य देने के बाद खड़े थे, और उस समय वे किसी को मना नहीं करते थे। सूर्य ने कर्ण को पहले ही चेता दिया था कि यह इंद्र हैं और यही माँगने आएँगे। कर्ण ने फिर भी दे दिया। उन्होंने कहा कि यश शरीर से बड़ा है, और अगर आज मना कर दिया तो जो नाम कमाया है वह ख़त्म हो जाएगा। उन्होंने कवच और कुंडल शरीर से काटकर उतारे और दे दिए। इंद्र ने बदले में एक अस्त्र दिया, जो सिर्फ़ एक बार चलाया जा सकता था। वह अस्त्र आगे अर्जुन पर नहीं चलेगा।
घोष-यात्रा
दुर्योधन को यह सूझा कि वन में जाकर पांडवों को उनकी हालत दिखाई जाए। वह अपनी सेना और रानियों के साथ वहीं पास डेरा डालने निकला, बहाना यह था कि गायें देखने जा रहे हैं। वहाँ गंधर्वों से झगड़ा हो गया। गंधर्वों ने दुर्योधन को पकड़ लिया और बाँधकर ले जाने लगे। जो लोग साथ आए थे, वे भागकर पांडवों के पास पहुँचे। युधिष्ठिर ने भीम और अर्जुन को भेजा। भीम ने कहा कि अच्छा हुआ। युधिष्ठिर ने कहा कि आपस में हम पाँच और वे सौ हैं, पर बाहर वालों के सामने हम एक सौ पाँच हैं। पांडवों ने ही जाकर दुर्योधन को छुड़ाया। दुर्योधन के लिए इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता था, वह अपमानित होकर लौटा।
यक्ष के प्रश्न
बारहवाँ वर्ष ख़त्म होने को था। एक दिन प्यास लगी और भाई पानी की तलाश में एक झील पर पहुँचे। नकुल पहले गए, पानी पीने झुके, और गिर पड़े। फिर सहदेव, फिर अर्जुन, फिर भीम, चारों वहीं पड़े रह गए। आख़िर युधिष्ठिर पहुँचे। एक आवाज़ आई, एक यक्ष बोल रहा था, पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, फिर पानी पीना। युधिष्ठिर बैठ गए। यक्ष ने एक के बाद एक प्रश्न पूछे, और वे सब धर्म और जीवन के बारे में थे। सबसे प्रसिद्ध प्रश्न यह था कि दुनिया में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है। युधिष्ठिर ने कहा, रोज़ लोग मरते हैं, सब देखते हैं, और फिर भी हर आदमी जीता ऐसे है जैसे उसे कभी मरना ही न हो।
यक्ष संतुष्ट हुआ। उसने कहा कि एक भाई को जीवित कर देता हूँ, चुन लो। युधिष्ठिर ने नकुल को चुना। यक्ष ने पूछा कि भीम या अर्जुन क्यों नहीं, वे तो ज़्यादा काम आते। युधिष्ठिर ने कहा कि मेरे पिता की दो पत्नियाँ थीं, कुंती का एक पुत्र, मैं, जीवित हूँ, तो माद्री का भी एक जीवित रहना चाहिए। यक्ष ने चारों को उठा दिया। वह यक्ष धर्म थे, युधिष्ठिर के अपने पिता। बारह वर्ष पूरे हो चुके थे, अब तेरहवाँ आना था, और वही सबसे कठिन था।
टिप्पणी: द्रौपदी की बहस, अर्जुन का तप और किरात-रूप में शिव से पाशुपतास्त्र, उर्वशी का शाप, भीम और हनुमान की भेंट, नल-दमयंती और सावित्री की कथाएँ, कर्ण का कवच-दान, घोष-यात्रा और यक्ष-प्रश्न — सब व्यास रचित महाभारत के वन पर्व में हैं। यह महाभारत के सबसे लंबे पर्वों में से एक है, और इसकी वजह यही है: इसमें कथा कम और भीतर सुनाई गई कथाएँ ज़्यादा हैं, और रामायण भी इसी पर्व में संक्षेप में आती है। कर्ण जानते हुए दान करते हैं — सूर्य उन्हें पहले ही चेता चुके हैं, और पाठ में उनका कारण यश है, भोलापन नहीं।
स्रोत: महाभारत (परंपरा में वेदव्यास से संबद्ध), वन पर्व