
कांड ३
अरण्यकांड
जंगल में सब ठीक चल रहा था। फिर एक हिरण दिखा
दंडक वन
राम, सीता और लक्ष्मण दंडक वन की यात्रा करते हुए आगे बढ़ते रहे।
दंडक वन कोई एक जगह नहीं थी। वह दक्षिण की ओर दूर तक फैला एक बहुत बड़ा जंगल था, जिसके भीतर जगह-जगह ऋषियों के आश्रम थे। कहीं कोई आश्रम मिलता, तो तीनों कुछ दिन वहाँ रुकते और फिर आगे बढ़ जाते।
रास्ते में उनका सामना विराध नाम के एक राक्षस से हुआ। राम और लक्ष्मण ने उसे हरा दिया।
लेकिन लगभग हर आश्रम में एक ही शिकायत सुनने को मिलती थी।
राक्षस ऋषियों को चैन से रहने नहीं देते थे। यज्ञ शुरू होते तो उन्हें उजाड़ दिया जाता। तपस्वियों पर हमले होते, और जो ख़ुद हथियार नहीं उठाते थे, उनके पास अपनी रक्षा का कोई साधन नहीं था।
राम ने उन्हें वचन दिया कि वे उनकी रक्षा करेंगे।
आगे दंडक वन में जो कुछ हुआ, उसके पीछे यह वचन भी था।
कुछ समय बाद वे अगस्त्य ऋषि के आश्रम पहुँचे।
अगस्त्य ने राम को कई हथियार दिए — विष्णु का धनुष, इंद्र का तरकश और एक तलवार।
उन्होंने सलाह दी कि आगे गोदावरी नदी के किनारे पंचवटी में रहिए। वहाँ पानी भी है और रहने लायक़ ज़मीन भी।
तीनों पंचवटी पहुँचे और वहीं अपनी कुटिया बनाई।
वनवास के साल बीतते जा रहे थे। चौदह साल का ज़्यादातर हिस्सा निकल चुका था, और अब उसका आख़िरी हिस्सा चल रहा था।
शूर्पणखा
एक दिन पंचवटी में एक राक्षसी पहुँची।
उसका नाम शूर्पणखा था।
वह कोई साधारण वनवासी राक्षसी नहीं थी। वह लंका के राजा रावण की बहन थी।
राम और रावण का अब तक कोई सामना नहीं हुआ था। दोनों की दुनिया अलग थी। राम वनवास में दंडक वन में थे, और रावण समुद्र पार लंका का राजा था।
शूर्पणखा वह कड़ी बनी जिसने पहली बार इन दोनों दुनियाओं को आपस में जोड़ दिया।
उसने राम को देखा और उनकी ओर खिंच गई।
उसने अपना परिचय दिया और राम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा।
राम ने बताया कि सीता उनकी पत्नी हैं। फिर उन्होंने मज़ाक में कहा कि उनका छोटा भाई लक्ष्मण अकेला है, उससे बात कर सकती हो।
शूर्पणखा लक्ष्मण के पास गई।
लक्ष्मण ने भी बात को मज़ाक में टाल दिया और उसे वापस राम के पास भेज दिया।
कुछ देर तक यह सब हँसी-मज़ाक की तरह चलता रहा।
फिर शूर्पणखा की नज़र सीता पर गई।
उसे लगा कि सीता ही उसके और राम के बीच रुकावट हैं।
उसका बर्ताव अचानक बदल गया।
वह सीता पर हमला करने के लिए झपटी।
लक्ष्मण ने तुरंत तलवार निकाली और उसकी नाक और कान काट दिए।
शूर्पणखा चीख़ती हुई वहाँ से भागी।
वह अपने भाइयों खर और दूषण के पास पहुँची, जो उसी इलाक़े में रहते थे।
अपनी बहन की हालत देखकर वे भड़क गए।
कुछ ही समय बाद खर, दूषण और त्रिशिरा चौदह हज़ार राक्षसों की सेना लेकर राम से लड़ने आ पहुँचे।
राम ने सीता और लक्ष्मण को एक गुफा में सुरक्षित भेज दिया और ख़ुद युद्ध के लिए खड़े हो गए।
युद्ध ख़त्म हुआ तो खर, दूषण, त्रिशिरा और उनकी पूरी सेना मारी जा चुकी थी।
अब मामला सिर्फ़ शूर्पणखा के अपमान तक सीमित नहीं रहा था।
रावण के परिवार से जुड़े तीन बड़े राक्षस और चौदह हज़ार सैनिक एक ही आदमी के हाथों मारे जा चुके थे।
इसकी ख़बर लंका तक पहुँची।
और पहली बार रावण का ध्यान राम की ओर गया।
सोने का मृग
शूर्पणखा लंका पहुँची।
उसने रावण को बताया कि उसके साथ क्या हुआ, और उसके भाई खर और दूषण किस तरह मारे गए।
लेकिन उसने सिर्फ़ बदले की बात नहीं की।
उसने रावण के सामने सीता के सौंदर्य का बखान भी किया।
यहीं से रावण की योजना बदल गई।
उसने राम को मारने के लिए सेना भेजने के बजाय सीता का हरण करने का फ़ैसला किया।
लेकिन एक दिक़्क़त थी।
जब तक राम और लक्ष्मण कुटिया के पास थे, सीता को अकेला पाना लगभग नामुमकिन था।
उन्हें वहाँ से दूर ले जाने के लिए रावण को किसी छल की ज़रूरत थी।
और इसके लिए उसे एक ऐसे राक्षस की याद आई, जो राम को पहले से जानता था।
मारीच।
मारीच रावण का मामा था।
राम से उसका सामना सालों पहले हो चुका था, जब राम विश्वामित्र के साथ उनके यज्ञ की रक्षा करने गए थे।
तब राम ने सुबाहु को मार दिया था, और मारीच पर ऐसा अस्त्र चलाया था जो उसे मारता नहीं, दूर फेंक देता था।
मारीच बच गया था।
लेकिन उस एक मुलाक़ात ने उसके भीतर राम का ऐसा डर बैठा दिया था कि वह दोबारा उनसे उलझना नहीं चाहता था।
अब रावण उसी के पास पहुँचा।
उसकी योजना यह थी कि मारीच एक अनोखे हिरण का रूप ले और राम की कुटिया के पास जाए।
सीता उस हिरण को देखेंगी।
राम उसके पीछे जाएँगे।
और जब कुटिया ख़ाली होगी, रावण सीता का हरण कर लेगा।
मारीच ने योजना सुनते ही रावण को रोकने की कोशिश की।
उसने साफ़ कहा कि वह राम की शक्ति देख चुका है। उनसे दुश्मनी करना अपना विनाश बुलाना है।
उसने रावण को सीता का ख़याल छोड़ देने की सलाह दी।
रावण नहीं माना।
मारीच ने बार-बार समझाया।
रावण का फ़ैसला नहीं बदला।
आख़िर उसने मारीच को धमकी दी कि अगर वह साथ नहीं गया, तो वह उसे वहीं मार देगा।
मारीच के सामने अब दो ही रास्ते थे।
रावण के हाथों मरना।
या उस योजना में जाना, जहाँ सामने राम थे।
उसने आख़िर कहा, "तुम्हारे हाथों मरने से अच्छा है, राम के हाथों मरूँ।"
और वह रावण के साथ चल पड़ा।
मारीच ने एक अजीब मृग का रूप ले लिया।
उसका शरीर सोने की तरह चमक रहा था। उस पर चाँदी जैसे धब्बे थे। वह इतना असामान्य और सुंदर था कि जंगल का सचमुच का जानवर लगता ही नहीं था।
वह राम की कुटिया के आसपास घूमने लगा।
सीता की नज़र उस पर पड़ी।
उन्होंने राम से कहा कि अगर हो सके तो उस मृग को पकड़कर लाएँ।
राम धनुष लेकर उसके पीछे निकल पड़े।
मारीच ठीक वही कर रहा था जिसके लिए उसे भेजा गया था।
वह कभी पास आता, फिर दूर भाग जाता।
राम उसका पीछा करते-करते कुटिया से बहुत दूर निकल गए।
आख़िर राम ने उस पर बाण चला दिया।
बाण लगते ही मारीच का छल ख़त्म हो गया।
लेकिन मरने से पहले उसने योजना का आख़िरी हिस्सा पूरा किया।
उसने राम की आवाज़ में पुकारा — "हा सीता! हा लक्ष्मण!"
आवाज़ दूर पंचवटी में कुटिया तक पहुँची।
सीता घबरा गईं।
उन्होंने लक्ष्मण से तुरंत राम के पास जाने को कहा।
लक्ष्मण को भरोसा था कि राम को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकता।
उन्होंने सीता को समझाया कि यह आवाज़ किसी राक्षस का छल हो सकती है, और राम ने उन्हें सीता की रक्षा के लिए वहीं रहने को कहा है।
लेकिन सीता की घबराहट बढ़ती गई।
उन्हें लगने लगा कि राम सचमुच मुसीबत में हैं।
उन्होंने लक्ष्मण से कड़े शब्दों में पूछा कि वे अब भी खड़े क्यों हैं।
आख़िर लक्ष्मण को जाना पड़ा।
लक्ष्मण रेखा
लोकप्रिय रामकथा में लक्ष्मण जाने से पहले एक काम और करते हैं।
वे कुटिया के चारों ओर एक रेखा खींचते हैं।
वे सीता से कहते हैं कि किसी भी हालत में इस रेखा के बाहर मत जाइएगा। जब तक आप इसके भीतर हैं, कोई आपको छू नहीं सकता।
यही वह रेखा है जिसे लोग लक्ष्मण रेखा कहते हैं।
उस कथा में आगे रावण सीता को रेखा के बाहर बुलाने की तरकीब लगाता है — वह भिक्षा लेने से मना कर देता है और कहता है कि देना है तो बाहर आकर दीजिए। सीता बाहर आती हैं, और तभी रावण का रास्ता खुलता है।
वाल्मीकि रामायण में यह रेखा नहीं है।
वहाँ जो होता है, वह आगे लिखा है।
सीता-हरण
अब कुटिया में सीता अकेली थीं।
यही मौक़ा रावण को चाहिए था।
वह साधु का वेश बनाकर वहाँ पहुँचा। हाथ में दंड और भिक्षा का पात्र। उसने बाहर खड़े होकर भिक्षा माँगी।
सीता ने उसे साधु समझा और उसका स्वागत किया।
उन्होंने उसे बैठाया, भिक्षा दी, और उसके पूछने पर अपना परिचय भी दे दिया — कि वे कौन हैं, किसकी पत्नी हैं, और वन में क्यों हैं।
रावण सुनता रहा।
फिर उसने अपना असली परिचय दिया।
उसने कहा कि वह लंका का राजा रावण है, और सीता से कहा कि वे उसके साथ चलें।
सीता ने उसे झिड़क दिया।
और तभी रावण ने अपना असली रूप दिखा दिया।
उसने सीता को उठा लिया।
उसका रथ आकाश में उठा और दक्षिण दिशा की ओर चल पड़ा।
जटायु
रास्ते में किसी ने उसे रोक लिया।
जटायु।
वे बूढ़े गिद्धराज थे और दशरथ के पुराने मित्र।
जटायु ने रावण का रास्ता रोका और उससे लड़ाई की।
उन्होंने रावण का धनुष तोड़ा, उसका रथ तोड़ दिया और उसके सारथी को मार गिराया।
लेकिन जटायु बूढ़े थे।
आख़िर रावण ने उनके पंख काट दिए, और वे धरती पर गिर पड़े।
राम और लक्ष्मण लौटे तो कुटिया ख़ाली थी।
वे सीता को खोजते हुए आगे बढ़े।
रास्ते में उन्हें जटायु मिले — बुरी तरह घायल, लेकिन बोलने भर की साँस अभी बाक़ी थी।
उन्होंने राम को बताया कि सीता का हरण रावण ने किया है, और वह उन्हें दक्षिण दिशा की ओर ले गया है।
इतना कहकर जटायु ने प्राण छोड़ दिए।
राम ने उनका अंतिम संस्कार अपने हाथों किया। जटायु दशरथ के मित्र थे, और राम ने उन्हें अपने परिवार के किसी बड़े की तरह विदा किया।
कबंध
आगे बढ़ते हुए दोनों भाइयों का सामना कबंध नाम के एक राक्षस से हुआ।
वह देखने में अजीब था — बिना सिर का एक विशाल धड़, छाती पर एक आँख, और बहुत लंबी भुजाएँ। वह उन्हीं भुजाओं में जो आता, उसे समेट लेता था।
उसने राम और लक्ष्मण को भी पकड़ लिया।
दोनों ने उसकी भुजाएँ काट दीं।
गिरते हुए कबंध ने उनसे उनका परिचय पूछा, और जब उसे पता चला कि ये कौन हैं, तो उसने अपनी कहानी सुनाई। वह एक शाप के कारण यह रूप पा गया था, और उससे छूटने का एक ही रास्ता था।
उसने राम से कहा कि उसका दाह-संस्कार कर दीजिए।
राम ने वैसा ही किया।
और अग्नि से कबंध अपने पुराने रूप में निकला।
जाने से पहले उसने राम को वह बात बताई जो उस समय सबसे काम की थी।
उसने कहा कि अकेले सीता को खोजना मुमकिन नहीं है। इसके लिए साथ चाहिए, और वह साथ ऋष्यमूक पर्वत पर मिलेगा, जहाँ सुग्रीव रहता है। सुग्रीव के पास वानरों की शक्ति है, और वही मदद कर सकता है।
और उसने यह भी कहा कि रास्ते में पंपा सरोवर के पास शबरी का आश्रम पड़ेगा। वहाँ ज़रूर जाइए।
शबरी
राम और लक्ष्मण शबरी के आश्रम पहुँचे।
शबरी बहुत बूढ़ी थीं।
वे लंबे समय से राम का इंतज़ार कर रही थीं। उनके गुरुओं ने उनसे कहा था कि एक दिन राम उनके आश्रम आएँगे, और शबरी ने उस दिन के इंतज़ार में अपना जीवन बिता दिया था।
जब राम और लक्ष्मण वहाँ पहुँचे, तो शबरी ने उनका स्वागत किया और पूरे आदर के साथ उनकी सेवा की।
उन्होंने राम को आगे का रास्ता बताया — पंपा सरोवर और ऋष्यमूक पर्वत की ओर जाइए, वहीं सुग्रीव है।
लेकिन लोकप्रिय रामकथा में शबरी एक और बात के लिए सबसे ज़्यादा जानी जाती हैं।
कहा जाता है कि जब राम उनके आश्रम पहुँचे, तो शबरी ने उन्हें बेर खाने को दिए।
वे हर बेर पहले ख़ुद चखती थीं।
जो मीठा होता, वही राम को देतीं।
जो खट्टा होता, उसे अलग रख देतीं।
उनका मक़सद सिर्फ़ इतना था कि राम को सबसे अच्छे बेर ही मिलें।
लोकप्रिय कथा में राम ने वे बेर प्रेम से खाए।
इस कहानी में शबरी की भक्ति किसी बड़े अनुष्ठान में नहीं दिखती। वह एक बहुत मामूली बात में दिखती है — वे राम को वही देना चाहती थीं जो उनके पास सबसे अच्छा था।
इसके बाद राम और लक्ष्मण फिर आगे बढ़े।
दो लोग।
न कोई सेना।
न यह पता कि सीता कहाँ हैं।
बस एक नाम — सुग्रीव।
टिप्पणी: शूर्पणखा, खर-दूषण-त्रिशिरा की चौदह हज़ार की सेना (सर्ग २२, जिसे राम अकेले ख़त्म करते हैं), सोने का मृग, सीता-हरण, जटायु, कबंध और शबरी — सब वाल्मीकि के अरण्यकांड में हैं। पर "लक्ष्मण रेखा" वाल्मीकि रामायण में नहीं है। वहाँ लक्ष्मण जाने से पहले कोई रेखा नहीं खींचते, और रावण सीता को बाहर बुलाने की शर्त नहीं रखता — वह साधु के वेश में आता है, बातचीत करता है, अपना परिचय देता है और फिर हरण करता है। रेखा वाला रूप बाद की लोक-परंपराओं और क्षेत्रीय रामायणों से आया है, और आज सबसे ज़्यादा सुनाए जाने वाले प्रसंगों में एक है। शबरी के चखे हुए बेर भी वाल्मीकि में नहीं हैं — वहाँ वे राम का आदर करती हैं और उन्हें आगे का रास्ता बताती हैं। बेर वाली कथा बाद की परंपरा की है। पंचवटी में कितने साल बीते, यह भी वाल्मीकि नहीं बताते — इसीलिए यहाँ कोई अवधि नहीं दी गई। रावण ने सीता को बारह महीने की मोहलत दी थी (३.५६.२४), जिसका हिसाब सुंदरकांड में लौटता है।
स्रोत: वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड