कांड २

अयोध्याकांड

एक वचन, और पूरा राजघराना बिखर गया

राजतिलक की तैयारी

दशरथ अब उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच चुके थे जहाँ राजा अपने बाद की व्यवस्था के बारे में सोचने लगता है।

एक दिन उन्होंने सभा बुलाई और प्रस्ताव रखा कि राम को युवराज बना दिया जाए।

सभा में किसी ने विरोध नहीं किया। निर्णय तुरंत मान लिया गया।

राजतिलक अगले ही दिन होना था।

अयोध्या रातों-रात सजने लगी। द्वारों पर तोरण बाँधे गए, छतों पर ध्वजाएँ लगीं, गलियों में दीप सजाए गए।

राम को बुलाकर निर्णय की सूचना दी गई। उन्होंने सीता के साथ उस रात व्रत रखा, जैसा राजतिलक से पहले किया जाता था।

पूरा नगर अगली सुबह का इंतज़ार कर रहा था।

लेकिन एक आदमी को इस सबकी कोई ख़बर नहीं थी।

भरत उस समय अयोध्या में नहीं थे। वे अपने ननिहाल, केकय देश गए हुए थे।

मंथरा और दो वर

उसी रात मंथरा महल की छत पर पहुँची।

वह कैकेयी की पुरानी दासी थी, जो उनके मायके से ही उनके साथ आई थी।

ऊपर से उसने सजी हुई अयोध्या देखी। घरों पर दीप जल रहे थे, रास्तों पर लोगों की आवाजाही थी, और पूरा नगर किसी बड़े उत्सव की तैयारी में था।

वह तुरंत नीचे आई और कैकेयी के पास पहुँची।

उसने उन्हें एक पुरानी बात याद दिलाई।

बहुत साल पहले देवताओं और असुरों के एक युद्ध में दशरथ घायल हो गए थे। कैकेयी ने उन्हें रणभूमि से सुरक्षित बाहर निकाला था। ख़ुश होकर दशरथ ने उन्हें दो वर दिए थे — जब चाहें, जो चाहें माँग सकती थीं।

कैकेयी ने उस समय कुछ नहीं माँगा था।

वे दोनों वर अब तक बाक़ी थे।

मंथरा ने कैकेयी से कहा, "कल राम राजा बनेंगे। भरत यहाँ हैं भी नहीं। उसके बाद इस महल में तुम्हारी और तुम्हारे बेटे की जगह क्या रह जाएगी?"

धीरे-धीरे कैकेयी का मन बदल गया।

वे कोपभवन में चली गईं — महल का वह कमरा जहाँ रानी नाराज़ होने पर जाकर बैठती थी।

दशरथ को पता चला तो वे उन्हें मनाने पहुँचे।

उन्होंने कारण पूछा, समझाने की कोशिश की, लेकिन कैकेयी चुप रहीं।

आख़िर दशरथ ने वचन दे दिया कि वे जो भी माँगेंगी, उन्हें मिलेगा।

तभी कैकेयी ने अपने दोनों पुराने वर माँग लिए।

पहला — भरत को राज्य मिले।

दूसरा — राम चौदह साल के लिए वन जाएँ।

दशरथ के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

उन्होंने कैकेयी को समझाने की कोशिश की। विनती की। रोए। यहाँ तक कि बेहोश हो गए।

लेकिन वचन दिया जा चुका था।

राजा का दिया हुआ वचन उन दिनों निजी बात नहीं मानी जाती थी। उसकी साख और उसके राज्य का भरोसा उसी पर टिका होता था।

दशरथ अपने ही वचन में फँस चुके थे।

वन की ओर

राम को बुलाकर सब बताया गया।

उन्होंने न विरोध किया, न कोई सवाल उठाया।

उनके लिए पिता का वचन ही काफ़ी था।

सीता को समझाया गया कि वन का जीवन कठिन होगा। वहाँ न महल होगा, न सुविधाएँ, न पक्का भोजन।

उन्हें अयोध्या में ही रहने को कहा गया।

सीता ने साफ़ मना कर दिया।

जहाँ राम रहेंगे, वे भी वहीं रहेंगी।

लक्ष्मण को रोकने की कोशिश भी बेकार थी।

तीनों ने राजसी कपड़े उतार दिए और वल्कल पहन लिए — पेड़ की छाल से बने वे कपड़े जिन्हें वनवासी और तपस्वी पहनते थे।

जो राम अगले दिन राजतिलक के लिए पहनने वाले थे, वह सब पीछे छूट गया।

मंत्री सुमंत्र रथ लेकर उन्हें अयोध्या से बाहर तक छोड़ने चले।

नगर के लोग भी रथ के पीछे-पीछे निकल पड़े।

कुछ दूर तक भीड़ साथ चलती रही। फिर धीरे-धीरे लोग रुकते गए और लौटते गए।

केवट

गंगा के किनारे शृंगवेरपुर पहुँचकर उनकी मुलाक़ात निषादराज गुह से हुई। वे उस इलाक़े के मुखिया और राम के पुराने मित्र थे।

गुह ने नाव का इंतज़ाम कराया, और तीनों ने गंगा पार की।

इसी पार उतरने की घड़ी को लोकप्रिय रामकथा एक और तरह से सुनाती है — और वही रूप घर-घर में सबसे ज़्यादा सुनाया जाता है।

उसमें नाव चलाने वाले का नाम केवट है।

राम ने उससे नदी पार कराने के लिए कहा।

केवट तैयार था, लेकिन उसकी एक शर्त थी।

वह चाहता था कि राम नाव में बैठने से पहले उसे अपने चरण धोने दें।

उसने राम के बारे में एक कथा सुन रखी थी।

लोकप्रिय कथा के मुताबिक़ अहल्या शाप के कारण पत्थर बन गई थीं, और राम के चरणों का स्पर्श मिलते ही फिर अपने असली रूप में लौट आई थीं।

केवट ने हँसते हुए कहा कि उसकी नाव तो लकड़ी की है। अगर राम के चरण छूते ही वह भी किसी स्त्री में बदल गई, तो उसके पास कमाने के लिए दूसरी नाव नहीं है।

इसलिए पहले चरण धो लेने दीजिए।

राम मुस्करा दिए।

केवट ने उनके चरण धोए। फिर राम, सीता और लक्ष्मण को अपनी नाव में बैठाकर गंगा पार करा दी।

दूसरे किनारे पहुँचकर राम उसे नाव का किराया देना चाहते थे।

केवट ने लेने से मना कर दिया।

उसका तर्क था कि दोनों एक ही काम करते हैं।

वह लोगों को नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे पहुँचाता है।

और राम लोगों को संसार के पार पहुँचाते हैं।

एक नाविक दूसरे नाविक से किराया कैसे ले सकता है?

उसने सिर्फ़ इतना माँगा कि जैसे आज उसने राम को गंगा पार कराई है, वैसे ही कभी समय आने पर राम भी उसे भवसागर पार करा दें।

दशरथ की मृत्यु

सुमंत्र को वहीं से लौटना था।

वे ख़ाली रथ लेकर अयोध्या वापस आए।

जिस रथ में राम बैठकर गए थे, वही रथ अब बिना राम के नगर से होकर महल की ओर जा रहा था।

पीछे अयोध्या में दशरथ की हालत लगातार बिगड़ती गई।

छठी रात उन्होंने प्राण छोड़ दिए।

आख़िरी समय में उन्हें अपनी जवानी की एक पुरानी घटना याद आ रही थी।

बहुत पहले शिकार के दौरान उन्होंने अँधेरे में पानी भरने की आवाज़ सुनी थी। उन्हें लगा कि पानी पीता कोई हाथी है, और उन्होंने आवाज़ की दिशा में बाण चला दिया।

वहाँ कोई हाथी नहीं था।

एक लड़का था, जो अपने अंधे माता-पिता के लिए पानी भरने आया था।

उसकी मृत्यु के बाद उसके पिता ने दशरथ को शाप दिया था कि एक दिन वे भी अपने बेटे के वियोग में प्राण देंगे।

वह दिन आ चुका था।

खड़ाऊँ और नंदिग्राम

भरत जब ननिहाल से लौटे, तब तक सब बदल चुका था।

पिता की मृत्यु हो चुकी थी।

राम वन जा चुके थे।

और सिंहासन उनके सामने रखा था।

भरत सीधे अपनी माँ कैकेयी के पास पहुँचे।

उन्होंने साफ़ कहा कि जो कुछ हुआ, उसमें उनकी कोई सहमति नहीं थी, और वे इस तरह मिला राज्य स्वीकार नहीं करेंगे।

इसके बाद वे राम को वापस लाने के लिए चित्रकूट की ओर चल पड़े।

वे अकेले नहीं थे। उनके साथ तीनों माताएँ, मंत्री और बड़ी संख्या में अयोध्या के लोग भी थे।

चित्रकूट में दोनों भाई मिले।

भरत ने राम से लौटने की विनती की।

उन्होंने कहा कि पिता अब नहीं रहे, अयोध्या राजा के बिना है, और जिस वचन के कारण राम वन आए थे, उसे देने वाला भी अब जीवित नहीं है।

लेकिन राम नहीं माने।

उनके लिए पिता का दिया वचन उनकी मृत्यु के साथ ख़त्म नहीं हो सकता था।

जो कहा गया था, उसे पूरा होना ही था।

भरत ने बहुत समझाया, लेकिन राम लौटने को तैयार नहीं हुए।

तब भरत ने उनसे एक अलग बात माँगी — अपनी खड़ाऊँ दे दीजिए।

राम ने अपनी खड़ाऊँ उतारकर भरत को दे दीं।

भरत उन्हें लेकर अयोध्या लौटे।

उन्होंने वे खड़ाऊँ सिंहासन पर रखीं और ख़ुद राजा की तरह महल में रहने से इनकार कर दिया।

वे अयोध्या के बाहर नंदिग्राम में रहने लगे, और वहीं से राज्य चलाया।

चौदह साल तक शासन भरत के हाथ में रहा, लेकिन राजा के रूप में नहीं।

सिंहासन पर राम की खड़ाऊँ रखी रहीं।

और राज्य राम के नाम से चलता रहा।

टिप्पणी: मंथरा, दो वर, वनवास, निषादराज गुह, चित्रकूट, दशरथ की छठी रात को मृत्यु (सर्ग ६४) और भरत का खड़ाऊँ लेकर नंदिग्राम में बैठना — सब वाल्मीकि के अयोध्याकांड में हैं। पर केवट का प्रसंग वाल्मीकि में नहीं है। वाल्मीकि में गंगा पार करना और गुह का नाव का इंतज़ाम कराना मिलता है; चरण धोने, नाव के स्त्री बन जाने के डर और किराया न लेने वाला हिस्सा तुलसीदास की *रामचरितमानस* और लोक-परंपरा से आया है। अहल्या भी वाल्मीकि में पत्थर नहीं बनी थीं — वे शाप के कारण किसी को दिखाई नहीं देती थीं। पत्थर वाली कथा भी बाद की परंपरा की है। जिस बालक को दशरथ ने अनजाने में मारा, उसका नाम वाल्मीकि नहीं देते — पाठ उसे सिर्फ़ "ऋषि का पुत्र", "तपस्वी", "वनवासी" कहता है (सर्ग ६३)। "श्रवण कुमार" नाम बाद की परंपरा का है, और अग्नि पुराण (६.३७–३८) उसी बालक को यज्ञदत्त कहता है।

स्रोत: वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड

अब बताइए — कितना याद रहा?

किसने कहा?

दो पुराने वचनों की याद दिलाकर कैकेयी को किसने भड़काया?

  • कौसल्या
  • मंथरा
  • सुमित्रा
  • कैकेयी
पूरी कथा पढ़िए — मंथरा कौन थी

मंथरा कैकेयी की निजी दासी थी। वाल्मीकि उसे कुबड़ी बताते हैं।

जिस रात राजतिलक की घोषणा हुई, वह महल की छत पर चढ़ी और पूरे नगर को सजा हुआ देखा। नीचे उतरकर उसने सोती हुई कैकेयी को जगाया।

उसने कैकेयी को यह नहीं कहा कि राम बुरे हैं। उसने सिर्फ़ यह कहा कि राम के राजा बनते ही भरत जीवन भर दूसरे नंबर पर रहेंगे, और कैकेयी कौसल्या की दासी जैसी हो जाएँगी।

दिलचस्प बात यह है कि पहली प्रतिक्रिया में कैकेयी ख़ुश हुई थीं। उन्होंने मंथरा को गहना तक देना चाहा। बात पलटने में मंथरा को कई बार समझाना पड़ा।

पहेली

मैं सिंहासन पर रखी गई, पर मैं न रानी थी न राजा। चौदह साल राज मेरे नाम पर चला। मैं क्या हूँ?

  • मुकुट
  • छत्र
  • राजदंड
  • खड़ाऊँ
पूरी कथा पढ़िए — खड़ाऊँ से राज कैसे चला

भरत ने खड़ाऊँ माँगते हुए साफ़ शर्त रखी थी: चौदह साल पूरे होते ही राम लौट आएँ। अगर उस दिन राम न लौटे, तो भरत आग में प्रवेश कर जाएँगे।

इसीलिए वे गिनती रखते थे। यह भावुक बात नहीं थी — उन्होंने अपनी जान उस तारीख़ पर टाँग दी थी।

खड़ाऊँ सिंहासन पर रखी जातीं, और राज के हर फ़ैसले को उनके सामने रखा जाता। भरत ख़ुद वल्कल पहनते, ज़मीन पर सोते, और अपने लिए राजा जैसा जीवन नहीं जीते थे।

तथ्य

कैकेयी ने दूसरे वचन में राम के लिए कितने वर्ष का वनवास माँगा?

  • चौदह वर्ष
  • बारह वर्ष
  • ग्यारह वर्ष
  • सोलह वर्ष
पूरी कथा पढ़िए — चौदह ही क्यों?

वाल्मीकि इसका कारण नहीं बताते। कैकेयी बस यह संख्या कहती हैं, और कोई उनसे पूछता नहीं कि चौदह ही क्यों।

बाद की परंपराओं में इसके कई कारण गढ़े गए। मूल पाठ में ऐसा कुछ नहीं है।

जो बात पाठ में है, वह यह कि अवधि इतनी लंबी रखी गई कि लौटने तक भरत का राज जम चुका हो।

कौन हूँ मैं?

मैं राजा नहीं था, पर मेरा अपना राज्य था। मैंने तीन राजकुमारों को अपनी नाव से नदी पार उतारा। मैं कौन हूँ?

  • सुमंत्र
  • जनक
  • गुह
  • जटायु
पूरी कथा पढ़िए — निषादराज गुह

गुह शृंगवेरपुर के निषादों के राजा थे — नाव चलाने और शिकार पर जीने वाले लोग।

वाल्मीकि उन्हें राम का पुराना मित्र बताते हैं। जब राम पहुँचे, गुह पूरा स्वागत लेकर आए — भोजन, बिस्तर, सब।

राम ने सब लौटा दिया और कहा कि वे अब तपस्वी की तरह रहेंगे। उस रात लक्ष्मण और गुह पहरा देते रहे, और राम ज़मीन पर सोए।

अगली सुबह गुह ने उन्हें पार उतार दिया। यह छोटी-सी घटना आगे काम आई — लौटते समय भी यही रास्ता पड़ा।

क्या हुआ?

राम के वन जाने के बाद अयोध्या में दशरथ के साथ क्या हुआ?

  • छठी रात को उनकी मृत्यु हो गई
  • वे भी वन चले गए
  • उन्होंने कैकेयी को राज्य से निकाल दिया
  • वे भरत के राजतिलक तक जीवित रहे
पूरी कथा पढ़िए — दशरथ की आख़िरी रात

मरने से पहले दशरथ ने कौसल्या से अपनी जवानी की एक बात कही, जो उन्होंने आज तक किसी को नहीं बताई थी।

युवावस्था में वे शब्दभेदी बाण चलाना जानते थे — आवाज़ सुनकर निशाना लगाना। एक रात नदी किनारे उन्हें पानी भरने की आवाज़ आई। उन्होंने हाथी समझकर बाण चला दिया।

वह एक तपस्वी बालक था, जो अपने अंधे माता-पिता के लिए पानी लेने आया था। बालक के पिता ने दशरथ को शाप दिया: तुम भी पुत्र-वियोग में ही मरोगे।

दशरथ ने कौसल्या से कहा कि वह शाप अब पूरा हो रहा है। उसी रात उनकी मृत्यु हो गई।

वाल्मीकि या परंपरा?

दशरथ के हाथों अनजाने में एक तपस्वी बालक के वध वाली कथा — इसके बारे में कौन-सा कथन सही है?

  • यह पूरी कथा बाद की परंपरा से आई है
  • कथा वाल्मीकि में है, पर उस बालक का नाम "श्रवण कुमार" वहाँ नहीं मिलता
  • कथा भी और नाम भी वाल्मीकि में हैं
  • यह महाभारत की कथा है
पूरी कथा पढ़िए — नाम कहाँ से आया

यह उन जगहों में से एक है जहाँ लोकप्रिय स्मृति और मूल पाठ अलग हो जाते हैं।

वाल्मीकि की कथा में बालक बस एक तपस्वी का पुत्र है। उसका नाम नहीं आता। शाप देने वाले माता-पिता के नाम भी नहीं आते।

"श्रवण कुमार" नाम बाद की कथा-परंपरा में जुड़ा, और वहीं से वह चित्र भी आया जिसमें बालक काँवर में माता-पिता को उठाए चल रहा है — जो वाल्मीकि में नहीं है।

कथा का मर्म दोनों जगह एक ही है: दशरथ की मृत्यु अचानक नहीं थी, वह बरसों पहले तय हो चुकी थी।

सही क्रम

इन घटनाओं का सही क्रम कौन-सा है?

  • कैकेयी का वचन माँगना → मंथरा का भड़काना → दशरथ की मृत्यु → भरत का लौटना
  • मंथरा का भड़काना → दशरथ की मृत्यु → कैकेयी का वचन माँगना → भरत का लौटना
  • भरत का लौटना → मंथरा का भड़काना → कैकेयी का वचन माँगना → दशरथ की मृत्यु
  • मंथरा का भड़काना → कैकेयी का वचन माँगना → दशरथ की मृत्यु → भरत का लौटना
पूरी कथा पढ़िए — एक रात, और उसके बाद सब

ध्यान देने लायक़ बात यह है कि पूरा कांड कितनी तेज़ी से घटता है।

राजतिलक की घोषणा और राम के वन जाने के बीच सिर्फ़ एक रात है। मंथरा का भड़काना, कैकेयी का कोपभवन, दशरथ का वचन, और सुबह होते-होते तीन लोग वल्कल पहने नगर से बाहर।

दशरथ की मृत्यु छठी रात को होती है। भरत को बुलाने वाले दूत उसके बाद निकलते हैं, और भरत को अयोध्या पहुँचने में और कई दिन लगते हैं।

यानी भरत जब लौटते हैं, तब तक सब कुछ ख़त्म हो चुका होता है। उन्हें कुछ रोकने का मौक़ा कभी मिला ही नहीं।

कौन हूँ मैं?

मैं रथ लेकर उन्हें छोड़ने गया था। लौटते समय रथ ख़ाली था, और मैं घोड़ों को ठीक से हाँक भी नहीं पा रहा था। मैं कौन हूँ?

  • गुह
  • वशिष्ठ
  • सुमंत्र
  • शत्रुघ्न
पूरी कथा पढ़िए — सुमंत्र की वापसी

सुमंत्र सिर्फ़ सारथी नहीं थे। वे दशरथ के पुराने मंत्रियों में से थे, और राम को गोद में खिलाया हुआ था।

राम ने उन्हें बार-बार लौट जाने को कहा। सुमंत्र रुके रहे, फिर मजबूरी में लौटे।

वाल्मीकि लिखते हैं कि लौटते समय घोड़े भी आगे बढ़ने से हिचक रहे थे।

अयोध्या पहुँचकर उन्हें दशरथ को यह बताना पड़ा कि राम अब गंगा पार जा चुके हैं। यह ख़बर देने वाले वही थे।

ऐसा क्यों?

भरत ने राज अयोध्या के महल से नहीं, बाहर नंदिग्राम में बैठकर चलाया। ऐसा क्यों?

  • क्योंकि अयोध्या में महामारी फैल गई थी
  • क्योंकि वे ख़ुद को राजा नहीं, सिर्फ़ राम का प्रतिनिधि मानते थे
  • क्योंकि कैकेयी ने उन्हें महल से निकाल दिया था
  • क्योंकि नंदिग्राम राजधानी थी
पूरी कथा पढ़िए — नंदिग्राम के चौदह साल

भरत ने अपने लिए राजा जैसा जीवन नहीं जिया। उन्होंने वल्कल पहने, जटा रखी, ज़मीन पर सोए और वही खाया जो एक वनवासी खाता।

अंतर सिर्फ़ इतना था कि वे वन में नहीं थे — वे राज चला रहे थे, नगर के बाहर बैठकर।

यह दिखावा नहीं था। यह एक तरह की घोषणा थी: जिस गद्दी पर वे बैठ सकते थे, उस पर उन्होंने अपने भाई की खड़ाऊँ रखीं और ख़ुद बाहर बैठ गए।

तथ्य

गंगा पार करने के बाद राम, सीता और लक्ष्मण ने कहाँ कुटिया बनाकर रहना शुरू किया?

  • चित्रकूट
  • पंचवटी
  • किष्किंधा
  • शृंगवेरपुर
पूरी कथा पढ़िए — चित्रकूट में भाइयों की भेंट

चित्रकूट मंदाकिनी नदी के पास का एक शांत पहाड़ी इलाक़ा था। वाल्मीकि इसका वर्णन बहुत सुंदर करते हैं — यह पूरे कांड का सबसे शांत हिस्सा है।

यहीं भरत सेना, मंत्री और तीनों माताओं को लेकर पहुँचे। लक्ष्मण ने दूर से धूल उठती देखी और समझा कि भरत लड़ने आ रहे हैं। राम ने उन्हें रोका।

भरत आए और राम के पैरों में गिर पड़े। फिर लंबी बहस हुई — दोनों भाई एक-दूसरे को समझाते रहे कि सिंहासन दूसरे का है।

अंत में भरत खड़ाऊँ लेकर लौटे। इसके बाद राम ने चित्रकूट छोड़कर दंडकारण्य की ओर जाने का निर्णय किया। वहाँ अब अयोध्या से लोगों का आना-जाना भी बढ़ गया था।