
कांड १
बालकांड
अयोध्या को एक वारिस चाहिए था
पुत्रकामेष्टि यज्ञ
सरयू के किनारे बसा अयोध्या उन दिनों अपने सबसे अच्छे समय से गुज़र रहा था।
कोसल का राज्य दूर-दूर तक फैला था। नगर की सड़कें चौड़ी थीं और उन पर रोज़ पानी छिड़का जाता था। कोष भरा हुआ था, अन्न की कमी नहीं थी, और सीमा पर कोई शत्रु नहीं था।
राजा दशरथ के पास वह सब था जो एक राजा चाहता है — सेना, कोष, और तीन रानियाँ: कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा।
केवल एक चीज़ की कमी थी।
कोई संतान नहीं थी।
यह सिर्फ़ मन का दुख नहीं था। दशरथ की उम्र बढ़ रही थी, और उनके बाद सिंहासन सँभालने वाला कोई नहीं था। उत्तराधिकारी के बिना राजघराने में सत्ता की लड़ाई छिड़ सकती थी। दशरथ को सबसे ज़्यादा चिंता उसी की थी।
एक दिन उन्होंने अपने गुरु वशिष्ठ को बुलाया। वशिष्ठ राजपरिवार के सबसे पुराने सलाहकार थे — वह आदमी जिसकी बात दशरथ बिना पूछे मान लेते थे।
वशिष्ठ ने पहले अश्वमेध यज्ञ की सलाह दी।
यह संतान का उपाय नहीं था। यह वह अनुष्ठान था जिससे राजा अपनी सर्वोच्च सत्ता की घोषणा करता था।
एक घोड़ा साल भर के लिए खुला छोड़ दिया जाता, और सेना उसके पीछे चलती। वह जिन-जिन राज्यों से बिना रोके गुज़र जाता, वे राजा उसकी सत्ता मान लेते थे। जो घोड़े को रोक लेता, वह चुनौती देता था — और फिर युद्ध होता। साल पूरा होने पर घोड़ा लौटता, और तब यज्ञ पूरा होता।
दशरथ का अश्वमेध बिना किसी रुकावट के पूरा हुआ।
पर उससे वह नहीं मिला जो वे चाहते थे।
इसके बाद वशिष्ठ ने ऋषि ऋष्यशृंग को बुलवाया। उनकी देखरेख में पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया गया — संतान की कामना से किया जाने वाला विशेष यज्ञ।
एक के बाद एक आहुतियाँ अग्नि में पड़ती रहीं, और लपटें ऊँची उठती गईं।
तभी अग्नि के बीच से एक दिव्य पुरुष निकला।
उसके हाथ में सोने का पात्र था, जिसमें पायस भरा था — दूध और चावल से बनी खीर, लेकिन यह किसी रसोई में नहीं बनी थी।
"इसे अपनी रानियों में बाँट दीजिए," उसने कहा।
फिर वह वैसे ही चला गया जैसे आया था।
दशरथ ने वह पायस तीनों रानियों में बाँट दिया।
समय पूरा हुआ, और अयोध्या में एक ही ऋतु में चार बेटे जन्मे — कौसल्या से राम, कैकेयी से भरत, और सुमित्रा से दो, लक्ष्मण और शत्रुघ्न।
चारों साथ बड़े हुए।
पर बहुत जल्दी एक बात दिखने लगी, जो किसी ने सिखाई नहीं थी।
लक्ष्मण जहाँ भी होते, उनकी आँखें राम को खोजतीं। राम उठकर चलते तो लक्ष्मण पीछे चल देते। इसी तरह शत्रुघ्न भरत के साथ रहते।
चार भाई थे, पर वे दो-दो की जोड़ियों में बँट गए थे।
यह जोड़ी उम्र भर नहीं टूटी।
विश्वामित्र की माँग
राम तब बहुत युवा थे। उन्होंने अभी तक कोई बड़ा युद्ध नहीं देखा था।
तभी एक दिन ऋषि विश्वामित्र अयोध्या के दरबार में आए।
विश्वामित्र आम ऋषि नहीं थे। वे जन्म से राजा थे और तप के बल पर ऋषि बने थे। उनका क्रोध उनकी तपस्या जितना ही प्रसिद्ध था।
दशरथ उठकर खड़े हो गए, उन्हें आसन दिया और पूछा कि वे किस काम से आए हैं। राजा की आदत के मुताबिक़ उन्होंने साथ में यह भी कह दिया कि जो माँगना हो माँग लीजिए।
विश्वामित्र ने सीधा उत्तर दिया।
"मैं एक यज्ञ कर रहा हूँ। राक्षस बार-बार आकर उसे उजाड़ देते हैं। उसकी रक्षा के लिए मुझे आपका बड़ा बेटा चाहिए — राम।"
दरबार चुप हो गया।
दशरथ की साँस अटक गई। जिस बेटे के लिए उन्होंने इतने साल इंतज़ार किया था, वह अभी बहुत युवा था।
उन्होंने कहा कि वे ख़ुद अपनी पूरी सेना लेकर चलेंगे। सोना दे देंगे, अन्न दे देंगे, जो चाहिए वह दे देंगे — बस राम को छोड़कर।
विश्वामित्र ने कुछ नहीं कहा।
उनका चेहरा धीरे-धीरे कठोर होता गया, और दरबार में बैठे लोग समझ गए कि आगे क्या हो सकता है।
तब वशिष्ठ दशरथ के पास आए और धीरे से कहा कि यह ऋषि बिना जाने कुछ नहीं माँगते। जो वे माँग रहे हैं, वह उन्हें दे दीजिए।
दशरथ मान गए।
राम चल पड़े।
और लक्ष्मण — जिनसे किसी ने कुछ नहीं कहा था — उनके साथ हो लिए।
रास्ते में विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को दो विद्याएँ दीं, बला और अतिबला। इनके बाद न भूख सताती है न थकान। वन में चलने वाले के लिए इससे बड़ा वरदान कुछ नहीं था।
फिर उन्होंने चलते-चलते, एक-एक करके, दोनों को दिव्य अस्त्रों का प्रयोग सिखाया।
ताड़का और यज्ञ
पहला सामना एक सूखे, उजड़े वन में हुआ।
वहाँ ताड़का रहती थी — एक यक्षिणी, जो कभी सुंदर थी और एक शाप के बाद राक्षसी हो गई थी। उसने पूरा वन उजाड़ रखा था। उस रास्ते से लोगों ने गुज़रना छोड़ दिया था।
राम ठिठके।
सामने एक स्त्री थी, और स्त्री पर हाथ उठाना उन्हें रोक रहा था।
विश्वामित्र ने उन्हें समझाया कि प्रजा की रक्षा के लिए ऐसे व्यक्ति का वध करना राजकुमार का धर्म है — वह कोई भी हो।
राम ने धनुष उठाया, और ताड़का वहीं गिर गई।
इसके बाद यज्ञ शुरू हुआ।
ऋषियों ने बताया कि यज्ञ छह दिन और छह रात चलेगा, और उतने ही समय उसकी रक्षा करनी होगी।
दोनों भाई अग्निकुंड के चारों ओर पहरा देते रहे।
छठे दिन राक्षस टूट पड़े।
उनमें दो आगे थे — मारीच और सुबाहु।
मारीच पर राम ने मानवास्त्र चलाया। बाण उसकी छाती पर लगा और उसे सौ योजन दूर समुद्र में जा फेंका।
योजन दूरी की एक पुरानी माप है। उसका ठीक-ठीक मान कभी तय नहीं हुआ — पुराने ग्रंथ ख़ुद उसे साढ़े तीन से पंद्रह किलोमीटर के बीच बताते हैं — पर आम तौर पर एक योजन क़रीब तेरह किलोमीटर माना जाता है। यानी सौ योजन लगभग तेरह सौ किलोमीटर।
फिर उन्होंने सुबाहु पर आग्नेयास्त्र चलाया, और वह वहीं मारा गया।
बाक़ी राक्षसों को उन्होंने वायव्य अस्त्र से हटा दिया।
मारीच बच गया।
और बरसों बाद वही मारीच लौटेगा — ऐसी भूमिका निभाने, जो राम के जीवन की दिशा बदल देगी।
अहल्या का आश्रम
यज्ञ पूरा हो चुका था, पर विश्वामित्र लौटे नहीं। वे दोनों भाइयों को लेकर आगे चल दिए।
रास्ते में एक आश्रम पड़ा।
दरवाज़ा खुला हुआ था। भीतर कोई नहीं था। न कोई आदमी, न आवाज़, न चूल्हे का धुआँ — सिर्फ़ धूल और बरसों की जमी हुई ख़ामोशी। बाहर की बेलें दीवार पर चढ़कर छत तक पहुँच चुकी थीं।
राम ने पूछा कि यह जगह ऐसी क्यों पड़ी है।
विश्वामित्र ने बताया कि यह ऋषि गौतम का आश्रम है, और यहाँ उनकी पत्नी अहल्या रहती थीं।
एक दिन गौतम आश्रम से बाहर गए हुए थे। उसी समय देवराज इंद्र गौतम का रूप धरकर भीतर आ गए।
अहल्या समझ गईं कि सामने खड़ा आदमी उनका पति नहीं, इंद्र है।
यह जानते हुए भी उन्होंने इंद्र को स्वीकार किया।
गौतम लौटे और उन्हें सब पता चल गया।
उन्होंने अहल्या को शाप दिया — वे किसी को दिखाई नहीं देंगी, हवा पर जिएँगी, इसी आश्रम की राख पर पड़ी रहेंगी।
पर शाप के अंत में उन्होंने एक शर्त भी रख दी, जैसे उन्हें आगे का कुछ दिख रहा हो।
जिस दिन राम इस आश्रम में पैर रखेंगे, उसी दिन यह शाप टूटेगा।
फिर गौतम भी वहाँ से चले गए, और आश्रम ऐसा ही पड़ा रह गया।
अब वह दिन आ चुका था।
राम भीतर गए।
और बरसों से अदृश्य पड़ी अहल्या धीरे-धीरे फिर दिखाई देने लगीं — जैसे धूल के नीचे से कोई आकृति उभर आई हो।
कुछ ही देर में गौतम भी लौट आए, और उन्होंने अहल्या को अपना लिया।
सूना आश्रम फिर आबाद हो गया।
मिथिला का धनुष
इसके बाद विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को अपने साथ मिथिला ले गए, जहाँ राजा जनक एक बड़ा यज्ञ कर रहे थे।
जनक ने दोनों राजकुमारों का स्वागत किया।
बातचीत के दौरान जनक ने अपने राजपरिवार के उस प्रसिद्ध धनुष का ज़िक्र किया, जो शिव का था। परंपरा में इस धनुष को पिनाक कहा जाता है। जनक का परिवार उसे पीढ़ियों से सँभालता आ रहा था।
इसी धनुष से उनकी बेटी सीता के विवाह की शर्त जुड़ी थी।
जनक ने प्रण लिया था कि जो उस धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा सकेगा, सीता का विवाह उसी से होगा।
बहुत से राजा और योद्धा पहले कोशिश कर चुके थे। कोई सफल नहीं हुआ था।
विश्वामित्र ने जनक से कहा कि वह धनुष राम को दिखाइए।
राजा ने धनुष मँगवाने का आदेश दिया।
वह एक विशाल पेटी में रखा था। पेटी में आठ पहिये लगे थे, और उसे सभा तक खींचकर लाने में बहुत से बलवान पुरुष लगे।
पेटी खोली गई।
राम आगे बढ़े।
उन्होंने धनुष को हाथ में लेने की अनुमति माँगी। जनक और विश्वामित्र ने अनुमति दे दी।
राम ने धनुष उठाया और उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दी।
फिर उन्होंने प्रत्यंचा को कान तक खींचा।
उसी क्षण धनुष बीच से टूट गया।
आवाज़ इतनी तेज़ हुई मानो कोई पहाड़ फट गया हो।
सभा स्तब्ध रह गई।
जनक की शर्त पूरी हो चुकी थी।
और फिर एक विवाह की जगह चार तय हो गए। राम से सीता। लक्ष्मण से सीता की बहन उर्मिला। भरत से मांडवी और शत्रुघ्न से श्रुतकीर्ति — जनक के भाई की दोनों बेटियाँ।
परशुराम
विवाह के बाद पूरा राजपरिवार अयोध्या की ओर चला। रास्ता जंगल से होकर जाता था।
वहाँ एक व्यक्ति उनका रास्ता रोककर खड़ा था।
परशुराम — ऋषि भी, योद्धा भी। कंधे पर कुल्हाड़ी। वे शिव के भक्त थे, और उनका क्रोध इतना प्रसिद्ध था कि उनका नाम सुनते ही राजा सतर्क हो जाते थे।
शिव के उस धनुष के टूटने की ख़बर उन तक पहुँच चुकी थी। वे ख़ुद असाधारण योद्धा थे, और उस युवक की शक्ति परखने आए थे जिसने वह धनुष तोड़ा।
उन्होंने अपने साथ लाया दूसरा धनुष आगे बढ़ाया। यह विष्णु का था।
"अगर इतनी ही शक्ति है," उन्होंने कहा, "तो इस पर प्रत्यंचा चढ़ाकर दिखाओ।"
राम ने वह धनुष लिया।
और बिना किसी कठिनाई के उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दी।
परशुराम कुछ देर चुप खड़े रहे।
उन्हें अपना उत्तर मिल चुका था। सामने कोई साधारण राजकुमार नहीं था।
उनका क्रोध उतर गया। वे रास्ते से हट गए और तपस्या के लिए चले गए।
राजपरिवार आगे बढ़ गया, और अयोध्या का नगर-द्वार सामने आ गया।
उस दिन अयोध्या में जो उत्सव हुआ, उसमें किसी को यह अंदाज़ा नहीं था कि इन्हीं चार भाइयों में से एक के लिए चौदह बरस का वनवास लिखा जा चुका है।
टिप्पणी: दशरथ के यज्ञ, विश्वामित्र के साथ यात्रा, ताड़का-वध, मारीच और सुबाहु, अहल्या और धनुष-भंग — सब वाल्मीकि रामायण के बालकांड में हैं। यज्ञ की रक्षा छह दिन-रात चली और राक्षस छठे दिन आए (सर्ग ३०); मारीच पर मानवास्त्र और उसका सौ योजन दूर समुद्र में गिरना भी वहीं है, और सुबाहु पर आग्नेयास्त्र भी। धनुष की पेटी आठ पहियों की थी और उसे पाँच हज़ार आदमी खींचते थे (सर्ग ६७)। इस धनुष को वाल्मीकि "शिव का धनुष" कहते हैं — इन सर्गों में "पिनाक" नाम नहीं आता। पिनाक नाम बहुत पुराना है; यजुर्वेद में रुद्र को "पिनाकहस्त" कहा गया है। पर इस धनुष के लिए वह नाम परंपरा का दिया हुआ है। यह भी ध्यान रहे कि बालकांड और उत्तरकांड — दोनों को कई आधुनिक विद्वान बाद की परतें मानते हैं। इस पर बहस आज भी चल रही है।
स्रोत: वाल्मीकि रामायण, बालकांड