कांड १

बालकांड

अयोध्या को एक वारिस चाहिए था

पुत्रकामेष्टि यज्ञ

सरयू के किनारे बसा अयोध्या उन दिनों अपने सबसे अच्छे समय से गुज़र रहा था।

कोसल का राज्य दूर-दूर तक फैला था। नगर की सड़कें चौड़ी थीं और उन पर रोज़ पानी छिड़का जाता था। कोष भरा हुआ था, अन्न की कमी नहीं थी, और सीमा पर कोई शत्रु नहीं था।

राजा दशरथ के पास वह सब था जो एक राजा चाहता है — सेना, कोष, और तीन रानियाँ: कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा।

केवल एक चीज़ की कमी थी।

कोई संतान नहीं थी।

यह सिर्फ़ मन का दुख नहीं था। दशरथ की उम्र बढ़ रही थी, और उनके बाद सिंहासन सँभालने वाला कोई नहीं था। उत्तराधिकारी के बिना राजघराने में सत्ता की लड़ाई छिड़ सकती थी। दशरथ को सबसे ज़्यादा चिंता उसी की थी।

एक दिन उन्होंने अपने गुरु वशिष्ठ को बुलाया। वशिष्ठ राजपरिवार के सबसे पुराने सलाहकार थे — वह आदमी जिसकी बात दशरथ बिना पूछे मान लेते थे।

वशिष्ठ ने पहले अश्वमेध यज्ञ की सलाह दी।

यह संतान का उपाय नहीं था। यह वह अनुष्ठान था जिससे राजा अपनी सर्वोच्च सत्ता की घोषणा करता था।

एक घोड़ा साल भर के लिए खुला छोड़ दिया जाता, और सेना उसके पीछे चलती। वह जिन-जिन राज्यों से बिना रोके गुज़र जाता, वे राजा उसकी सत्ता मान लेते थे। जो घोड़े को रोक लेता, वह चुनौती देता था — और फिर युद्ध होता। साल पूरा होने पर घोड़ा लौटता, और तब यज्ञ पूरा होता।

दशरथ का अश्वमेध बिना किसी रुकावट के पूरा हुआ।

पर उससे वह नहीं मिला जो वे चाहते थे।

इसके बाद वशिष्ठ ने ऋषि ऋष्यशृंग को बुलवाया। उनकी देखरेख में पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया गया — संतान की कामना से किया जाने वाला विशेष यज्ञ।

एक के बाद एक आहुतियाँ अग्नि में पड़ती रहीं, और लपटें ऊँची उठती गईं।

तभी अग्नि के बीच से एक दिव्य पुरुष निकला।

उसके हाथ में सोने का पात्र था, जिसमें पायस भरा था — दूध और चावल से बनी खीर, लेकिन यह किसी रसोई में नहीं बनी थी।

"इसे अपनी रानियों में बाँट दीजिए," उसने कहा।

फिर वह वैसे ही चला गया जैसे आया था।

दशरथ ने वह पायस तीनों रानियों में बाँट दिया।

समय पूरा हुआ, और अयोध्या में एक ही ऋतु में चार बेटे जन्मे — कौसल्या से राम, कैकेयी से भरत, और सुमित्रा से दो, लक्ष्मण और शत्रुघ्न।

चारों साथ बड़े हुए।

पर बहुत जल्दी एक बात दिखने लगी, जो किसी ने सिखाई नहीं थी।

लक्ष्मण जहाँ भी होते, उनकी आँखें राम को खोजतीं। राम उठकर चलते तो लक्ष्मण पीछे चल देते। इसी तरह शत्रुघ्न भरत के साथ रहते।

चार भाई थे, पर वे दो-दो की जोड़ियों में बँट गए थे।

यह जोड़ी उम्र भर नहीं टूटी।

विश्वामित्र की माँग

राम तब बहुत युवा थे। उन्होंने अभी तक कोई बड़ा युद्ध नहीं देखा था।

तभी एक दिन ऋषि विश्वामित्र अयोध्या के दरबार में आए।

विश्वामित्र आम ऋषि नहीं थे। वे जन्म से राजा थे और तप के बल पर ऋषि बने थे। उनका क्रोध उनकी तपस्या जितना ही प्रसिद्ध था।

दशरथ उठकर खड़े हो गए, उन्हें आसन दिया और पूछा कि वे किस काम से आए हैं। राजा की आदत के मुताबिक़ उन्होंने साथ में यह भी कह दिया कि जो माँगना हो माँग लीजिए।

विश्वामित्र ने सीधा उत्तर दिया।

"मैं एक यज्ञ कर रहा हूँ। राक्षस बार-बार आकर उसे उजाड़ देते हैं। उसकी रक्षा के लिए मुझे आपका बड़ा बेटा चाहिए — राम।"

दरबार चुप हो गया।

दशरथ की साँस अटक गई। जिस बेटे के लिए उन्होंने इतने साल इंतज़ार किया था, वह अभी बहुत युवा था।

उन्होंने कहा कि वे ख़ुद अपनी पूरी सेना लेकर चलेंगे। सोना दे देंगे, अन्न दे देंगे, जो चाहिए वह दे देंगे — बस राम को छोड़कर।

विश्वामित्र ने कुछ नहीं कहा।

उनका चेहरा धीरे-धीरे कठोर होता गया, और दरबार में बैठे लोग समझ गए कि आगे क्या हो सकता है।

तब वशिष्ठ दशरथ के पास आए और धीरे से कहा कि यह ऋषि बिना जाने कुछ नहीं माँगते। जो वे माँग रहे हैं, वह उन्हें दे दीजिए।

दशरथ मान गए।

राम चल पड़े।

और लक्ष्मण — जिनसे किसी ने कुछ नहीं कहा था — उनके साथ हो लिए।

रास्ते में विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को दो विद्याएँ दीं, बला और अतिबला। इनके बाद न भूख सताती है न थकान। वन में चलने वाले के लिए इससे बड़ा वरदान कुछ नहीं था।

फिर उन्होंने चलते-चलते, एक-एक करके, दोनों को दिव्य अस्त्रों का प्रयोग सिखाया।

ताड़का और यज्ञ

पहला सामना एक सूखे, उजड़े वन में हुआ।

वहाँ ताड़का रहती थी — एक यक्षिणी, जो कभी सुंदर थी और एक शाप के बाद राक्षसी हो गई थी। उसने पूरा वन उजाड़ रखा था। उस रास्ते से लोगों ने गुज़रना छोड़ दिया था।

राम ठिठके।

सामने एक स्त्री थी, और स्त्री पर हाथ उठाना उन्हें रोक रहा था।

विश्वामित्र ने उन्हें समझाया कि प्रजा की रक्षा के लिए ऐसे व्यक्ति का वध करना राजकुमार का धर्म है — वह कोई भी हो।

राम ने धनुष उठाया, और ताड़का वहीं गिर गई।

इसके बाद यज्ञ शुरू हुआ।

ऋषियों ने बताया कि यज्ञ छह दिन और छह रात चलेगा, और उतने ही समय उसकी रक्षा करनी होगी।

दोनों भाई अग्निकुंड के चारों ओर पहरा देते रहे।

छठे दिन राक्षस टूट पड़े।

उनमें दो आगे थे — मारीच और सुबाहु।

मारीच पर राम ने मानवास्त्र चलाया। बाण उसकी छाती पर लगा और उसे सौ योजन दूर समुद्र में जा फेंका।

योजन दूरी की एक पुरानी माप है। उसका ठीक-ठीक मान कभी तय नहीं हुआ — पुराने ग्रंथ ख़ुद उसे साढ़े तीन से पंद्रह किलोमीटर के बीच बताते हैं — पर आम तौर पर एक योजन क़रीब तेरह किलोमीटर माना जाता है। यानी सौ योजन लगभग तेरह सौ किलोमीटर।

फिर उन्होंने सुबाहु पर आग्नेयास्त्र चलाया, और वह वहीं मारा गया।

बाक़ी राक्षसों को उन्होंने वायव्य अस्त्र से हटा दिया।

मारीच बच गया।

और बरसों बाद वही मारीच लौटेगा — ऐसी भूमिका निभाने, जो राम के जीवन की दिशा बदल देगी।

अहल्या का आश्रम

यज्ञ पूरा हो चुका था, पर विश्वामित्र लौटे नहीं। वे दोनों भाइयों को लेकर आगे चल दिए।

रास्ते में एक आश्रम पड़ा।

दरवाज़ा खुला हुआ था। भीतर कोई नहीं था। न कोई आदमी, न आवाज़, न चूल्हे का धुआँ — सिर्फ़ धूल और बरसों की जमी हुई ख़ामोशी। बाहर की बेलें दीवार पर चढ़कर छत तक पहुँच चुकी थीं।

राम ने पूछा कि यह जगह ऐसी क्यों पड़ी है।

विश्वामित्र ने बताया कि यह ऋषि गौतम का आश्रम है, और यहाँ उनकी पत्नी अहल्या रहती थीं।

एक दिन गौतम आश्रम से बाहर गए हुए थे। उसी समय देवराज इंद्र गौतम का रूप धरकर भीतर आ गए।

अहल्या समझ गईं कि सामने खड़ा आदमी उनका पति नहीं, इंद्र है।

यह जानते हुए भी उन्होंने इंद्र को स्वीकार किया।

गौतम लौटे और उन्हें सब पता चल गया।

उन्होंने अहल्या को शाप दिया — वे किसी को दिखाई नहीं देंगी, हवा पर जिएँगी, इसी आश्रम की राख पर पड़ी रहेंगी।

पर शाप के अंत में उन्होंने एक शर्त भी रख दी, जैसे उन्हें आगे का कुछ दिख रहा हो।

जिस दिन राम इस आश्रम में पैर रखेंगे, उसी दिन यह शाप टूटेगा।

फिर गौतम भी वहाँ से चले गए, और आश्रम ऐसा ही पड़ा रह गया।

अब वह दिन आ चुका था।

राम भीतर गए।

और बरसों से अदृश्य पड़ी अहल्या धीरे-धीरे फिर दिखाई देने लगीं — जैसे धूल के नीचे से कोई आकृति उभर आई हो।

कुछ ही देर में गौतम भी लौट आए, और उन्होंने अहल्या को अपना लिया।

सूना आश्रम फिर आबाद हो गया।

मिथिला का धनुष

इसके बाद विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को अपने साथ मिथिला ले गए, जहाँ राजा जनक एक बड़ा यज्ञ कर रहे थे।

जनक ने दोनों राजकुमारों का स्वागत किया।

बातचीत के दौरान जनक ने अपने राजपरिवार के उस प्रसिद्ध धनुष का ज़िक्र किया, जो शिव का था। परंपरा में इस धनुष को पिनाक कहा जाता है। जनक का परिवार उसे पीढ़ियों से सँभालता आ रहा था।

इसी धनुष से उनकी बेटी सीता के विवाह की शर्त जुड़ी थी।

जनक ने प्रण लिया था कि जो उस धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा सकेगा, सीता का विवाह उसी से होगा।

बहुत से राजा और योद्धा पहले कोशिश कर चुके थे। कोई सफल नहीं हुआ था।

विश्वामित्र ने जनक से कहा कि वह धनुष राम को दिखाइए।

राजा ने धनुष मँगवाने का आदेश दिया।

वह एक विशाल पेटी में रखा था। पेटी में आठ पहिये लगे थे, और उसे सभा तक खींचकर लाने में बहुत से बलवान पुरुष लगे।

पेटी खोली गई।

राम आगे बढ़े।

उन्होंने धनुष को हाथ में लेने की अनुमति माँगी। जनक और विश्वामित्र ने अनुमति दे दी।

राम ने धनुष उठाया और उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दी।

फिर उन्होंने प्रत्यंचा को कान तक खींचा।

उसी क्षण धनुष बीच से टूट गया।

आवाज़ इतनी तेज़ हुई मानो कोई पहाड़ फट गया हो।

सभा स्तब्ध रह गई।

जनक की शर्त पूरी हो चुकी थी।

और फिर एक विवाह की जगह चार तय हो गए। राम से सीता। लक्ष्मण से सीता की बहन उर्मिला। भरत से मांडवी और शत्रुघ्न से श्रुतकीर्ति — जनक के भाई की दोनों बेटियाँ।

परशुराम

विवाह के बाद पूरा राजपरिवार अयोध्या की ओर चला। रास्ता जंगल से होकर जाता था।

वहाँ एक व्यक्ति उनका रास्ता रोककर खड़ा था।

परशुराम — ऋषि भी, योद्धा भी। कंधे पर कुल्हाड़ी। वे शिव के भक्त थे, और उनका क्रोध इतना प्रसिद्ध था कि उनका नाम सुनते ही राजा सतर्क हो जाते थे।

शिव के उस धनुष के टूटने की ख़बर उन तक पहुँच चुकी थी। वे ख़ुद असाधारण योद्धा थे, और उस युवक की शक्ति परखने आए थे जिसने वह धनुष तोड़ा।

उन्होंने अपने साथ लाया दूसरा धनुष आगे बढ़ाया। यह विष्णु का था।

"अगर इतनी ही शक्ति है," उन्होंने कहा, "तो इस पर प्रत्यंचा चढ़ाकर दिखाओ।"

राम ने वह धनुष लिया।

और बिना किसी कठिनाई के उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दी।

परशुराम कुछ देर चुप खड़े रहे।

उन्हें अपना उत्तर मिल चुका था। सामने कोई साधारण राजकुमार नहीं था।

उनका क्रोध उतर गया। वे रास्ते से हट गए और तपस्या के लिए चले गए।

राजपरिवार आगे बढ़ गया, और अयोध्या का नगर-द्वार सामने आ गया।

उस दिन अयोध्या में जो उत्सव हुआ, उसमें किसी को यह अंदाज़ा नहीं था कि इन्हीं चार भाइयों में से एक के लिए चौदह बरस का वनवास लिखा जा चुका है।

टिप्पणी: दशरथ के यज्ञ, विश्वामित्र के साथ यात्रा, ताड़का-वध, मारीच और सुबाहु, अहल्या और धनुष-भंग — सब वाल्मीकि रामायण के बालकांड में हैं। यज्ञ की रक्षा छह दिन-रात चली और राक्षस छठे दिन आए (सर्ग ३०); मारीच पर मानवास्त्र और उसका सौ योजन दूर समुद्र में गिरना भी वहीं है, और सुबाहु पर आग्नेयास्त्र भी। धनुष की पेटी आठ पहियों की थी और उसे पाँच हज़ार आदमी खींचते थे (सर्ग ६७)। इस धनुष को वाल्मीकि "शिव का धनुष" कहते हैं — इन सर्गों में "पिनाक" नाम नहीं आता। पिनाक नाम बहुत पुराना है; यजुर्वेद में रुद्र को "पिनाकहस्त" कहा गया है। पर इस धनुष के लिए वह नाम परंपरा का दिया हुआ है। यह भी ध्यान रहे कि बालकांड और उत्तरकांड — दोनों को कई आधुनिक विद्वान बाद की परतें मानते हैं। इस पर बहस आज भी चल रही है।

स्रोत: वाल्मीकि रामायण, बालकांड

अब बताइए — कितना याद रहा?

कौन हूँ मैं?

मैं वर्षों तक किसी को दिखाई नहीं दी — न मनुष्य को, न देवता को। हवा पर जीती रही, राख पर पड़ी रही। फिर एक दिन कोई आश्रम में आया, और मैं फिर दिखने लगी। मैं कौन हूँ?

  • ताड़का
  • मंथरा
  • अहल्या
  • शबरी
पूरी कथा पढ़िए — अहल्या और गौतम

अहल्या को अत्यंत सुंदर स्त्री कहा गया है। वे गौतम ऋषि को सौंपी गईं, और देवराज इंद्र यह भूल नहीं पाए।

एक दिन गौतम आश्रम से बाहर थे। इंद्र ने गौतम का ही रूप धरा और भीतर आ गया। वाल्मीकि साफ़ कहते हैं कि अहल्या ने उसे पहचान लिया था — फिर भी रुकी नहीं।

गौतम लौटे और दोनों को शाप दिया। इंद्र को उसके अपने शरीर पर, और अहल्या को यह कि वह किसी को दिखाई न दे, हवा पर जिए, राख पर पड़ी रहे। पर शाप के अंत में एक शर्त भी रख दी: जिस दिन राम इस आश्रम में आएँगे, तुम फिर दिखने लगोगी।

बरसों बाद वही हुआ। और गौतम ने लौटकर अहल्या को अपना लिया।

पहेली

मैं टूटा — और उसी क्षण एक विवाह तय हो गया, तथा एक क्रोधी ऋषि रास्ते में आ खड़े हुए। मैं कौन-सा धनुष हूँ?

  • पिनाक
  • कोदंड
  • गांडीव
  • शार्ङ्ग
पूरी कथा पढ़िए — शिव का धनुष मिथिला कैसे पहुँचा

पिनाक शिव का अपना धनुष था। दक्ष के यज्ञ में जब शिव को भाग नहीं दिया गया, उन्होंने क्रोध में यही धनुष उठाया था और देवताओं को ललकारा था।

बाद में शिव शांत हुए और धनुष देवताओं को सौंप दिया। देवताओं ने वह आगे मिथिला के पूर्वज राजा देवरात को सौंप दिया। तब से वह जनक के वंश में चला आ रहा था।

वह इतना भारी था कि उसे रखने के लिए आठ पहियों वाली पेटी बनवानी पड़ी, और उसे खींचकर लाने में बहुत से लोगों की ज़रूरत पड़ती थी।

जनक ने इसी को शर्त बना दिया। जो इसे उठा ले, सीता उसकी।

तथ्य

दशरथ के यज्ञों में से किस यज्ञ से वह दिव्य पायस निकला, जो रानियों में बाँटा गया?

  • राजसूय
  • अश्वमेध
  • वाजपेय
  • पुत्रकामेष्टि
पूरी कथा पढ़िए — ऋष्यशृंग कौन थे

ऋष्यशृंग एक ऋषि के पुत्र थे, जिन्हें उनके पिता ने वन में इस तरह पाला कि उन्होंने कभी कोई स्त्री देखी ही नहीं।

अंग देश में वर्षों से वर्षा नहीं हुई थी। राजा रोमपाद को बताया गया कि ऋष्यशृंग के पैर जहाँ पड़ेंगे, वहाँ पानी बरसेगा। उन्हें आश्रम से नगर तक लाया गया — और वर्षा हुई।

रोमपाद ने उन्हें अपनी बेटी शांता ब्याह दी। परंपरा के अनुसार शांता दशरथ की ही पुत्री थीं, जिन्हें रोमपाद ने गोद लिया था।

इसी नाते वे दशरथ के दामाद हुए — और यही वह व्यक्ति थे जिन्होंने अयोध्या आकर पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया।

कौन हूँ मैं?

मैं वह ऋषि हूँ जो राजा से सेना नहीं माँगने आया था। मुझे उसका सबसे बड़ा बेटा चाहिए था — और वह भी तब, जब वह अभी किशोर ही था। मैं कौन हूँ?

  • वशिष्ठ
  • विश्वामित्र
  • ऋष्यशृंग
  • अगस्त्य
पूरी कथा पढ़िए — जो राजा था, और ऋषि बन गया

विश्वामित्र जन्म से ऋषि नहीं थे। वे कौशिक नाम के एक शक्तिशाली राजा थे।

एक बार वे वशिष्ठ के आश्रम में रुके और वहाँ नंदिनी नाम की गाय देखी, जो माँगने पर कुछ भी दे सकती थी। राजा ने उसे माँगा, फिर छीनना चाहा। पूरी सेना उतार दी।

वशिष्ठ ने सिर्फ़ अपने ब्रह्म-तेज से सब रोक दिया। कौशिक की सेना मिट गई, और उन्हें समझ आया कि राजा का बल ऋषि के तप के आगे कुछ नहीं।

उन्होंने राज छोड़ दिया और वर्षों तप किया। लंबी साधना और अनेक परीक्षाओं के बाद वे ब्रह्मर्षि कहलाए। वही विश्वामित्र एक दिन अयोध्या आकर राम को माँग बैठे।

तथ्य

विश्वामित्र के साथ यात्रा में राम ने सबसे पहले किस राक्षसी का वध किया?

  • सुबाहु
  • मारीच
  • खर
  • ताड़का
पूरी कथा पढ़िए — ताड़का यक्षिणी क्यों बनी

ताड़का जन्म से राक्षसी नहीं थी। वह सुकेतु नाम के यक्ष की बेटी थी, और उसे हज़ार हाथियों का बल वरदान में मिला था।

उसका विवाह सुंद से हुआ। पर सुंद ने अगस्त्य ऋषि से टकराने की भूल की, और मारा गया।

ताड़का अपने बेटे मारीच को लेकर बदला लेने अगस्त्य पर टूट पड़ी। ऋषि ने शाप दे दिया — और वह सुंदर यक्षिणी से एक भयानक राक्षसी बन गई।

तब से वह उस पूरे वन को उजाड़ती रही। यही वह वन था जहाँ विश्वामित्र राम को लेकर पहुँचे।

कौन हूँ मैं?

मैंने एक शर्त रख छोड़ी थी, और कई राजा उसे पूरी न कर पाए। जो पूरी हुई, तो मेरी बेटी का विवाह तय हुआ। मैं कौन हूँ?

  • जनक
  • दशरथ
  • रोमपाद
  • कुशध्वज
पूरी कथा पढ़िए — सीता धरती से कैसे मिलीं

जनक की कोई संतान नहीं थी। एक यज्ञ के लिए उन्हें ख़ुद खेत जोतना था — यह राजा का धार्मिक कर्तव्य था।

हल चलाते हुए फाल किसी चीज़ से टकराया। मिट्टी हटाई गई तो नीचे एक कन्या पड़ी थी।

हल से बनी उस रेखा को संस्कृत में सीता कहते हैं। नाम वहीं से आया।

जनक ने उसे अपनी बेटी मान लिया। आगे चलकर उन्होंने निश्चय किया कि सीता उसी पुरुष को दी जाएँगी जिसकी वीरता ही उनका वरण-मूल्य हो। इसीलिए शिव के धनुष को शर्त बना दिया गया।

पहेली

मैं एक पात्र में आया, तीन में बँटा, और चार बन गया। मैं क्या हूँ?

  • यज्ञ की अग्नि
  • अस्त्र-विद्या
  • पायस
  • शिव का धनुष
पूरी कथा पढ़िए — यज्ञ से निकला वह दिव्य पुरुष

पुत्रकामेष्टि की अग्नि से जो निकला, वाल्मीकि उसे बहुत विस्तार से लिखते हैं। काला रंग, लाल वस्त्र, सिंह जैसा मुख, और हाथों में सोने का एक पात्र — जिसका ढक्कन चाँदी का था।

उसने कहा: यह प्रजापति का दिया पायस है। इसे अपनी रानियों को खिलाइए।

दशरथ ने पहले आधा पायस कौसल्या को दिया। फिर बचे हुए का आधा कैकेयी को। और जो बचा, वह सुमित्रा को दो बार में दिया गया — परंपरा में यही कारण बताया जाता है कि सुमित्रा के दो पुत्र हुए।

वाल्मीकि यह भी कहते हैं कि यह सब इसलिए हो रहा था क्योंकि देवता रावण से त्रस्त थे, और उसका अंत मनुष्य के हाथों ही लिखा था।

तथ्य

मिथिला में चारों भाइयों के विवाह हुए। लक्ष्मण का विवाह किससे हुआ?

  • मांडवी
  • उर्मिला
  • श्रुतकीर्ति
  • सुमित्रा
पूरी कथा पढ़िए — उर्मिला, जो पीछे रह गई

मिथिला में एक साथ चार विवाह हुए। सीता राम को, उर्मिला लक्ष्मण को, मांडवी भरत को और श्रुतकीर्ति शत्रुघ्न को।

सीता और उर्मिला जनक की बेटियाँ थीं। मांडवी और श्रुतकीर्ति उनके भाई कुशध्वज की।

आगे चलकर जब राम वन गए, लक्ष्मण साथ गए — और उर्मिला चौदह साल अयोध्या में अकेली रह गईं। वाल्मीकि इस पर लगभग चुप हैं; वे उर्मिला के बारे में बहुत कम लिखते हैं।

उर्मिला के चौदह साल सोते रहने की प्रसिद्ध कथा वाल्मीकि की नहीं है — वह बाद के लोक-संस्करणों से आई है।

कौन हूँ मैं?

मैंने सुना कि शिव का धनुष टूट गया है, और मैं रास्ता रोककर खड़ा हो गया। फिर मैंने एक दूसरा धनुष आगे बढ़ाया। मैं कौन हूँ?

  • परशुराम
  • वशिष्ठ
  • विश्वामित्र
  • जनक
पूरी कथा पढ़िए — परशुराम की कुल्हाड़ी

परशुराम ब्राह्मण थे, पर उनका नाम कुल्हाड़ी से जुड़ा — परशु यानी फरसा, जो उन्हें शिव से मिला था।

उनके पिता जमदग्नि को एक राजा ने मार डाला था। बदले में परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी के क्षत्रियों का संहार किया, और अंत में जीती हुई पूरी धरती कश्यप ऋषि को दान कर दी।

फिर वे शांत होकर तप में लग गए। शिव का धनुष टूटने की आवाज़ ने उन्हें फिर बाहर खींच लिया।

उन्होंने विष्णु का धनुष आगे बढ़ाया — शार्ङ्ग। राम ने उसे उठाकर चढ़ा दिया। परशुराम ने राम की शक्ति पहचान ली और वहाँ से लौट गए।

तथ्य

यज्ञ के समय राम ने मारीच के साथ क्या किया?

  • उसका वध कर दिया
  • उसे बंदी बना लिया
  • उसे शाप दे दिया
  • मानवास्त्र से समुद्र पार फेंक दिया
पूरी कथा पढ़िए — मारीच, जो दो बार लौटा

मारीच ताड़का का बेटा था। विश्वामित्र के यज्ञ पर उसी ने हमला किया था।

राम ने उस पर मानवास्त्र चलाया। मारीच मरा नहीं — वह सौ योजन दूर समुद्र में जा गिरा।

उस दिन के बाद मारीच डर के मारे तपस्वी बनकर वन में रहने लगा। वह राम का नाम तक नहीं सुनना चाहता था।

बरसों बाद रावण उसी के पास पहुँचा और कहा: सोने का मृग बन जाओ। मारीच ने मना किया, चेताया, गिड़गिड़ाया। रावण नहीं माना। और मारीच जानता था कि इस बार वह बचेगा नहीं।