कांड ४

किष्किंधाकांड

खोज शुरू करने के लिए पहले एक दोस्त चाहिए था

हनुमान से भेंट

शबरी के बताए रास्ते पर चलते हुए राम और लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत तक पहुँचे।

पर्वत पर रहने वाले वानरों ने उन्हें दूर से ही देख लिया।

दो हथियारबंद अजनबियों को अपनी ओर आते देखकर सुग्रीव घबरा गया। उसे लगा कि शायद बालि ने उन्हें भेजा है।

सुग्रीव किष्किंधा के राजा बालि का छोटा भाई था। कभी दोनों भाइयों में गहरा प्रेम था, लेकिन एक घटना ने सब बदल दिया।

एक राक्षस से लड़ते हुए बालि एक गुफा के भीतर चला गया था, और सुग्रीव बाहर उसका इंतज़ार करता रहा।

बहुत समय बीत गया।

अंदर से ख़ून बहता दिखाई दिया, और कोई जवाब नहीं आया।

सुग्रीव को लगा कि बालि मारा जा चुका है। उसने गुफा का रास्ता बंद कर दिया और किष्किंधा लौट आया।

लेकिन बालि मरा नहीं था।

वह लौटा तो उसने समझा कि सुग्रीव ने जान-बूझकर उसे भीतर बंद किया और उसका राज्य हथियाने की कोशिश की।

सुग्रीव ने बहुत समझाया, लेकिन बालि ने उसकी बात पर भरोसा नहीं किया।

उसने सुग्रीव को किष्किंधा से निकाल दिया।

सुग्रीव की पत्नी रुमा को भी अपने पास रख लिया।

और सुग्रीव को डर था कि अगर बालि उसे पकड़ लेगा, तो मार डालेगा।

इसीलिए वह ऋष्यमूक पर्वत पर छिपकर रहता था।

यह जगह उसके लिए सुरक्षित थी। एक पुराने शाप के कारण बालि ऋष्यमूक पर्वत पर नहीं आ सकता था।

इसीलिए अजनबियों को देखकर उसका पुराना डर लौट आया।

उसने हनुमान से कहा कि जाकर पता लगाएँ कि वे कौन हैं।

हनुमान ने ब्राह्मण का वेश बनाया और राम तथा लक्ष्मण के पास पहुँचे।

उन्होंने बहुत नम्रता और सावधानी से दोनों से बात की।

राम उनकी भाषा और बोलने के ढंग से प्रभावित हुए।

उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि जो इतने साफ़ और नपे-तुले शब्दों में बोल सकता है, वह साधारण नहीं हो सकता।

बातचीत के बाद हनुमान समझ गए कि दोनों बालि के भेजे हुए लोग नहीं हैं।

वे राम और लक्ष्मण को सुग्रीव के पास ले गए।

वहाँ अग्नि को साक्षी मानकर राम और सुग्रीव ने मित्रता की।

दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत थी।

राम अपनी पत्नी को खोज रहे थे।

सुग्रीव अपना राज्य और अपनी पत्नी वापस चाहता था।

दोनों ने एक-दूसरे की मदद करने का वचन दिया।

गहनों की गठरी

सुग्रीव ने राम को एक और ज़रूरी बात बताई।

कुछ समय पहले उसने और उसके साथियों ने आकाश में एक स्त्री को किसी राक्षस के साथ जाते देखा था।

वह स्त्री मदद के लिए पुकार रही थी।

ऊपर से उसने अपने कुछ गहने कपड़े में बाँधकर नीचे फेंक दिए थे।

वानरों ने वे गहने उठा लिए थे और सँभालकर रखे थे।

सुग्रीव वह गठरी लेकर आया और राम के सामने खोल दी।

राम ने गहनों को देखा।

दुख में वे उन्हें ठीक से पहचान नहीं पाए।

तब लक्ष्मण ने उन्हें देखा।

उन्होंने कहा कि वे सीता के बाजूबंद या कुंडल नहीं पहचानते।

लेकिन उनके पैरों की पायल पहचानते हैं।

वजह बहुत सीधी थी।

वे रोज़ सीता के चरणों में प्रणाम करते थे। इसलिए उनकी नज़र सबसे ज़्यादा उन्हीं गहनों पर पड़ती थी।

अब राम को यक़ीन हो गया कि सीता को सचमुच दक्षिण की ओर ले जाया गया था।

और सुग्रीव के पास भी यह सबूत था कि वह राम की खोज में काम आ सकता है।

समझौता साफ़ था।

राम बालि से सुग्रीव को छुड़ाएँगे।

और सुग्रीव अपनी पूरी ताक़त सीता की खोज में लगाएगा।

सात विशाल साल वृक्ष

लेकिन एक दिक़्क़त अभी बाक़ी थी।

सुग्रीव जानता था कि बालि कितना ताक़तवर है।

उसे भरोसा नहीं हो रहा था कि राम सचमुच उसे हरा सकते हैं।

उसने राम को बालि की शक्ति के बारे में बताया।

फिर उसने पास पड़े दुंदुभि के पुराने कंकाल की ओर इशारा किया। दुंदुभि एक भैंसे के रूप वाला राक्षस था, और बालि ने उसे युद्ध में मारकर उसका भारी शरीर बहुत दूर फेंक दिया था।

राम ने अपने पैर के अंगूठे से उस विशाल कंकाल को धक्का दिया।

वह दूर जा गिरा।

फिर भी सुग्रीव पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुआ।

उसने सामने खड़े सात विशाल साल के पेड़ दिखाए।

बालि की ताक़त का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जाता था कि वह इन पेड़ों को एक साथ हिला सकता था।

राम ने धनुष उठाया।

एक बाण छोड़ा।

बाण एक के बाद एक सातों पेड़ों को भेदता हुआ निकला।

फिर उसने पर्वत को चीर दिया, धरती के भीतर चला गया, और आख़िर में वापस राम के तरकश में लौट आया।

अब सुग्रीव को कोई शक नहीं रहा।

बालि-वध

सुग्रीव राम को लेकर किष्किंधा पहुँचा।

नगर के बाहर खड़े होकर उसने बालि को युद्ध के लिए ललकारा।

बालि बाहर आया।

दोनों भाई भिड़ गए।

राम कुछ दूरी पर धनुष लेकर तैयार खड़े थे।

लेकिन उन्होंने बाण नहीं चलाया।

वजह यह थी कि बालि और सुग्रीव की शक्ल बहुत मिलती-जुलती थी।

लड़ाई के बीच दोनों के शरीर धूल से ढक गए थे। वे लगातार उलझते और जगह बदलते जा रहे थे।

राम को डर था कि कहीं बाण सुग्रीव को ही न लग जाए।

बालि ने सुग्रीव को बुरी तरह घायल कर दिया।

सुग्रीव किसी तरह वहाँ से बचकर निकला।

वह राम के पास लौटा और नाराज़ होकर पूछा कि उन्होंने मदद क्यों नहीं की।

राम ने वजह बताई।

दूसरी बार पहचान की ग़लती न हो, इसलिए सुग्रीव के गले में एक माला पहना दी गई।

सुग्रीव फिर किष्किंधा पहुँचा और बालि को दोबारा ललकारा।

इस बार बालि की पत्नी तारा ने उसे रोकने की कोशिश की।

उसे अंगद से ख़बर मिल चुकी थी कि सुग्रीव ने राम से मित्रता कर ली है। उसने बालि से कहा कि सुग्रीव इतनी जल्दी अकेले लौटकर नहीं आ सकता — उसके पीछे कोई है।

लेकिन बालि ने उसकी बात नहीं मानी।

वह फिर लड़ने निकल पड़ा।

दोनों भाई दोबारा भिड़े।

इस बार राम ने सुग्रीव के गले की माला पहचान ली।

उन्होंने पेड़ की ओट से बाण चलाया।

बाण बालि के शरीर में जा लगा।

वह धरती पर गिर पड़ा।

बालि का प्रश्न

घायल बालि ने राम से एक सीधा सवाल पूछा।

वह राम से लड़ नहीं रहा था।

उसका राम से कोई निजी बैर नहीं था।

तो राम ने सामने से लड़ने के बजाय छिपकर उसे क्यों मारा?

वाल्मीकि रामायण इस सवाल को दर्ज करती है।

और राम उसका जवाब देते हैं।

उनके जवाब के तीन हिस्से हैं।

पहला — बालि ने अपने छोटे भाई सुग्रीव के जीते-जी उसकी पत्नी रुमा को अपने पास रख लिया था। पुरानी मर्यादा में छोटे भाई की पत्नी को बेटी के समान माना जाता था। राम इसे गंभीर अधर्म बताते हैं।

दूसरा — राम कहते हैं कि वे इक्ष्वाकु वंश के राजकुमार हैं, और धर्म के ख़िलाफ़ चलने वालों को दंड देना राजधर्म का हिस्सा है। अयोध्या में उस समय शासन भरत के नाम से चल रहा था, लेकिन राम ख़ुद को उसी राजकीय व्यवस्था का प्रतिनिधि मानते हैं।

तीसरा तर्क सबसे विवादित है। राम कहते हैं कि शिकार में पशु को सामने से भी मारा जा सकता है और छिपकर भी। बालि वानर था, इसलिए राम इस उदाहरण को भी अपने जवाब का हिस्सा बनाते हैं।

बालि ने राम की बात सुनी।

इसके बाद उसने लंबी बहस नहीं की।

मरने से पहले उसने अपने बेटे अंगद की चिंता राम और सुग्रीव के सामने रखी।

उसने कहा कि अंगद की रक्षा की जाए और उसके साथ ठीक बर्ताव हो।

फिर बालि की मृत्यु हो गई।

यह प्रसंग रामायण के सबसे ज़्यादा बहस किए जाने वाले प्रसंगों में से एक है।

राम अपना पक्ष रखते हैं।

बालि अपना सवाल रखता है।

कथा दोनों को दर्ज करती है।

खोज के चार दल

बालि की मृत्यु के बाद सुग्रीव किष्किंधा का राजा बना।

बालि के बेटे अंगद को युवराज बनाया गया।

अब सुग्रीव की बारी थी अपना वचन पूरा करने की।

लेकिन तभी बरसात शुरू हो गई।

तेज़ बारिश और ख़राब रास्तों की वजह से दूर-दूर तक खोज-दल भेजना आसान नहीं था।

इसलिए तय हुआ कि बारिश ख़त्म होने तक इंतज़ार किया जाए।

राम और लक्ष्मण पास के पर्वत पर रहने लगे।

समय बीतता गया।

बारिश ख़त्म हो गई।

लेकिन किष्किंधा से कोई ख़बर नहीं आई।

सुग्रीव को अपना राज्य वापस मिल चुका था। वह फिर से राजमहल के जीवन में लौट चुका था।

राम अब भी इंतज़ार कर रहे थे।

जब काफ़ी समय बीत गया, तो लक्ष्मण का धीरज टूट गया।

वे ग़ुस्से में किष्किंधा पहुँचे।

सुग्रीव को समझ आ गया कि उसने देर कर दी है।

उसने तुरंत वानर सेना को इकट्ठा करने और खोज शुरू करने का आदेश दिया।

बड़े-बड़े खोज-दल बनाए गए और चारों दिशाओं में भेजे गए — उत्तर, पूरब, पश्चिम और दक्षिण।

दक्षिण वाले दल में अंगद, हनुमान और जांबवान जैसे प्रमुख योद्धा थे।

सुग्रीव ने सबको एक महीने का समय दिया था। एक महीने में लौट आना है, ख़बर मिले या न मिले।

दल जंगलों, पर्वतों और दूर-दूर के इलाक़ों में सीता को खोजते रहे।

कोई ख़बर नहीं मिली।

महीना ख़त्म होने लगा।

दल के लोग घबराने लगे। वे जानते थे कि ख़ाली हाथ लौटना उनके लिए भारी पड़ सकता है।

आख़िर वे समुद्र के किनारे पहुँच गए।

आगे सिर्फ़ पानी था।

सीता का कोई पता नहीं था।

दल लगभग हार मान चुका था।

संपाति

उसी समय उनकी मुलाक़ात एक बहुत बूढ़े गिद्ध से हुई।

उनका नाम संपाति था।

वे जटायु के बड़े भाई थे।

बातचीत में संपाति को पता चला कि जटायु सीता को बचाने की कोशिश में रावण के हाथों मारे गए थे।

अपने भाई की मृत्यु की ख़बर सुनकर वे दुखी हुए।

लेकिन वे वानरों की मदद कर सकते थे।

संपाति की नज़र बहुत दूर तक जाती थी।

उन्होंने समुद्र के पार देखा।

और आख़िर वह ख़बर मिल गई जिसकी सबको तलाश थी।

सीता लंका में थीं।

रावण उन्हें समुद्र पार अपने राज्य में ले गया था।

अब पहली बार खोज-दल को पता था कि सीता कहाँ हैं।

लेकिन उनके सामने एक नई मुश्किल खड़ी थी।

लंका तक पहुँचने के लिए समुद्र पार करना था।

दूरी क़रीब सौ योजन थी।

सौ योजन कौन लाँघेगा?

वानरों ने अपनी-अपनी ताक़त का अंदाज़ा लगाना शुरू किया।

कोई कहता कि वह कुछ योजन तक छलाँग लगा सकता है। कोई उससे ज़्यादा।

अंगद ने कहा कि शायद वह समुद्र पार कर सकता है, लेकिन उसे भरोसा नहीं था कि लौट भी पाएगा।

सब अपनी सीमा बता रहे थे।

लेकिन एक वानर चुप था।

हनुमान।

वे एक ओर बैठे थे।

मानो उन्हें ख़ुद याद ही न हो कि वे क्या कर सकते हैं।

तब जांबवान उनके पास गए।

जांबवान बहुत बूढ़े थे और हनुमान की शक्ति को जानते थे।

उन्होंने हनुमान को उनके बचपन की याद दिलाई।

बचपन में हनुमान इतने चंचल और ताक़तवर थे कि एक बार उन्होंने उगते हुए सूरज को फल समझकर उसकी ओर छलाँग लगा दी थी।

उनकी शरारतों से परेशान कुछ ऋषियों ने उन्हें एक शाप दिया था — वे अपनी शक्तियाँ भूल जाएँगे। जब कोई उन्हें याद दिलाएगा, तभी उन्हें फिर याद आएँगी।

अब वही समय था।

जांबवान ने उन्हें याद दिलाया कि वे वायु के पुत्र हैं। उनके भीतर ऐसी शक्ति है जिसका अंदाज़ा ख़ुद उन्हें नहीं है।

समुद्र पार करने वाला कोई और नहीं था।

जांबवान की बातें सुनते-सुनते हनुमान को अपनी शक्ति का बोध होने लगा।

वे उठे।

उनका शरीर बड़ा होने लगा।

सामने सौ योजन का समुद्र था।

उसके पार लंका।

और लंका में सीता।

अब खोज का अगला हिस्सा एक ही वानर के हाथ में था।

टिप्पणी: सुग्रीव से मित्रता, सात साल वृक्षों का एक ही बाण से भेदा जाना (सर्ग १२ — बाण पर्वत और धरती भी भेदता है और तरकश में लौट आता है), बालि-वध, खोज-दल और संपाति — सब वाल्मीकि के किष्किंधाकांड में हैं। हनुमान के बचपन और शाप की कथा जांबवान सर्ग ६६ में सुनाते हैं। लक्ष्मण का सिर्फ़ पायल पहचानना एक प्रसिद्ध श्लोक है, पर वह विवादित है: "नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात्" (सर्ग ६) पुरानी पांडुलिपियों और बड़ौदा के क्रिटिकल संस्करण में नहीं मिलता। श्लोक इतना ही कहता है कि वे रोज़ चरणों में प्रणाम करते थे, इसलिए पायल पहचानी — "उन्होंने कभी ऊपर नज़र नहीं उठाई" उसका बाद का विस्तार है। बालि के सवाल का उत्तर राम तीन तर्कों से देते हैं (सर्ग १८)। इनके अलावा जो कारण अक्सर गिनाए जाते हैं — कि सामने आने पर बालि रावण के पास चला जाता या सेना बुला लेता — वे मूल पाठ में नहीं, धर्माकूतम् टीका में हैं।

स्रोत: वाल्मीकि रामायण, किष्किंधाकांड

अब बताइए — कितना याद रहा?

कौन हूँ मैं?

मुझे मेरे ही बड़े भाई ने राज्य से निकाल दिया था। एक धनुर्धर से दोस्ती ने मुझे सिंहासन वापस दिलाया। मैं कौन हूँ?

  • सुग्रीव
  • अंगद
  • नल
  • विभीषण
पूरी कथा पढ़िए — भाइयों की लड़ाई कहाँ से शुरू हुई

झगड़े की जड़ मायावी नाम का एक राक्षस था। बालि उसका पीछा करते हुए एक गुफा में घुसा और सुग्रीव को बाहर पहरे पर छोड़ गया।

बहुत समय बीत गया। गुफा से ख़ून बहता दिखा और राक्षसों की आवाज़ें आईं। सुग्रीव ने मान लिया कि भाई मारा गया, और गुफा का मुँह पत्थर से बंद कर दिया ताकि राक्षस बाहर न आ सकें।

किष्किंधा लौटकर उसने राज सँभाल लिया, क्योंकि गद्दी ख़ाली नहीं छोड़ी जा सकती थी।

फिर बालि लौट आया। उसने इसे विश्वासघात माना, सुग्रीव को निकाल दिया, और उसकी पत्नी भी रख ली। सुग्रीव ऋष्यमूक भाग गया — वह अकेली जगह जहाँ बालि एक शाप के कारण नहीं आ सकता था।

पहेली

हम सात थे, एक कतार में खड़े। एक ही बाण ने हम सबको भेद दिया। हम क्या हैं?

  • ताड़ वृक्ष
  • अशोक वृक्ष
  • साल वृक्ष
  • बरगद
पूरी कथा पढ़िए — भरोसा दिलाने का इम्तिहान

सुग्रीव ने राम से सीधे नहीं कहा कि मुझे शक है। उसने बालि की ताक़त के क़िस्से सुनाए — कि उसने दुंदुभि नाम के राक्षस का शव कोसों दूर फेंक दिया था।

राम ने पैर के अंगूठे से वह विशाल कंकाल उठाकर दूर फेंक दिया। सुग्रीव ने कहा: यह तो ठीक है, पर बालि ने इसे तब फेंका था जब यह ताज़ा और भारी था।

तब राम ने धनुष उठाया और एक बाण से सात साल वृक्ष भेद दिए। बाण वृक्षों के पार जाकर लौट भी आया।

इसके बाद सुग्रीव ने कोई सवाल नहीं किया।

तथ्य

सुग्रीव के बड़े भाई का नाम क्या था?

  • जांबवान
  • बालि
  • अंगद
  • नील
पूरी कथा पढ़िए — बालि का वरदान

बालि साधारण योद्धा नहीं था। उसे ब्रह्मा का वरदान था कि जो भी उससे युद्ध करने सामने आएगा, उसकी आधी शक्ति बालि में चली जाएगी।

इसीलिए उसे हराना लगभग असंभव था — सामने से लड़ने वाला हर योद्धा लड़ते-लड़ते आधा कमज़ोर हो जाता।

यह वरदान बालि-वध के उस विवाद का एक हिस्सा है जिस पर आज भी बहस होती है।

मरते समय बालि ने अपने बेटे अंगद को राम को सौंप दिया, और सुग्रीव से कहा कि उसका ध्यान रखे।

कौन हूँ मैं?

मैं ब्राह्मण के वेश में उनसे मिलने गया था। मेरी बातचीत सुनकर ही उन्होंने समझ लिया कि मैं साधारण नहीं हूँ। मैं कौन हूँ?

  • नल
  • जांबवान
  • सुग्रीव
  • हनुमान
पूरी कथा पढ़िए — पहली मुलाक़ात में भाषा

वाल्मीकि इस दृश्य पर ख़ास ध्यान देते हैं। हनुमान के जाने के बाद राम लक्ष्मण से लंबी बात करते हैं — हनुमान की बात के बारे में।

राम कहते हैं कि जो व्यक्ति ऋग्वेद, यजुर्वेद और व्याकरण जाने बिना ऐसा नहीं बोल सकता; उसने पूरी बात कही और एक शब्द भी अनावश्यक नहीं बोला।

यह रामायण में हनुमान का पहला परिचय है — और वह ताक़त से नहीं, भाषा से होता है।

यही कारण है कि आगे लंका जाने के लिए दूत भी वही चुने जाते हैं।

ऐसा क्यों?

पहली बार बालि और सुग्रीव के भिड़ने पर राम बाण क्यों नहीं चला पाए?

  • क्योंकि बालि ने उन्हें देख लिया था
  • क्योंकि उनका धनुष टूट गया था
  • क्योंकि दोनों भाई एक जैसे दिखते थे और पहचान नहीं हो पा रही थी
  • क्योंकि सुग्रीव ने मना कर दिया था
पूरी कथा पढ़िए — एक माला, और पहचान

पहली लड़ाई में सुग्रीव बुरी तरह पिटकर लौटा और राम पर नाराज़ हुआ — आपने बाण क्यों नहीं चलाया?

राम ने कहा कि दोनों इतने एक जैसे थे कि ग़लत भाई को मार देने का ख़तरा था।

दूसरी बार लक्ष्मण ने सुग्रीव के गले में गजपुष्पी की माला डाल दी। अब दूर से भी पहचान हो सकती थी।

छोटी-सी बात है, पर वाल्मीकि इसे छोड़ते नहीं — और इसी से पता चलता है कि यह कथा कितनी बारीकी से बुनी गई है।

कौन हूँ मैं?

मैंने अपने पंख खोकर छोटे भाई को बचाया था, और उड़ नहीं पाता था। पर मैंने ही बता दिया कि वह कहाँ है। मैं कौन हूँ?

  • संपाति
  • जटायु
  • जांबवान
  • गरुड़
पूरी कथा पढ़िए — संपाति की दृष्टि

दक्षिण वाला खोज-दल समुद्र किनारे पहुँचकर निराश बैठ गया था। तय समय बीत चुका था और लौटने पर सुग्रीव की सज़ा तय थी। कुछ वानरों ने वहीं प्राण त्यागने का मन बना लिया।

बातों-बातों में उन्होंने जटायु का ज़िक्र किया। ऊपर पहाड़ पर बैठे बूढ़े संपाति ने अपने भाई का नाम सुना और नीचे उतरे।

पूरी कथा सुनकर संपाति ने कहा कि वे लंका तक देख सकते हैं — और वहाँ अशोक वाटिका में एक स्त्री बैठी है।

यही एक सूचना पूरी खोज को दिशा दे देती है। इसके बाद सवाल सिर्फ़ यह बचता है कि समुद्र कौन लाँघेगा।

क्या हुआ?

आकाश से गिरी गहनों की गठरी को देखकर क्या हुआ?

  • राम ने तुरंत सब पहचान लिए
  • लक्ष्मण ने केवल पायल पहचानी
  • सुग्रीव ने गहने लौटाने से मना कर दिया
  • गठरी में सीता का पत्र निकला
पूरी कथा पढ़िए — जो सिर्फ़ पैरों को जानता था

यह रामायण के सबसे बारीक क्षणों में से एक है, और अक्सर छूट जाता है।

जब गहने दिखाए गए, राम ने लक्ष्मण से पूछा कि क्या ये सीता के हैं। लक्ष्मण ने जवाब दिया कि वे कुंडल नहीं पहचानते, न बाजूबंद — पर पायल पहचानते हैं।

कारण उन्होंने ख़ुद बताया: वे रोज़ सीता के चरणों में प्रणाम करते थे, इसलिए उनकी नज़र कभी ऊपर उठी ही नहीं।

एक वाक्य में लक्ष्मण का पूरा चरित्र खड़ा हो जाता है — पर एक सावधानी भी है: यह श्लोक कुछ प्राचीन पांडुलिपियों और बड़ौदा के आलोचनात्मक संस्करण में नहीं मिलता। यानी यह प्रचलित पाठ का हिस्सा है, हर पाठ-परंपरा का नहीं।

तथ्य

बालि के बाद अंगद को क्या बनाया गया?

  • सेनापति
  • राजा
  • दूत
  • युवराज
पूरी कथा पढ़िए — अंगद, जो बीच में खड़ा था

अंगद की स्थिति अजीब थी। उसके पिता को राम ने मारा था, और अब वह उसी राम के पक्ष की सेना में युवराज था।

बालि ने मरते समय ख़ुद यह तय किया था। उसने अंगद से कहा कि सुग्रीव की बात मानना, और सुग्रीव से कहा कि अंगद को बेटे की तरह रखना।

आगे युद्धकांड में अंगद ही रावण के दरबार में दूत बनकर जाता है, और वहाँ अपना पैर जमा देता है — जिसे कोई हिला नहीं पाता।

किसने कहा?

"अगर तुम अपना वचन भूल गए हो, तो याद रखना कि जिस रास्ते बालि गया, वह रास्ता अभी बंद नहीं हुआ है।" — बरसात के बाद यह चेतावनी किसने दी?

  • राम
  • हनुमान
  • अंगद
  • लक्ष्मण
पूरी कथा पढ़िए — बरसात के वे महीने

राजा बनने के बाद सुग्रीव वर्षों की भागदौड़ से थका हुआ था। किष्किंधा लौटकर वह भोग में डूब गया और खोज की बात टलती रही।

राम चार महीने प्रवर्षण पर्वत की गुफा में रहे। वाल्मीकि उनकी बेचैनी का लंबा वर्णन करते हैं — बरसात, बादल, और सीता की याद।

बरसात ख़त्म होने पर भी कोई ख़बर नहीं आई। तब लक्ष्मण भेजे गए, और उनके क्रोध की ख़बर पहले ही किष्किंधा पहुँच गई।

हनुमान ने सुग्रीव को जगाया, तारा ने लक्ष्मण को शांत किया, और उसी दिन चारों दिशाओं में दल भेजे गए।

सही क्रम

इन घटनाओं का सही क्रम कौन-सा है?

  • सात साल वृक्ष → हनुमान से भेंट → बालि-वध → संपाति
  • हनुमान से भेंट → सात साल वृक्ष → बालि-वध → संपाति
  • हनुमान से भेंट → बालि-वध → सात साल वृक्ष → संपाति
  • संपाति → हनुमान से भेंट → सात साल वृक्ष → बालि-वध
पूरी कथा पढ़िए — आधा कांड सिर्फ़ भरोसे में

किष्किंधाकांड का ढाँचा दिलचस्प है। इसमें सीता की खोज असल में बहुत देर से शुरू होती है।

पहले आधे हिस्से में कोई खोज नहीं होती — सिर्फ़ भरोसा बनता है। हनुमान से भेंट, सुग्रीव से मित्रता, वृक्षों वाला इम्तिहान, बालि-वध, राज्याभिषेक।

फिर बरसात के चार महीने पूरे बीत जाते हैं।

खोज असल में कांड के आख़िरी हिस्से में शुरू होती है, और तुरंत नतीजे तक पहुँच जाती है — क्योंकि तब तक साथ देने वाले तैयार हो चुके हैं।