
कांड ५
सुंदरकांड
एक वानर, एक समुद्र, और एक शहर जो जल गया
समुद्र के ऊपर
हनुमान महेंद्र पर्वत पर चढ़े।
पीछे पूरा दल खड़ा उन्हें देख रहा था।
उन्होंने अपना शरीर बढ़ाया, पर्वत को पैरों से दबाया, और छलाँग लगा दी।
नीचे समुद्र था। आगे कुछ दिखाई नहीं देता था — न किनारा, न कोई निशान। सिर्फ़ पानी, और उसके ऊपर हवा।
रास्ते में समुद्र ने मैनाक पर्वत को नीचे से ऊपर भेजा।
मैनाक पानी से उठकर सामने आ गया, ताकि हनुमान उस पर बैठकर थोड़ी देर सुस्ता लें।
यह मदद थी, रुकावट नहीं।
हनुमान ने उसे हाथ से छूकर धन्यवाद दिया और आगे बढ़ गए। उन्होंने कहा कि काम पूरा होने से पहले कहीं रुकना नहीं है।
फिर सुरसा ने रास्ता रोक लिया।
यह देवताओं की भेजी हुई परीक्षा थी। वे देखना चाहते थे कि जो जा रहा है, उसमें ताक़त के अलावा बुद्धि भी है या नहीं।
सुरसा ने कहा कि मेरे मुँह में घुसे बिना यहाँ से कोई नहीं जा सकता।
हनुमान ने अपना रूप बड़ा करना शुरू किया।
सुरसा ने अपना मुँह और बड़ा कर लिया।
हनुमान और बड़े हुए। मुँह और बड़ा हुआ।
फिर अचानक हनुमान अंगूठे जितने छोटे हो गए, उस विशाल मुँह के भीतर गए, और दूसरी ओर से निकल आए।
शर्त पूरी हो गई, और लड़ाई हुई ही नहीं।
आगे सिंहिका ने नीचे से उनकी परछाईं पकड़ ली। वह परछाईं पकड़कर आकाश में उड़ते जीवों को नीचे खींच लेती थी।
हनुमान को लगा जैसे कोई उन्हें पीछे खींच रहा हो।
उन्होंने वही तरकीब दोहराई जो अभी काम आई थी। वे उसके मुँह में गए, और भीतर से उसे चीरकर बाहर निकल आए।
आगे लंका थी।
रात की लंका
लंका पहुँचकर हनुमान ने अपना रूप बहुत छोटा कर लिया और अँधेरे में नगर के भीतर घुसे।
द्वार पर लंकिनी ने उन्हें रोका।
हनुमान के एक ही घूँसे से वह गिर पड़ी।
गिरते हुए उसने कहा कि उसे बहुत पहले बता दिया गया था — जिस दिन कोई वानर उसे हरा देगा, उस दिन से लंका के दिन गिने हुए होंगे।
वह दिन आ चुका था, और नगर सो रहा था।
हनुमान ने रात भर कोना-कोना छान डाला।
वे महलों की छतों पर चढ़े, कमरों में झाँका, गलियाँ नापीं।
वे रावण के महल तक पहुँचे और उसे सोते हुए देखा।
एक कमरे में उन्होंने मंदोदरी को देखा और पल भर के लिए धोखा खा गए — कहीं यही तो नहीं।
फिर उन्होंने ख़ुद को सँभाला। जो स्त्री यहाँ इस तरह चैन से सो रही है, वह वह नहीं हो सकती जिसे वे खोजने आए हैं।
सीता कहीं नहीं थीं।
पूरी रात बीत चुकी थी। थककर हनुमान एक जगह बैठ गए।
लौट जाने का ख़याल भी आया — और उसके साथ यह भी कि लौटकर कहेंगे क्या।
फिर उन्हें याद आया कि एक जगह अभी बची है।
अशोक वाटिका।
अशोक वाटिका
अशोक वाटिका में, एक शिंशपा पेड़ के नीचे, राक्षसियों से घिरी हुई सीता बैठी थीं।
दुबली। मैले कपड़ों में। ज़मीन पर बैठी हुई।
पर टूटी हुई नहीं।
हनुमान पेड़ की डाल पर, पत्तों के बीच छिपकर बैठ गए, और देखते रहे।
तभी रावण वहाँ आया।
उसने आख़िरी बार समझाने की कोशिश की। फिर वह धमकी पर उतर आया।
उठाकर लाते समय उसने बारह महीने की मोहलत दी थी। दस बीत चुके थे।
दो महीने और, उसने कहा। उसके बाद सोच लेना।
रावण के जाते ही राक्षसियाँ सीता को घेरकर डराने लगीं।
तभी उन्हीं में से एक ने सबको रोक दिया।
त्रिजटा।
उसने रात का अपना सपना सुनाया — जिसमें लंका जल रही थी और राम जीत रहे थे।
उसके बाद राक्षसियाँ चुप हो गईं।
अंगूठी और चूड़ामणि
हनुमान के सामने अब एक कठिन काम था।
उन्हें सीता से बात करनी थी, और इस तरह करनी थी कि वे चौंककर चिल्ला न पड़ें। एक चीख़ पूरी लंका को जगा देती।
तो उन्होंने पेड़ पर बैठे-बैठे धीरे-धीरे राम की कथा सुनानी शुरू की।
अयोध्या से शुरू करके, वनवास तक, और वहाँ से आगे।
नीचे बैठी स्त्री सुनने लगी।
फिर हनुमान ने ऊपर से राम की अंगूठी नीचे गिरा दी।
सीता ने उसे उठाया और पहचान लिया।
उन्होंने अपनी चूड़ामणि उतारकर हनुमान को दी।
और एक पुरानी बात भी बता दी जो सिर्फ़ राम जानते थे, ताकि सबूत में कोई कमी न रह जाए।
हनुमान ने कहा कि वे उन्हें अभी अपने साथ ले चल सकते हैं।
सीता ने मना कर दिया।
वे चाहती थीं कि राम ख़ुद आएँ और उन्हें ले जाएँ।
लंका-दहन
काम पूरा हो चुका था।
पर हनुमान यूँ ही नहीं लौटे।
उन्होंने पूरी वाटिका उजाड़ दी — पेड़ उखाड़े, बाग़ तोड़ा, और शोर मचा दिया।
पकड़ने आए राक्षसों को मारा। रावण के बेटे अक्षय का वध किया।
और फिर इंद्रजित के ब्रह्मास्त्र में जान-बूझकर बँध गए।
वे बँधना चाहते थे, क्योंकि वे रावण से आमने-सामने बात करना चाहते थे — और लंका के दरबार में बिना बंधे पहुँचने का कोई रास्ता नहीं था।
दरबार में हनुमान ने रावण को साफ़ कहा कि सीता को लौटा दे, वरना जो आएगा उसे कोई रोक नहीं पाएगा।
रावण भड़क गया और उसने हनुमान को मार डालने का आदेश दे दिया।
तभी विभीषण ने उसे रोका।
उसने कहा कि हनुमान शत्रु के दूत हैं, और दूत का वध करना उचित नहीं माना जाता। सज़ा दी जा सकती है, पर उसे मारा नहीं जाना चाहिए।
रावण ने यह बात मान ली।
तब दूसरी सज़ा तय हुई — पूँछ में आग लगा दो।
हनुमान ने पूँछ लंबी करनी शुरू कर दी।
कपड़ा लाया गया और पूँछ पर लपेटा जाने लगा। हनुमान पूँछ बढ़ाते गए, और राक्षस उस पर और कपड़ा और तेल चढ़ाते गए।
फिर आग लगाई गई।
और उसी पल हनुमान ने अपना रूप छोटा कर लिया।
बंधन ढीले पड़ गए, और वे निकल गए।
जलती पूँछ लेकर वे लंका की छत-दर-छत कूदते चले गए।
नगर जलता रहा।
हनुमान समुद्र पार करके अपने साथियों के पास लौटे।
फिर वे राम के सामने पहुँचे और सीता की चूड़ामणि उन्हें सौंप दी।
सीता मिल गई थीं। वे जीवित थीं, और लंका में राम का इंतज़ार कर रही थीं।
टिप्पणी: मैनाक, सुरसा, सिंहिका, लंकिनी, अशोक वाटिका में सीता से भेंट, त्रिजटा का सपना, चूड़ामणि और लंका-दहन — सब वाल्मीकि के सुंदरकांड में हैं। रावण पहले हनुमान को मार डालने का आदेश देता है, और विभीषण उसे यह कहकर रोकता है कि दूत का वध नहीं किया जाता; रावण मान जाता है और तब पूँछ जलाने की सज़ा तय होती है (सर्ग ५२–५३)। सुरसा को देवताओं ने भेजा था, और पाठ कारण भी बताता है: यह देखना कि हनुमान में बल के साथ बुद्धि भी है या नहीं (सर्ग १)। रावण की "दो महीने" वाली धमकी (५.२२.८–९) उसी बारह महीने की मोहलत का बचा हुआ हिस्सा है जो उसने हरण के समय दी थी — हनुमान के पहुँचने तक दस महीने बीत चुके थे। सीता का हनुमान के साथ लौटने से मना करना भी पाठ में है। इस कांड का नाम "सुंदरकांड" क्यों पड़ा, इस पर परंपराएँ एकमत नहीं हैं — इसलिए यहाँ कोई एक कारण नहीं बताया गया।
स्रोत: वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड