
कांड ६
युद्धकांड
दस सिर, और उन्हें गिराने में पूरी सेना लगी
विभीषण
लंका जल चुकी थी।
एक वानर आया था, नगर के भीतर घूमा था, राजकुमार को मारा था, और नगर का बड़ा हिस्सा जलाकर चला गया था।
रावण की सभा में उस दिन जो बहस हुई, उसमें ज़्यादातर लोग बदले की बात कर रहे थे।
लेकिन एक आवाज़ अलग थी। विभीषण की।
विभीषण रावण का छोटा भाई था।
उसने भरी सभा में वही कहा जो कोई नहीं कह रहा था — सीता लौटा दो। जो हुआ है वह ग़लत हुआ है, और इसी में सबकी भलाई है।
रावण ने उसे लात मारकर सभा से निकाल दिया।
विभीषण अपने चार साथियों को लेकर समुद्र पार कर गया और राम के पास आ पहुँचा।
वानरों को शक हुआ। यह रावण का भाई है। यह जासूस हो सकता है। इसे पास आने देना मूर्खता है।
हनुमान ने उसका पक्ष लिया।
और राम ने कहा कि जो शरण में आ जाए, उसे वे लौटाते नहीं।
उसी समय, वहीं किनारे पर, विभीषण को लंका का राजा घोषित कर दिया गया — उस लंका का, जो अभी जीती भी नहीं गई थी।
समुद्र और सेतु
अब सामने समुद्र था।
राम तीन दिन किनारे बैठे रहे और रास्ता माँगते रहे।
कोई जवाब नहीं आया।
चौथे दिन उन्होंने धनुष उठा लिया।
तब समुद्र ने रास्ता बताया — तुम्हारी अपनी सेना में नल है, विश्वकर्मा का पुत्र। वह सेतु बना सकता है, और जो वह रखेगा उसे मैं टिकने दूँगा।
नल ने काम सँभाला, और वानर पत्थर ढोने लगे।
सेतु पाँच दिन में बना। लंबाई सौ योजन।
पूरी सेना उस पर चलकर समुद्र पार कर गई।
इसी सेतु के साथ दो कहानियाँ जुड़ी हैं जो घर-घर में सुनाई जाती हैं।
पहली यह कि वानरों ने पत्थरों पर राम का नाम लिखा, और उसी से पत्थर पानी पर तैरने लगे।
दूसरी एक गिलहरी की है।
कहा जाता है कि जब बड़े-बड़े वानर विशाल चट्टानें ढो रहे थे, तब एक छोटी-सी गिलहरी भी काम में लग गई। वह पानी में जाकर भीगती, फिर रेत में लोटती, और दौड़कर सेतु पर जाकर अपने शरीर की रेत झाड़ आती — ताकि पत्थरों के बीच की दरारें भर जाएँ।
कुछ वानर उस पर हँसे।
राम ने उन्हें रोका।
उन्होंने कहा कि काम बड़ा या छोटा नहीं होता। जो जितना कर सकता है, उतना कर रहा है, और गिलहरी अपनी पूरी ताक़त लगा रही है।
फिर उन्होंने उसे उठाकर पीठ सहलाई।
कहा जाता है कि गिलहरी की पीठ पर जो धारियाँ होती हैं, वे राम की उँगलियों के निशान हैं।
अंगद का संदेश
अंगद दूत बनकर रावण के दरबार गया।
यह आख़िरी मौक़ा था, और दोनों पक्ष यह जानते थे।
संदेश में शर्त भी थी और उसका अंजाम भी — सीता को आदर के साथ लौटा दो, नहीं तो तुम मारे जाओगे और लंका विभीषण की होगी।
रावण ने पूरा सुना।
फिर उसने अपने सेवकों से कहा कि इस वानर को पकड़कर मार डालो।
चार राक्षस उसे पकड़ने बढ़े।
अंगद ने ख़ुद को पकड़ लेने दिया।
फिर वह उन्हें लटकाए हुए महल की छत पर जा चढ़ा। वे नीचे गिरते चले गए।
और अंगद रावण के महल की छत तोड़ता हुआ अपनी सेना में लौट आया।
उसके बाद बात करने को कुछ नहीं बचा था।
नागपाश
शुरुआती दिनों में ही इंद्रजित ने नागपाश चलाया — साँप, जो उसकी माया से बाण बन गए थे।
राम और लक्ष्मण दोनों बँधकर मैदान में गिर पड़े।
दोनों भाई वहीं पड़े रहे, बाणों की शय्या पर, ख़ून से भरे हुए।
सेना में हाहाकार मच गया। जिनके भरोसे समुद्र पार किया गया था, वे दोनों ज़मीन पर थे।
फिर गरुड़ आए।
उन्हें देखते ही वे साँप भाग खड़े हुए, और गरुड़ के छूते ही दोनों के घाव भर गए।
कुम्भकर्ण
फिर रावण ने कुम्भकर्ण को जगाने का आदेश दिया।
कुम्भकर्ण महीनों सोता था। उसे जगाना अपने-आप में एक अभियान था — हज़ारों राक्षस लगे, ढोल बजाए गए, हाथी उसके ऊपर चलाए गए, पानी डाला गया।
वह जागा।
उसने सारी बात सुनी, और सुनकर अपने भाई को खरी बात कही।
उसने यह नहीं कहा कि सीता लौटा दो। वह विभीषण की बात थी।
उसने कुछ और कहा।
उसने कहा कि जो आज सामने खड़ा है, उसकी चेतावनी पहले ही दी जा चुकी थी। मंत्रियों ने, हितैषियों ने, सलाह देने वालों ने — सबने कहा था। रावण ने किसी की नहीं सुनी, और आज वही हो रहा है जो तब बताया गया था।
फिर वह लड़ने चला गया।
वजह उसने ख़ुद बताई, और उसमें कोई बहाना नहीं था।
वह भाई है, और भाई मुसीबत में है।
ग़लती पर वह अपने भाई को टोक सकता था। छोड़ नहीं सकता था।
वह उसी दिन मारा गया।
इंद्रजित
रावण का बेटा इंद्रजित सबसे ख़तरनाक निकला।
वह सामने आकर नहीं लड़ता था।
उसे वह विद्या आती थी जिससे वह अदृश्य होकर लड़ सके। वह बादलों में चला जाता, और वहीं से बाण चलाता। तीर आते दिखते थे, चलाने वाला नहीं दिखता था।
नीचे खड़ी सेना का हर वार ख़ाली जाता था, क्योंकि निशाना कहीं था ही नहीं।
वानर मरते जा रहे थे और लड़ नहीं पा रहे थे। यह किसी भी सेना को तोड़ने के लिए काफ़ी है।
उसका नाम भी उसी से आया था। उसने युद्ध में इंद्र को हराया था।
उससे निपटने का एक ही रास्ता था, और लक्ष्मण ने वही लिया।
इंद्रजित निकुम्भिला में एक यज्ञ कर रहा था। वह यज्ञ पूरा हो जाता तो वह अजेय हो जाता, और तब उसे कोई नहीं मार सकता था।
लक्ष्मण ने वह यज्ञ भंग किया, और उसी लड़ाई में इंद्रजित को मार गिराया।
यही असली मोड़ था।
इसके बाद रावण के पास कोई नहीं बचा — न भाई, न बेटा, न सेनापति।
शक्ति और संजीवनी
अब रावण ख़ुद मैदान में उतरा।
और उसी लड़ाई में उसने लक्ष्मण पर शक्ति चलाई।
लक्ष्मण गिरे और उठे नहीं। ख़ून बहता रहा, साँस चलती रही, पर वे बेहोश पड़े थे।
राम उन्हें उठाकर बैठ गए।
जिस भाई ने चौदह बरस पहले बिना पूछे उनके पीछे चल देने का फ़ैसला किया था, वह अब उनकी गोद में पड़ा था।
वानर वैद्य सुषेण को बुलाया गया।
उन्होंने देखा और बताया कि लक्ष्मण अभी जीवित हैं।
फिर उन्होंने हनुमान से कहा कि औषधि-पर्वत पर जाइए। वहाँ चार औषधियाँ मिलती हैं — विशल्यकरणी, सावर्ण्यकरणी, संजीवकरणी और संधानकरणी।
हनुमान उड़ पड़े।
पर पहाड़ पर पहुँचकर उन्हें वे औषधियाँ मिलीं ही नहीं। जैसे ही उन्हें पता चला कि कोई खोजने आ रहा है, वे सब ओझल हो गईं।
हनुमान ने उनसे बहस नहीं की।
उन्होंने पूरी चोटी ही उखाड़ ली, और उसे लेकर लौट आए।
लक्ष्मण उठ बैठे।
अहिरावण
लोकप्रिय रामकथा में इसी दौर की एक और कहानी सुनाई जाती है, जो उत्तर भारत में बहुत प्रसिद्ध है।
उसमें रावण का एक भाई या सहयोगी है, अहिरावण, जो पाताल लोक का राजा है।
वह माया से युद्ध-शिविर में घुसता है और सोते हुए राम और लक्ष्मण दोनों को उठाकर पाताल ले जाता है, ताकि वहाँ उनकी बलि दे सके।
हनुमान उन्हें खोजते हुए पाताल पहुँचते हैं।
वहीं उनकी भेंट मकरध्वज से होती है, जो कथा के अनुसार उन्हीं का पुत्र है और पाताल के द्वार की रखवाली करता है।
आख़िर हनुमान अहिरावण को हराते हैं और दोनों भाइयों को कंधों पर बिठाकर वापस ले आते हैं।
यह पूरा प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं है। यह बाद की परंपराओं और लोक-रामायणों से आया है।
राम और रावण
अब निर्णायक लड़ाई दो लोगों के बीच थी।
जो अब तक लड़े थे, वे रावण के भाई थे, उसका बेटा था, उसके सेनापति थे।
सब जा चुके थे।
लंका में अब उसके आगे कोई नहीं था, और उसके पीछे भी कोई नहीं था।
तभी ऋषि अगस्त्य राम के पास आए और उन्हें आदित्य हृदय दिया — सूर्य की वह स्तुति, जिसे तीन बार पढ़ने को उन्होंने कहा।
फिर दोनों आमने-सामने आए।
लड़ाई लंबी चली। इतनी लंबी कि दोनों ओर की सेनाएँ लड़ना छोड़कर देखने लगीं।
राम जो सिर काटते, उसकी जगह वैसा ही दूसरा सिर उग आता। वे उसे भी काट देते, और तीसरा उग आता।
यह एक बार नहीं हुआ। सौ सिर कटे, और रावण के मरने का कोई लक्षण नहीं दिखा।
राम रुके।
वे सोच में पड़ गए। जो बाण अब तक हर शत्रु पर काम कर चुके थे, वे इस एक पर काम क्यों नहीं कर रहे।
फिर उन्होंने वह अस्त्र उठाया जो ब्रह्मा का दिया हुआ था।
वह अस्त्र सिर पर नहीं गया।
वह छाती में लगा।
और रावण गिर पड़ा।
विभीषण का राज्याभिषेक हुआ — वही घोषणा, जो समुद्र के इस पार बहुत पहले हो चुकी थी, अब लंका में पूरी हुई।
अग्नि-परीक्षा
युद्ध जीत लिया गया था।
सवाल अभी बाक़ी था।
सीता को बुलाया गया।
जो हुआ, उसकी उम्मीद किसी को नहीं थी।
राम ने भरी सभा में कहा कि यह युद्ध उन्होंने अपने कुल के अपमान का बदला लेने के लिए लड़ा था। उन्होंने कहा कि जो स्त्री इतने समय दूसरे के घर में रही हो, उसे वे इस तरह वापस नहीं ले सकते।
और उन्होंने सीता से कहा कि वे जहाँ चाहें जा सकती हैं।
सभा चुप हो गई।
सीता ने जवाब दिया।
उन्होंने कहा कि जो उनके साथ हुआ, उसमें उनका कोई चुनाव नहीं था। रावण ने उन्हें उठाया था, वे गई नहीं थीं।
और अगर राम को यही कहना था, तो हनुमान के आने के दिन ही कहला देते। वे तभी प्राण छोड़ देतीं, और यह पूरा युद्ध न होता।
फिर उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि चिता तैयार करो।
लक्ष्मण ने राम की ओर देखा।
राम ने मना नहीं किया।
चिता जली, और सीता उसमें चली गईं।
और अग्नि ने उन्हें लौटा दिया — बिना किसी चोट के, सबके सामने।
तब राम ने कहा कि उन्हें सीता पर कभी शक नहीं था। पर वे जानते थे कि लोग पूछेंगे, और वे चाहते थे कि जवाब सबके सामने आए।
यही तर्क बरसों बाद फिर लौटेगा।
और अगली बार अग्नि बीच में नहीं होगी।
फिर सब पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे।
चौदह साल ठीक उसी दिन पूरे हो रहे थे।
नंदिग्राम में भरत दिन गिन रहे थे, और उन्होंने कह रखा था कि जिस दिन तक राम नहीं लौटे, उसके बाद वे जीवित नहीं रहेंगे।
विमान समय पर पहुँच गया।
टिप्पणी: विभीषण का आना, नल का सेतु (पाँच दिन, सौ योजन — सर्ग २२), अंगद का दूत जाना (सर्ग ४१), नागपाश और गरुड़ (सर्ग ५०), कुम्भकर्ण, इंद्रजित का निकुम्भिला में वध, लक्ष्मण का गिरना और औषधि-पर्वत (सर्ग १०१), आदित्य हृदय (सर्ग १०५), सौ सिरों का बार-बार उगना (सर्ग १०७) और अग्नि-परीक्षा (सर्ग ११५–११६) — सब वाल्मीकि के युद्धकांड में हैं। पर पत्थरों पर राम-नाम लिखने से उनका तैरना, और सेतु बनाती गिलहरी — ये दोनों वाल्मीकि में नहीं हैं। वे बाद की परंपराओं और लोक-कथाओं से आए हैं। अहिरावण और पाताल लोक की पूरी कथा भी वाल्मीकि में नहीं है। और संजीवनी लाने की "सूरज उगने से पहले" वाली समय-सीमा भी पाठ में नहीं है — यह बहुत प्रसिद्ध ब्योरा है, पर सर्ग १०१ में ऐसी कोई शर्त नहीं। हनुमान औषधि इसलिए नहीं पहचान पाए कि आता हुआ कोई देखकर औषधियाँ ओझल हो गईं। कुम्भकर्ण "सीता लौटा दो" नहीं कहता — वह विभीषण का तर्क है। कुम्भकर्ण रावण को इस बात पर टोकता है कि उसने सलाहकारों की चेतावनी नहीं मानी (सर्ग ६३), और लड़ता इसलिए है कि भाई मुसीबत में है। लक्ष्मण पर शक्ति भी इंद्रजित ने नहीं, रावण ने चलाई — इंद्रजित उससे पहले मारा जा चुका है।
स्रोत: वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड