
अध्याय १०
भस्मासुर
शिव ने बिना सोचे वह वरदान दे दिया, और अगले ही पल वह वरदान उन्हीं के सिर की ओर बढ़ा
एक तप, एक हाज़िर देवता
एक असुर ने शिव के लिए घोर तप किया — सालों, बिना अन्न, बिना जल।
शिव देवताओं में सबसे जल्दी पिघलते हैं। उन्हें "आशुतोष" कहते हैं — जो तुरंत प्रसन्न हो जाए, "भोलेनाथ" — जो सीधा-सादा है। तप अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि शिव सामने आ खड़े हुए।
"माँग," उन्होंने कहा। "जो चाहिए।"
वरदान, बिना तौले
असुर ने कहा: "मैं जिसके भी सिर पर हाथ रखूँ, वह उसी पल जलकर राख हो जाए।"
शिव ने पूछा नहीं कि यह वरदान किसके लिए है, किस पर चलेगा, इसका अंत क्या होगा। उन्होंने बस कहा, "ऐसा ही होगा।"
यही इस पूरी गाथा की धुरी है, अपने सबसे नंगे रूप में: शिव माँगनेवाले को तौलते नहीं। वही स्वभाव जो उन्हें वह विष पिला देता है जिसे कोई नहीं छूता, वही स्वभाव इस असुर के हाथ में एक ऐसी शक्ति रख देता है जो संसार ख़त्म कर सकती है।
हाथ, जो शिव की ओर बढ़ा
वरदान मिलते ही असुर ने सोचा: "पहले इसे इसी देवता पर आज़माऊँ। फिर पार्वती मेरी।"
उसने हाथ उठाया और शिव की ओर बढ़ा।
शिव मुड़े और भागे। पीछे असुर, हाथ ताने। पर्वत लाँघे गए, नदियाँ पार हुईं, लोक बदले — और वरदान देने वाला अपने ही दिए वरदान से जान बचाकर भाग रहा था।
विष्णु के पास
शिव दौड़ते हुए विष्णु तक पहुँचे।
"मैंने एक वरदान दे दिया," उन्होंने कहा, "और सोचा नहीं।"
विष्णु ने कुछ नहीं कहा। वे अंतर्धान हो गए — और असुर के रास्ते में एक स्त्री प्रकट हुई, ऐसी सुंदर कि असुर वहीं रुक गया। यह मोहिनी थीं — विष्णु का वही रूप जो समुद्र-मंथन में अमृत बाँटने आया था।
नाच, जो नक़ल का था
"तुम कौन हो?" असुर ने पूछा, हाथ की बात भूलकर।
"मैं नाचती हूँ," मोहिनी बोलीं। "अगर तुम मेरे साथ नाच सको — हर मुद्रा हूबहू मेरी तरह — तो मैं तुम्हारी।"
असुर मान गया। मोहिनी नाचने लगीं, और असुर हर मुद्रा उनकी नक़ल करता गया — हाथ इधर, हाथ उधर, कमर, गरदन।
फिर मोहिनी ने नाचते-नाचते अपना हाथ अपने ही सिर पर रखा।
असुर ने भी — बिना सोचे, नक़ल में — अपना हाथ अपने सिर पर रख दिया।
वह उसी पल राख हो गया। उसी वरदान से जो शिव ने उसे दिया था।
जो शिव ने सीखा, और जो नहीं
पार्वती ने बाद में पूछा होगा कि उन्होंने बिना सोचे वरदान क्यों दिया।
पर गाथा इसका कोई पछतावा दर्ज नहीं करती। शिव आगे भी ऐसे ही वरदान देते हैं — रावण को, अंधक को, बाणासुर को। हर बार कोई और — अक्सर विष्णु — पीछे से चीज़ें सँभालता है।
यह शिव की कमज़ोरी है या उनका स्वभाव, यह गाथा तय नहीं करती। वह बस इतना कहती है: जो हाथ विष के लिए खुलता है, वह वरदान के लिए भी खुला रहता है — और दोनों बार बिना तौले।
टिप्पणी: भस्मासुर की कथा शिव पुराण और लोक-परंपरा में मोहिनी और नृत्य के साथ आती है; भागवत पुराण (दसवाँ स्कंध, अध्याय ८८) में असुर का नाम वृकासुर है और विष्णु एक ब्रह्मचारी बालक बनकर उसे छलते हैं। भागवत वाला रूप कृष्ण की ज़ुबानी है और उसका ज़ोर इस बात पर है कि शिव जल्दबाज़ी में वरदान देते हैं जबकि विष्णु के भक्त सुरक्षित रहते हैं — यानी यह एक वैष्णव ग्रंथ की शैव-देवता पर टिप्पणी है, ठीक वैसे ही जैसे लिंगोद्भव एक शैव दावा है। केरल में यह कथा कथकली और मोहिनीअट्टम का प्रिय विषय है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, भस्मासुर