
अध्याय २
दक्ष का यज्ञ
एक पिता ने अपनी बेटी के पति को यज्ञ में जगह नहीं दी, और बेटी ने उसी सभा में योगबल से अपनी देह त्याग दी
जो सभा में खड़ा नहीं हुआ
प्रजापति दक्ष अपने दामाद से नाराज़ थे, और नाराज़गी की जड़ पुरानी थी।
एक बड़ी सभा में दक्ष भीतर आए तो सब उठकर खड़े हो गए — सब, सिवाय शिव के। शिव अपने आसन पर बैठे रहे, आधी खुली आँखों से, जैसे सभा का होना-न-होना उनके लिए एक बराबर हो।
दक्ष के लिए यह अपमान था। "मैंने अपनी बेटी सती इसे दी," उन्होंने कहा, "इस श्मशान में घूमने वाले को, जिसके गले में साँप हैं और बदन पर राख। और यह मेरे सामने बैठा रहता है।"
शिव कुछ नहीं बोले। दक्ष ने मन में गाँठ बाँध ली।
निमंत्रण, जो नहीं आया
कुछ समय बाद दक्ष ने एक बड़ा यज्ञ रचा। सारे देवता, सारे ऋषि, सारे प्रजापति बुलाए गए। हर दिशा से रथ कनखल की ओर चले।
एक घर को न्योता नहीं गया — कैलास।
सती ने आकाश में उड़ते रथ देखे, संगीत सुना, और अपने पिता के यज्ञ की तैयारी की ख़बर हवा से पाई। उन्होंने शिव से कहा, "मुझे जाना है। वह मेरे पिता हैं। न्योता हो या न हो, बेटी को घर जाने के लिए बुलावे की ज़रूरत नहीं होती।"
"वहाँ तुम्हारा अपमान होगा," शिव ने कहा। "और मेरा भी, तुम्हारे ज़रिये। मत जाओ।"
सती फिर भी गईं।
भरी सभा में
सती यज्ञ-स्थल पहुँचीं। बाक़ी सभा दक्ष के डर से आगे नहीं बढ़ी, पर उनकी माँ और बहनें दौड़कर आईं, उन्हें गले लगाया और आँखों में आँसू लिए प्यार से उनका स्वागत किया। दक्ष ने ही अपनी बेटी की ओर ध्यान नहीं दिया — वे हवन-कुंड के पास खड़े रहे।
सती ने पूछा, "आपने हर देवता को बुलाया। शिव को क्यों नहीं?"
दक्ष ने भरी सभा में जवाब दिया — शिव के बारे में, उनके रूप के बारे में, उनके साथियों के बारे में, ऐसी बातें जो एक ससुर को अपने दामाद के लिए कभी नहीं कहनी चाहिए। सती वहीं खड़ी सब सुनती रहीं।
जिस देह से वे दक्ष की बेटी थीं, अब उन्हें वही देह नहीं चाहिए थी।
योग की आग
सती ज़मीन पर बैठ गईं, आँखें मूँदीं, और अपनी साँस को भीतर की ओर मोड़ लिया।
"मैं यह शरीर लौटाती हूँ," उन्होंने कहा, "जो आपसे मिला। अगले जन्म में मैं ऐसे घर में जन्म लूँगी जहाँ शिव का अपमान न हो।"
उनके अपने योग से उनके भीतर आग उठी और देह को भस्म कर गई। यज्ञ-स्थल पर सन्नाटा छा गया। हवन की आग अब भी जल रही थी, पर यज्ञ रुक चुका था।
ख़बर कैलास की ओर चली।
कैलास तक पहुँची ख़बर
शिव ने ख़बर सुनी और कुछ देर कुछ नहीं किया — न बोले, न हिले।
फिर उन्होंने अपनी जटा से एक लट नोची और उसे ज़मीन पर दे मारा।
आगे जो हुआ, वह अगले अध्याय की कथा है — पर उस एक लट से जो उठा, उसने दक्ष के यज्ञ को उसकी नींव तक उखाड़ दिया।
जिसे ग्रंथ अलग-अलग कहते हैं
यह कथा शिव पुराण (रुद्र संहिता, सती खंड) में सबसे विस्तार से है, पर भागवत पुराण, वायु पुराण, मत्स्य पुराण और कूर्म पुराण में भी है — और ब्योरे हर जगह एक जैसे नहीं।
भागवत में सती आग में कूदती नहीं, अपने योगबल से देह त्यागती हैं। कुछ पुराणों में झगड़े की जड़ वही सभा वाला अपमान है; कुछ में दक्ष शुरू से ही शिव को नापसंद करते थे। महाभारत में यह कथा बहुत संक्षेप में है, और वहाँ ज़ोर यज्ञ के विध्वंस पर है, सती पर कम।
एक बात सब में एक जैसी है: एक पिता ने अपने पद के अहंकार में अपनी बेटी के पति को नीचा दिखाया, और बेटी ने उसकी क़ीमत अपनी देह से चुकाई।
टिप्पणी: दक्ष-यज्ञ की कथा शिव पुराण (रुद्र संहिता, सती खंड) में सबसे विस्तार से है, और भागवत पुराण (चौथा स्कंध), वायु पुराण, मत्स्य पुराण तथा कूर्म पुराण में भी। भागवत में सती योग-समाधि से देह त्यागती हैं, आग में कूदकर नहीं। महाभारत में यह प्रसंग संक्षिप्त है और वहाँ ज़ोर यज्ञ-विध्वंस पर है। सती के जिस देवी-रूप की यह कथा है, उसका बाद की "सती प्रथा" से सिर्फ़ नाम का रिश्ता है — कथा में देह-त्याग सती का अपना चुनाव और अपना योग है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, दक्ष का यज्ञ