
अध्याय ७
गणेश
पार्वती ने अपने उबटन से एक बेटा बनाया, और उसी बेटे ने शिव को घर के दरवाज़े पर रोक दिया
दरवाज़े पर एक पहरेदार
पार्वती स्नान करने जा रही थीं और कोई नहीं था जो दरवाज़े पर पहरा दे — गण शिव के थे, नंदी शिव का था, हर कोई शिव का था।
उन्होंने अपने बदन के उबटन से एक बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण फूँक दिए।
"तुम मेरे बेटे हो," उन्होंने कहा। "इस दरवाज़े पर खड़े रहो। जब तक मैं न कहूँ, किसी को अंदर मत आने देना — कोई भी हो।"
बालक ने डंडा उठाया और दरवाज़े पर खड़ा हो गया।
जो अपने ही घर में रुक गया
शिव लौटे और अंदर जाने लगे।
बालक ने रास्ता रोका। "अभी नहीं। माँ स्नान कर रही हैं।"
"माँ?" शिव रुके। "यह मेरा घर है। हट जाओ।"
बालक नहीं हटा। शिव ने अपने गण आगे किए — बालक ने उन्हें पीटकर भगा दिया। विष्णु आए, ब्रह्मा आए — बालक टस से मस नहीं हुआ।
आख़िर शिव ने त्रिशूल उठाया और एक ही वार में बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया।
पार्वती बाहर आईं
पार्वती स्नान से निकलीं और दरवाज़े पर अपने बेटे को कटा हुआ पाया।
उनका रूप बदलने लगा। "यह मेरा बेटा था। मैंने इसे बनाया था। तुमने इसे बिना पूछे, बिना जाने मार डाला।" उनकी आवाज़ में अब वह थी जो सृष्टि को समेट सकती थी। "इसे जीवित करो — वरना मैं सब कुछ ख़त्म कर दूँगी।"
शिव समझ गए कि यह ख़ाली धमकी नहीं है।
उत्तर से एक सिर
शिव ने अपने गणों से कहा: "उत्तर की ओर जाओ। जो पहला जीव उत्तर की तरफ़ सिर करके सोता मिले, उसका सिर काटकर ले आओ।"
गण उत्तर गए। पहला जीव जो उन्हें उस तरह सोता मिला, वह एक हाथी था।
वे उसका सिर ले आए। शिव ने वह सिर बालक के धड़ पर जोड़ा और प्राण लौटाए।
बालक उठा — हाथी के मुँह के साथ।
गणों का स्वामी
पार्वती का क्रोध शांत हुआ, पर उन्होंने कहा, "यह बालक हर जगह अजीब लगेगा। लोग इसका मज़ाक़ उड़ाएँगे।"
शिव ने बालक को गोद में लिया। "ऐसा नहीं होगा। आज से यह मेरे सभी गणों का स्वामी है — गणपति, गणेश। और कोई भी काम, कोई भी पूजा, कोई भी यज्ञ — सबसे पहले इसका नाम लिया जाएगा। जो इसे छोड़कर शुरू करेगा, उसका काम पूरा नहीं होगा।"
जो बालक अपने ही पिता को न पहचानने की वजह से मारा गया था, वही अब हर शुरुआत का पहला नाम बन गया।
दो भाई, एक परिक्रमा
बरसों बाद एक सवाल उठा: गणेश और कार्तिकेय में बड़ा कौन, और किसे पहले पूजा जाए।
शिव-पार्वती ने कहा: "जो पूरे संसार की परिक्रमा करके पहले लौटेगा।"
कार्तिकेय अपने मोर पर उड़ चले — समुद्र, पर्वत, हर तीर्थ।
गणेश ने अपने चूहे को देखा, फिर अपने माता-पिता को। वे उठे और शिव-पार्वती के चारों ओर एक चक्कर लगाकर बैठ गए। "मेरे लिए संसार यहीं है।"
जब कार्तिकेय थके-हारे लौटे, गणेश की परिक्रमा कब की पूरी हो चुकी थी।
टिप्पणी: गणेश-जन्म की कथा शिव पुराण (रुद्र संहिता, कुमार खंड) में है, जहाँ वे अकेले पार्वती की रचना हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण में वे शिव-पार्वती के पुत्र हैं और उनका सिर शनि की दृष्टि से जलता है। परिक्रमा वाली कथा और चंद्रमा के शाप वाली कथा मुख्यतः गणेश-केंद्रित ग्रंथों (गणेश पुराण, स्कंद पुराण के गणेश खंड) तथा लोक-परंपरा से आती हैं। टूटे दाँत (एकदंत) की कई अलग कथाएँ हैं — परशुराम वाली, और महाभारत लिखते समय वाली — जो इस अध्याय का हिस्सा नहीं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, गणेश