
अध्याय १
ज्योति का खंभा
दो देवता एक खंभे के दोनों सिरे ढूँढ़ने निकले, और एक फूल से झूठ बुलवाया गया
दो दावेदार
प्रलय के बाद जब सब कुछ जल था, उसी जल पर दो देवता आमने-सामने आ खड़े हुए — ब्रह्मा और विष्णु।
"सृष्टि मुझसे शुरू होती है," ब्रह्मा बोले। "मैं ही रचता हूँ। मुझसे बड़ा कोई नहीं।"
"तुम जिस कमल पर बैठे हो," विष्णु ने कहा, "उसकी जड़ मेरी नाभि में है। तुम मुझसे निकले हो। बड़ा मैं हुआ।"
बात बढ़ती गई। ब्रह्मा के चार मुँह एक साथ बोलने लगे, विष्णु का चक्र घूमने लगा। दोनों के वाहन — हंस और गरुड़ — पंख फैलाकर आमने-सामने आ गए। जल के ऊपर टकराव अब कुछ ही पल दूर था।
आग का एक खंभा
तभी उन दोनों के बीच कुछ फूटा।
एक खंभा — आग का, ज्योति का — जल से उठा और दोनों दिशाओं में चला गया। ऊपर उसका कोई सिरा नहीं दिखता था, नीचे उसकी कोई जड़ नहीं। न आदि, न अंत। उसकी गरमी दोनों देवताओं को पीछे धकेल गई।
फिर उसमें से एक स्वर आया, बिना किसी आकृति के:
"तुम दोनों में जो इस खंभे का एक सिरा खोज लाएगा, वही बड़ा। ऊपर जाओ या नीचे — पर सिरा लेकर लौटना।"
ब्रह्मा ने ऊपर देखा। विष्णु ने नीचे।
वराह नीचे, हंस ऊपर
विष्णु ने वराह का रूप लिया — सूअर, जिसके दाँत धरती खोद सकते हैं — और खंभे की जड़ की तरफ़ नीचे उतरने लगे। परत दर परत जल, फिर अँधेरा, फिर और अँधेरा। हज़ार बरस वे नीचे खोदते रहे। खंभा हर जगह उतना ही चौड़ा, उतना ही जलता हुआ। कोई जड़ नहीं आई।
ब्रह्मा ने हंस का रूप लिया और ऊपर उड़ चले। बादल पीछे छूटे, तारे पीछे छूटे, और ऊपर सिर्फ़ और खंभा। हज़ार बरस वे ऊपर उड़ते रहे। कोई चोटी नहीं आई।
दोनों थक चुके थे। दोनों को पता चल गया था कि यह खंभा नापा नहीं जा सकता।
केतकी से झूठ
तभी ब्रह्मा को ऊपर से कुछ नीचे गिरता दिखा — एक फूल। केतकी। सुगंध वाला, सफ़ेद, धीरे-धीरे हवा में उतरता हुआ।
"तुम कहाँ से आ रही हो?" ब्रह्मा ने पूछा।
"बहुत ऊपर से," फूल बोला। "उस खंभे की चोटी पर शिव के सिर से गिरी हूँ। युगों से गिर रही हूँ।"
ब्रह्मा रुक गए। चोटी वे नहीं पा सके थे — पर यह फूल वहाँ से आया था।
"मेरे साथ नीचे चलो," उन्होंने कहा। "और यह कहना कि तुम्हें मैंने चोटी से तोड़ा। बस इतना।"
फूल हिचका। फिर मान गया।
उधर विष्णु नीचे से लौट आए थे। उन्होंने खंभे के सामने हाथ जोड़े और सीधा कह दिया: "मैं जड़ तक नहीं पहुँचा। इसका कोई अंत नहीं है। मैं हार गया।"
खंभे से शिव
ब्रह्मा नीचे आए और बोले: "मैं चोटी तक गया। यह रहा प्रमाण — यह केतकी का फूल, जो मैंने वहीं से तोड़ा। यह भी गवाही देगा।"
फूल ने सिर झुकाकर हामी भर दी।
और तभी खंभा बीच से खुला।
उसमें से शिव निकले — पूरे, शांत, आँखें खुली हुई। "झूठ," उन्होंने कहा। "तुम चोटी तक नहीं पहुँचे, ब्रह्मा। और तुमने एक फूल से झूठ बुलवाया।"
शिव ने ब्रह्मा की तरफ़ देखा। "तुम रचयिता हो, पर तुमने अपने पद के लिए झूठ बोला। इसलिए इस पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा नहीं होगी। मंदिर तुम्हारे नाम पर नहीं बनेंगे।"
फिर केतकी की तरफ़। "और तुमने झूठी गवाही दी। आज से तुम मेरी पूजा में नहीं चढ़ोगी।"
फिर विष्णु की तरफ़, नरम होकर। "तुमने हार मान ली, सच बोला। इसलिए तुम्हारी पूजा मेरे बराबर होगी, अलग मंदिरों में, अलग नामों से।"
खंभा शिवलिंग बन गया — जिसका न आदि, न अंत। और उसमें से शिव के निकलने का यह रूप आगे "लिंगोद्भव" कहलाया।
जिसे परंपरा ने इस रात से जोड़ा
दक्षिण भारत के शिव मंदिरों में गर्भगृह की पश्चिमी दीवार पर अक्सर यही दृश्य उकेरा मिलता है — बीच में खंभा, नीचे सूअर के रूप में विष्णु खोदते हुए, ऊपर हंस के रूप में ब्रह्मा उड़ते हुए, और खंभे के बीच में से निकलते शिव।
शैव परंपरा महाशिवरात्रि की रात को इसी घटना से जोड़ती है — वह रात जब शिव पहली बार लिंग-रूप में प्रकट हुए।
पर यह कहानी खुले तौर पर एक शैव दावा है। वैष्णव ग्रंथ इसे या तो नहीं कहते, या वराह-अवतार को सिर्फ़ धरती को उठाने वाली कथा की तरह कहते हैं, इस होड़ के बिना। यह गाथा दोनों बातें दर्ज करती है, किसी एक को "असली" कहे बिना — ठीक वैसे ही जैसे विष्णु-पुराण का बुद्ध वाला अध्याय करता है।
टिप्पणी: लिंगोद्भव की कथा शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता), लिंग पुराण, स्कंद पुराण और कूर्म पुराण में मिलती है। यह खुले तौर पर एक शैव दावा है — विष्णु और ब्रह्मा दोनों शिव के आगे अपनी सीमा मानते हैं। वैष्णव ग्रंथ वराह-अवतार को इस होड़ के बिना, सिर्फ़ पृथ्वी को जल से उठाने वाली कथा की तरह कहते हैं। महाशिवरात्रि को लिंगोद्भव से जोड़ना ख़ास तौर पर दक्षिण भारत की शैव परंपरा में है; उत्तर की परंपराएँ उसी रात को शिव-विवाह या विष-पान से भी जोड़ती हैं। नीलकंठ की पूरी कथा इस साइट पर विष्णु-पुराण के दूसरे अध्याय (कूर्म) में है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, ज्योति का खंभा