अध्याय ८

कार्तिकेय

जिस पुत्र के लिए कामदेव जला था, उसे न अग्नि सँभाल पाई, न गंगा — छह कृत्तिकाओं ने पाला

तेज, जिसे कोई न सँभाल सका

विवाह के बाद वह पुत्र होना था जिसके लिए इतना कुछ हुआ — कामदेव का जलना, पार्वती का तप।

पर शिव का तेज इतना प्रचंड था कि देवता डर गए: "यह गर्भ पृथ्वी नहीं झेल पाएगी।"

अग्नि को भेजा गया कि वह उस तेज को ग्रहण करे। अग्नि ने लिया — और झुलसने लगे। उन्होंने वह तेज गंगा को दिया। गंगा भी न सँभाल सकीं, और उन्होंने उसे हिमालय के एक सरकंडों के वन में — शरवण में — रख दिया।

छह माँएँ

उस वन में एक बालक प्रकट हुआ।

आकाश की छह कृत्तिकाएँ — जिन्हें आज हम प्लीयडीज़ तारामंडल कहते हैं — उसे दूध पिलाने आईं। बालक ने छहों का दूध एक साथ पीने के लिए छह मुँह बना लिए।

इसीलिए उसका एक नाम पड़ा — कार्तिकेय, कृत्तिकाओं का पाला हुआ। और षण्मुख — छह मुख वाला।

एक देह, छह सिर

पार्वती को ख़बर मिली कि उनका पुत्र एक वन में छह कृत्तिकाओं के पास है, छह मुखों के साथ।

वे दौड़ीं और अपने बालक को गले लगाया — आख़िर अपना पुत्र पाकर।

बालक के कई नाम बने: स्कंद, कुमार, गुह (जो गुफ़ा में छिपा), सुब्रह्मण्य। शिव-पार्वती दोनों के, कृत्तिकाओं के, अग्नि और गंगा के — इस एक बालक के इतने माता-पिता थे कि हर परंपरा उसे अपनी तरह पुकारती है।

कुछ परंपराओं में यह कथा अलग ढंग से कही जाती है — छह अलग-अलग शिशु, जिन्हें पार्वती ने गले लगाकर एक देह में मिला दिया, पर छह सिर बचे रहे। यह गाथा दूध पीने के लिए छह मुख बनाने वाले रूप को आधार बनाती है, क्योंकि वही आगे कृत्तिका-नाम और षण्मुख वाले सवाल-जवाब से सीधा जुड़ता है।

देवताओं का सेनापति

देवता कार्तिकेय के पास आए। "तारकासुर को सिर्फ़ शिव का पुत्र मार सकता है। वह पुत्र तुम हो। हमारी सेना का नेतृत्व करो।"

कार्तिकेय अभी बालक ही थे जब उन्हें देवसेना का सेनापति बनाया गया। इंद्र ने अपनी पुत्री देवसेना का उनसे विवाह कर दिया — "देवसेना" यानी देवताओं की सेना ख़ुद।

तारकासुर का अंत

कार्तिकेय अपने मोर पर सवार होकर, हाथ में शक्ति नाम का भाला लिए, तारकासुर की सेना पर टूट पड़े।

युद्ध लंबा चला। आख़िर में कार्तिकेय ने वह भाला तारकासुर पर फेंका, और असुर का वह वरदान — कि उसे सिर्फ़ शिव का पुत्र मार सकता है — उसी की मौत की शर्त बन गया।

जिस पुत्र के लिए कामदेव जला, पार्वती ने सालों तप किया, और अग्नि-गंगा झुलसीं — उसका पहला काम यही था: एक असुर को मारना जिसे और कोई नहीं मार सकता था।

दक्षिण में एक और नाम

तमिल परंपरा में यही देवता मुरुगन हैं — और वहाँ उनकी कथा बहुत बड़ी है।

वहाँ वे सूरपद्मन नाम के असुर से लड़ते हैं और उसे चीरकर उसके दो टुकड़े कर देते हैं — एक मोर बन जाता है जो उनका वाहन होता है, दूसरा मुर्गा जो उनकी ध्वजा पर बैठता है। वहाँ उनकी दो पत्नियाँ हैं — देवसेना और वल्ली, एक पहाड़ी क़बीले की लड़की। तमिलनाडु में उनके छह मुख्य धाम हैं, जिन्हें "अरुपडै वीडु" कहते हैं।

यह तमिल शैव परंपरा की अपनी धारा है — कंद पुराणम और तिरुमुरुगात्रुप्पडै जैसे ग्रंथों की — और संस्कृत पुराणों की स्कंद-कथा से इसका रिश्ता है, पर यह उसकी नक़ल नहीं।

टिप्पणी: कार्तिकेय की कथा शिव पुराण (रुद्र संहिता, कुमार खंड), महाभारत (वन पर्व और शल्य पर्व), रामायण (बालकांड, जहाँ विश्वामित्र इसे सुनाते हैं) और स्कंद पुराण में है। शिव का तेज अग्नि से गंगा और फिर शरवण तक जाने वाली शृंखला रामायण और शिव पुराण दोनों में है। तमिल परंपरा (कंद पुराणम, तिरुमुरुगात्रुप्पडै) में वे मुरुगन हैं, दो पत्नियों — देवसेना और वल्ली — के साथ, और सूरपद्मन का वध तथा छह अरुपडै वीडु धाम इसी धारा के हैं। यह तमिल शैव परंपरा संस्कृत स्कंद-कथा की सहोदर है, नक़ल नहीं।

स्रोत: कई ग्रंथों से, कार्तिकेय

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

शिव का तेज अग्नि को दिए जाने पर क्या हुआ?

  • अग्नि ने उसे तुरंत पार्वती को लौटा दिया
  • अग्नि उसे सँभाल नहीं पाए, झुलसने लगे, और उन्होंने वह तेज गंगा को दे दिया
  • अग्नि ने उसे सूर्य को सौंप दिया
  • अग्नि ने उसे निगल लिया और वह वहीं शांत हो गया
पूरी कथा पढ़िए — एक तेज, कई हाथ

कथा का पूरा ढाँचा यही है: शिव का तेज इतना प्रचंड कि उसे कोई एक धारण नहीं कर सकता — न देवता, न अग्नि, न गंगा, न पृथ्वी।

हर हस्तांतरण एक नया "माता-पिता" जोड़ता है — इसीलिए कार्तिकेय के इतने नाम और इतनी माँएँ हैं।

यह गाथा की धुरी का एक कोना है: शिव जो देते हैं वह भी उनके स्वभाव जैसा है — व्यवस्था की धारण-क्षमता से बाहर।

किसका बेटा?

कार्तिकेय को "कार्तिकेय" नाम किससे मिला?

  • शिव से, जिन्होंने उन्हें यह नाम दिया
  • कृत्तिका नक्षत्र में जन्म लेने से
  • अग्नि से, जिनका एक नाम कृत्तिक है
  • छह कृत्तिकाओं से, जिन्होंने उन्हें दूध पिलाकर पाला
पूरी कथा पढ़िए — छह माँओं का बेटा

कार्तिकेय के हर नाम के पीछे एक अलग माता-पिता हैं: कार्तिकेय (कृत्तिकाएँ), गांगेय (गंगा), स्कंद और कुमार (शिव-पार्वती), आग्नेय (अग्नि)।

छह मुख भी इसी से हैं — छहों कृत्तिकाओं का दूध एक साथ पीने के लिए।

यह इस देवता की सबसे ख़ास बात है: उसकी पहचान किसी एक माता-पिता से नहीं बनती, कई से एक साथ बनती है।

किसने कहा?

"तारकासुर को सिर्फ़ शिव का पुत्र मार सकता है। वह पुत्र तुम हो। हमारी सेना का नेतृत्व करो।" — यह किसने, किससे कहा?

  • देवताओं ने, कार्तिकेय से
  • शिव ने, कार्तिकेय से
  • इंद्र ने, तारकासुर से
  • पार्वती ने, कार्तिकेय से
पूरी कथा पढ़िए — बालक, जो सेनापति बना

महाभारत (वन पर्व और शल्य पर्व) में स्कंद के देवसेनापति बनने की कथा विस्तार से है — देवता उन्हें बहुत छोटी उम्र में ही सेना सौंप देते हैं।

इंद्र का अपनी पुत्री देवसेना से उनका विवाह करना प्रतीकात्मक है: "देवसेना" यानी देवताओं की सेना, और कार्तिकेय उसके स्वामी।

यानी जिस पुत्र के लिए इतना कुछ हुआ, उसका जन्म ही एक काम के लिए था — और वह काम पहले ही दिन से तय था।

कौन हूँ मैं?

हम आकाश में छह तारे हैं। हमने एक वन में पड़े शिशु को दूध पिलाया, और उसने हम छहों का दूध एक साथ पीने के लिए छह मुँह बना लिए। हम कौन हैं?

  • सप्तर्षि
  • रोहिणी और उसकी बहनें
  • कृत्तिकाएँ (प्लीयडीज़ तारामंडल)
  • अप्सराएँ
पूरी कथा पढ़िए — छह तारे, एक बच्चा

कृत्तिका नक्षत्र (प्लीयडीज़) को नंगी आँखों से देखने पर आमतौर पर छह तारे दिखते हैं — कथा इसी से जुड़ी है।

परंपरा में कृत्तिकाएँ सप्तर्षियों की पत्नियाँ थीं, और उनका शिशु को पालना उन्हें उनके पतियों से अलग करता है — एक अलग कथा जो अरुंधती के तारे से जुड़ी है।

शिशु के छह मुख बनाना इस कथा का सबसे पहचाना जाने वाला चित्र है — षण्मुख, षडानन, आरुमुगम।

तथ्य

कार्तिकेय ने तारकासुर को किस हथियार से मारा?

  • त्रिशूल से, जो शिव ने दिया
  • शक्ति नाम के भाले (वेल) से
  • सुदर्शन चक्र से
  • वज्र से
पूरी कथा पढ़िए — भाला, जो पहचान बना

कार्तिकेय का "शक्ति" भाला उनकी हर मूर्ति में है — तमिल में इसे "वेल" कहते हैं, और मुरुगन के भक्त इसे अलग से पूजते हैं ("वेल मुरुगा")।

परंपरा कहती है कि यह भाला ख़ुद पार्वती ने उन्हें दिया — यानी माँ की शक्ति सीधे बेटे के हाथ में।

तारक-वध में विडंबना पूरी होती है: असुर का वरदान ("सिर्फ़ शिव का पुत्र मारे") ही उसकी मौत की शर्त बन जाता है — ठीक वैसे ही जैसे आगे भस्मासुर का वरदान उसी पर मुड़ेगा।

पहेली

मेरा जन्म एक तेज से हुआ जिसे कोई सँभाल न सका। मेरे इतने माता-पिता हैं कि हर परंपरा मुझे अलग नाम से बुलाती है — स्कंद, कुमार, गुह, मुरुगन। मेरे छह सिर हैं और मेरा वाहन मोर है। मैं कौन हूँ?

  • गणेश
  • कार्तिकेय
  • नंदी
  • वीरभद्र
पूरी कथा पढ़िए — एक देवता, कई नाम

कार्तिकेय शायद हिंदू परंपरा का सबसे "बहु-नाम" देवता है — और हर नाम एक अलग कथा या क्षेत्र से आता है।

उत्तर भारत में उनकी पूजा कभी बहुत बड़ी थी (कुषाण सिक्कों पर उनकी छवि है), पर बाद में घट गई; दक्षिण में, मुरुगन के रूप में, वह आज भी सबसे बड़ी है।

यह गाथा दोनों को एक ही देवता मानती है, पर दर्ज करती है कि उनकी कथाएँ क्षेत्र के साथ बदलती हैं।

किसका बेटा?

इंद्र ने कार्तिकेय का विवाह अपनी किस पुत्री से किया, और उस नाम का क्या अर्थ है?

  • देवसेना से
  • जयंती से
  • शची से
  • उर्वशी से
पूरी कथा पढ़िए — नाम में ही भूमिका

"देवसेना" का विवाह "देवसेनापति" से एक प्रतीक है: कार्तिकेय और देवताओं की सेना एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।

तमिल परंपरा में उनकी एक दूसरी पत्नी भी हैं — वल्ली, एक पहाड़ी क़बीले की लड़की, जिनसे विवाह प्रेम-कथा की तरह होता है, तय-शुदा नहीं। यह जोड़ संस्कृत पुराणों में नहीं, तमिल कंद पुराणम में है।

दो पत्नियों को परंपरा में दो पक्षों का मिलन माना जाता है — देवसेना (आकाश/देवता) और वल्ली (धरती/जन)।

सही क्रम

घटनाओं का सही क्रम कौन-सा है?

  • कृत्तिकाओं का पालना → शिव का तेज → गंगा → तारक-वध
  • तारक-वध → कार्तिकेय का सेनापति बनना → जन्म → कृत्तिकाओं का पालना
  • शिव का प्रचंड तेज → अग्नि का उसे ग्रहण करना और गंगा को देना → गंगा का शरवण में रखना → बालक का प्रकट होना, छह मुख और छह कृत्तिकाओं का पालना → पार्वती का अपने बालक को पाना → देवताओं का सेनापति बनाना और देवसेना से विवाह → तारकासुर का वध
  • शिव का तेज → पार्वती का बालक को पाना → अग्नि → गंगा
पूरी कथा पढ़िए — एक तेज से एक वध तक

इस अध्याय की बनावट एक लंबी शृंखला है: तेज एक हाथ से दूसरे हाथ जाता है, हर हाथ एक नाम जोड़ता है, और आख़िर में वह सब एक सेनापति में इकट्ठा होता है।

बीच का मोड़ पार्वती का अपने बालक को पाना है — वहीं बिखरा हुआ तेज एक पहचाने गए पुत्र में बदल जाता है।

आख़िरी दृश्य — तारक-वध — पाँचवें अध्याय (कामदेव) से शुरू हुई पूरी योजना का अंत है। कामदेव इसी पुत्र के लिए जला था।

ग्रंथ असहमत

कार्तिकेय की कथा किन ग्रंथों में है, और उनका उत्तर-दक्षिण फ़र्क़ क्या है?

  • कथा सिर्फ़ शिव पुराण में है, और हर जगह एक जैसी
  • कथा शिव पुराण, महाभारत (वन/शल्य पर्व), रामायण (बालकांड) और स्कंद पुराण में है; उत्तर में वे स्कंद/कुमार हैं और उनकी पूजा घट गई, दक्षिण में वे मुरुगन हैं और वहाँ उनकी अपनी बड़ी परंपरा है
  • कार्तिकेय सिर्फ़ तमिल परंपरा के देवता हैं, संस्कृत ग्रंथों में नहीं
  • हर ग्रंथ में उनकी सिर्फ़ एक माँ है, पार्वती
पूरी कथा पढ़िए — एक देवता, दो जीवन

उत्तर भारत में स्कंद की पूजा प्राचीन काल में बड़ी थी — गुप्त और कुषाण सिक्कों पर उनकी छवि मिलती है — पर मध्यकाल तक यह बहुत घट गई।

दक्षिण में, मुरुगन के रूप में, उनकी परंपरा कभी नहीं घटी। कंद पुराणम, तिरुमुरुगात्रुप्पडै, और छह अरुपडै वीडु धाम — यह एक पूरी अलग, जीवित धारा है।

शिव-महिमा दोनों को एक देवता मानती है और साफ़ बताती है कि तमिल मुरुगन-परंपरा संस्कृत स्कंद-कथा की नक़ल नहीं, उसकी सहोदर है।

बाद की परंपरा

तमिल परंपरा में मुरुगन के "अरुपडै वीडु" का क्या मतलब है?

  • उनके छह हथियार
  • उनके छह सिरों के छह नाम
  • उनकी छह माँएँ, कृत्तिकाएँ
  • तमिलनाडु में उनके छह मुख्य धाम
पूरी कथा पढ़िए — छह घर, एक देवता

"अरुपडै वीडु" का शाब्दिक अर्थ है "छह युद्ध-शिविर" — हर धाम मुरुगन की सूरपद्मन के ख़िलाफ़ लड़ाई के एक पड़ाव से जोड़ा जाता है।

हर धाम की अपनी कथा है: तिरुचेंदूर समुद्र किनारे, जहाँ सूरपद्मन से युद्ध हुआ; पलनि पहाड़ी पर, जहाँ रूठे मुरुगन तपस्वी बनकर बैठे।

यह परंपरा तमिल कंद पुराणम की है — संस्कृत स्कंद पुराण से जुड़ी, पर उसका सीधा अनुवाद नहीं। यह गाथा इसे तमिल शैव धारा के हिस्से के रूप में दर्ज करती है।