
अध्याय १४
किरात
अर्जुन ने एक सूअर पर बाण चलाया, और उसी पल एक जंगली शिकारी ने भी — फिर दोनों इस बात पर भिड़ गए कि शिकार किसका
पर्वत पर एक तप
वनवास के दिनों में अर्जुन हिमालय पर अकेले गए — दिव्य अस्त्र पाने के लिए।
व्यास और युधिष्ठिर ने कहा था: आगे जो युद्ध आना है, उसके लिए साधारण धनुष काफ़ी नहीं। शिव का पाशुपतास्त्र चाहिए, और वह सिर्फ़ शिव देते हैं।
अर्जुन ने कठोर तप शुरू किया — पहले फल पर, फिर हवा पर, एक पैर पर खड़े होकर, हाथ ऊपर उठाए। पर्वत के ऋषि घबरा गए और शिव के पास पहुँचे: "यह तप इतना प्रचंड है कि पहाड़ काँप रहे हैं।"
एक सूअर, दो बाण
उसी समय मूक नाम का एक दैत्य एक विशाल सूअर का रूप लेकर अर्जुन को मारने आया।
अर्जुन ने गांडीव उठाया और बाण चलाया।
ठीक उसी पल एक और बाण आया — एक जंगली शिकारी का, जो पेड़ों के बीच से निकला था, साथ में एक शिकारी स्त्री और कुछ और शिकारी। यह किरात के वेश में शिव थे, पार्वती किराती के रूप में, और गण शिकारियों के रूप में।
सूअर दो बाण खाकर गिरा और अपने असली दैत्य-रूप में आ गया।
शिकार किसका
"यह मेरा शिकार है," अर्जुन बोले। "मैंने पहले बाण मारा।"
"नहीं," किरात ने कहा। "इस जंगल में हम शिकार करते हैं। यह हमारा है। और तुमने बिना पूछे मेरे शिकार पर बाण चलाया।"
बात बढ़ी। अर्जुन ने किरात पर बाण बरसाने शुरू किए — एक के बाद एक, पूरा तरकश। किरात पर एक ख़रोंच तक नहीं आई।
अर्जुन ने गांडीव को गदा की तरह घुमाया — वह टूट गया। तलवार चलाई — वह किरात के सिर पर लगकर चटक गई। आख़िर में अर्जुन ख़ाली हाथ भिड़े — और किरात ने उन्हें उठाकर ऐसे भींचा कि साँस रुक गई।
मिट्टी का एक लिंग
अर्जुन लगभग बेहोश थे। हारने से पहले उन्होंने वही किया जो वे हमेशा करते थे — शिव की शरण।
उन्होंने मिट्टी का एक छोटा-सा शिवलिंग बनाया और उस पर फूलों की एक माला चढ़ाई।
माला लिंग पर नहीं टिकी — वह किरात के गले में जा पड़ी।
अर्जुन ने ऊपर देखा। सामने जो शिकारी खड़ा था, उसके गले में उन्हीं का चढ़ाया फूल था।
पाशुपतास्त्र
अर्जुन किरात के पैरों में गिर पड़े। "मैंने आप पर हाथ उठाया। मुझे पता नहीं था।"
किरात का वेश गिरा। शिव खड़े थे, पार्वती साथ।
"पता होता तो परीक्षा कैसी," शिव बोले। "तुम हारते-हारते भी लड़े, और लड़ते-लड़ते भी मेरी शरण में आए। यही मैं देखना चाहता था।"
उन्होंने अर्जुन को पाशुपतास्त्र दिया — एक चेतावनी के साथ: "यह किसी छोटे शत्रु पर, किसी मनुष्य पर मत चलाना। यह पूरी सृष्टि जला सकता है। सिर्फ़ तब, जब और कोई रास्ता न बचे।"
फिर इंद्र, यम, वरुण और कुबेर भी आए, हर एक अपना अस्त्र लेकर।
जिस देवता ने रावण को एक गीत सुनकर तलवार दे दी थी, उसी ने अर्जुन से हर अस्त्र लड़ाई में मनवाया — क्योंकि सामने जो था, वह अलग था।
टिप्पणी: किरात-अर्जुन की कथा महाभारत के वन पर्व (कैरात पर्व, अध्याय लगभग ३८–४१) की है। भारवि का "किरातार्जुनीय" (लगभग छठी सदी) इसी एक प्रसंग पर लिखा संस्कृत महाकाव्य है — काव्य, धर्मग्रंथ नहीं। "किरात" शिव के छिपे-वेश वाले रूपों में है, जैसे दारुक वन का भिखारी और पार्वती-परीक्षा का ब्रह्मचारी। पाशुपतास्त्र की चेतावनी — इसे मनुष्य या छोटे शत्रु पर न चलाना — महाभारत में साफ़ है, और अर्जुन कुरुक्षेत्र में इसका पालन करते हैं। केरल में "किरातम्" कथकली और कुडियाट्टम का प्रसिद्ध नाटक है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, किरात