अध्याय ११

मार्कण्डेय

एक बालक की उम्र सोलह बरस लिखी थी — और सोलहवें बरस उसने शिवलिंग को कसकर पकड़ लिया

एक चुनाव, माता-पिता के सामने

ऋषि मृकंडु और उनकी पत्नी मरुद्मती के कोई संतान नहीं थी। दोनों ने शिव के लिए लंबा तप किया।

शिव प्रकट हुए और एक अजीब चुनाव सामने रखा:

"तुम्हें दो में से एक मिल सकता है। एक मंदबुद्धि पुत्र, जो लंबी उम्र जिएगा। या एक तेजस्वी, गुणी, भक्त पुत्र — जो ठीक सोलह बरस का होकर मर जाएगा। चुन लो।"

मृकंडु और मरुद्मती ने दूसरा चुना।

बालक, जिसे पता नहीं था

पुत्र जन्मा — मार्कण्डेय। तेज़ बुद्धि, कोमल स्वभाव, और बचपन से शिव का भक्त।

माता-पिता ने उसे यह कभी नहीं बताया कि उसकी उम्र कितनी लिखी है। पर जैसे-जैसे सोलहवाँ बरस पास आया, घर में एक चुप्पी छाने लगी। माँ रोतीं, पिता दूर देखते रहते।

आख़िर मार्कण्डेय ने पूछा, और उन्होंने बता दिया।

मार्कण्डेय रोया नहीं। "तो मेरे पास जितना समय है, मैं उसी के पास रहूँगा जिसने यह समय दिया।" वह शिवलिंग के पास गया।

यम की डोर

सोलहवाँ बरस पूरा हुआ। यम के दूत मार्कण्डेय को लेने आए — पर वह शिवलिंग से लिपटा था, आँखें मूँदे, और दूत पास तक नहीं जा सके।

तब यम ख़ुद आए, भैंसे पर सवार, हाथ में पाश।

"तेरा समय पूरा हुआ," यम ने कहा, और अपनी डोर फेंकी।

डोर मार्कण्डेय के गले में पड़ी — और उसके साथ उस शिवलिंग को भी लपेट गई जिससे बालक लिपटा था।

लिंग से शिव

लिंग फट पड़ा।

उसमें से शिव निकले — क्रोध में, वही रूप जिसे परंपरा "कालांतक" कहती है, काल का अंत करने वाला।

"तूने मेरे भक्त पर डोर डाली," शिव बोले, "और मुझ पर।" उन्होंने यम को एक ठोकर मारी — कुछ ग्रंथ कहते हैं त्रिशूल से प्रहार किया — और यम वहीं गिरकर निष्प्राण हो गए।

मृत्यु ख़ुद मर गई। और उसके साथ संसार में मरना रुक गया — कोई बूढ़ा नहीं हो रहा था, कोई जा नहीं रहा था, चक्र जाम हो गया।

देवताओं की विनती

देवता शिव के पास आए। "यम के बिना संसार का बोझ नहीं उठेगा। जो जन्मता है उसे जाना भी है — वरना धरती भर जाएगी। यम को लौटा दीजिए।"

शिव ने यम को जीवित किया, एक शर्त पर: "यह ठीक है। पर मार्कण्डेय को यह कभी नहीं छुएगा। वह सोलह का सोलह ही रहेगा, हमेशा।"

मार्कण्डेय चिरंजीवी हो गए — उन आठ में से एक जो हर युग में जीवित रहते हैं। आगे वे प्रलय भी देखेंगे, और उस प्रलय के जल पर बरगद के पत्ते पर लेटे एक शिशु को भी।

टिप्पणी: मार्कण्डेय की यम-वध कथा शिव पुराण, लिंग पुराण और स्कंद पुराण में है। "कालांतक" या "कालारि" शिव का वह रूप है जो शिवलिंग से निकलकर यम को दबाता है — तमिलनाडु के तिरुक्कडवूर मंदिर की मुख्य मूर्ति यही है। महाभारत के वन पर्व में मार्कण्डेय चिरंजीवी ऋषि हैं जो युधिष्ठिर को प्रलय और बरगद-पत्र वाले शिशु का दर्शन सुनाते हैं। "मार्कण्डेय पुराण" उन्हीं के नाम पर है पर वह मुख्यतः देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) का ग्रंथ है — यम-वध की कथा उसका केंद्र नहीं। महामृत्युंजय मंत्र वैदिक है; उसे मार्कण्डेय से जोड़ना परंपरा है।

स्रोत: कई ग्रंथों से, मार्कण्डेय

अब बताइए — कितना याद रहा?

किसका बेटा?

मार्कण्डेय किसके पुत्र थे, और उनके माता-पिता को शिव ने क्या चुनाव दिया?

  • ऋषि मृकंडु और मरुद्मती के
  • राजा दशरथ के
  • ऋषि व्यास के
  • ऋषि अत्रि और अनसूया के
पूरी कथा पढ़िए — चुनाव, जो माता-पिता का था

कथा का पूरा भार इस एक फ़ैसले पर है: मृकंडु और मरुद्मती ने जानते-बूझते सोलह बरस वाला बेटा चुना।

यह त्याग नहीं था, एक दाँव था — कि सोलह बरस का एक भक्त पुत्र शायद अपनी उम्र से बड़ा कुछ कर जाए। और वही हुआ।

शिव ने चुनाव दिया, पर नतीजा नहीं बदला — मार्कण्डेय की उम्र सचमुच सोलह ही लिखी रही, जब तक यम की डोर ख़ुद शिव तक न पहुँची।

किसने कहा?

"तो मेरे पास जितना समय है, मैं उसी के पास रहूँगा जिसने यह समय दिया।" — यह किसने, कब कहा?

  • मृकंडु ने, शिव से, तप के समय
  • यम ने, अपने दूतों से
  • मार्कण्डेय ने, जब उन्हें पता चला कि उनकी उम्र सोलह बरस है
  • शिव ने, मार्कण्डेय से
पूरी कथा पढ़िए — डर की जगह चुनाव

मार्कण्डेय की प्रतिक्रिया इस कथा का दिल है — उन्हें अपनी मौत की तारीख़ पता चलती है, और वे रोने या भागने के बजाय शिव के पास जाकर बैठ जाते हैं।

यह गाथा की धुरी का भक्त की तरफ़ का चेहरा है: शिव माँगनेवाले को तौलते नहीं, तो मार्कण्डेय भी हिसाब नहीं लगाते — वे बस उसी के पास रहते हैं।

इसी भरोसे की वजह से आगे शिव को लिंग से बाहर आना पड़ता है। भक्त ने पकड़ नहीं छोड़ी, तो देवता को आना पड़ा।

क्या हुआ?

यम ने अपनी डोर फेंकी, तो वह किस-किस पर पड़ी?

  • मार्कण्डेय पर, और उनके साथ उस शिवलिंग पर भी जिससे वे लिपटे थे
  • सिर्फ़ मार्कण्डेय पर, और शिव ने बाद में देखा
  • सिर्फ़ शिवलिंग पर
  • यम के अपने ही ऊपर, ग़लती से
पूरी कथा पढ़िए — एक डोर, दो निशाने

कथा का मोड़ यही है: यम की डोर सिर्फ़ मार्कण्डेय पर पड़ती तो शायद बात अलग होती — पर वह शिवलिंग को भी लपेट गई।

शिव के लिए यह दोहरा अपमान था: उनके भक्त पर हाथ, और ख़ुद उन पर। इसीलिए क्रोध इतना तीखा।

यम की कोई ग़लती नहीं थी — वे अपना काम कर रहे थे, और मार्कण्डेय ने ख़ुद को लिंग से इतना चिपका लिया था कि दोनों एक हो गए।

तथ्य

लिंग से निकलकर यम को हराने वाले शिव के इस रूप को परंपरा क्या कहती है?

  • नटराज
  • त्रिपुरांतक
  • कालांतक (या कालारि)
  • दक्षिणामूर्ति
पूरी कथा पढ़िए — काल का अंत करने वाला

"कालांतक" शिव का वह रूप है जिसमें वे शिवलिंग से एक पैर बाहर निकाले, यम को नीचे दबाते हुए दिखते हैं — तमिलनाडु के तिरुक्कडवूर मंदिर में यही मुख्य मूर्ति है।

नाम में एक शब्द-खेल है: "काल" का मतलब समय भी है और मृत्यु भी। शिव दोनों के ऊपर हैं — इसीलिए उन्हें "महाकाल" भी कहते हैं।

यह रूप गाथा की धुरी का सबसे बड़ा दावा है: शिव व्यवस्था के बाहर हैं, यहाँ तक कि मृत्यु की व्यवस्था के भी — और भक्त के लिए वे उस व्यवस्था को रोक सकते हैं।

ऐसा क्यों?

शिव ने यम को फिर जीवित क्यों किया?

  • क्योंकि यम ने माफ़ी माँग ली
  • क्योंकि देवताओं ने समझाया कि यम के बिना संसार का चक्र नहीं चलेगा
  • क्योंकि पार्वती ने ज़िद की
  • क्योंकि ब्रह्मा ने यम को दोबारा बनाने की धमकी दी
पूरी कथा पढ़िए — व्यवस्था, जिसे रोका नहीं जा सकता

यह कथा का ज़रूरी संतुलन है: शिव भक्त के लिए मृत्यु रोक तो सकते हैं, पर मृत्यु को हमेशा के लिए हटा नहीं सकते — वरना धरती भर जाएगी।

इसीलिए हल एक अपवाद है, नियम का ख़ात्मा नहीं: यम लौटते हैं, पर मार्कण्डेय उनके दायरे से बाहर हो जाते हैं।

यह दक्ष-यज्ञ जैसा ही ढंग है — शिव व्यवस्था तोड़ते हैं, फिर देवताओं की विनती पर उसे लौटाते हैं, पर अपनी एक शर्त के साथ।

कौन हूँ मैं?

मेरी उम्र सोलह बरस लिखी थी। सोलहवें बरस मैंने मृत्यु के देवता को अपने सामने देखा, पर मैंने पकड़ नहीं छोड़ी। आज मैं उन गिने-चुने लोगों में हूँ जो हर युग में जीवित रहते हैं — और हमेशा सोलह का। मैं कौन हूँ?

  • मार्कण्डेय
  • ध्रुव
  • नचिकेता
  • प्रह्लाद
पूरी कथा पढ़िए — हमेशा सोलह का

चिरंजीवियों की परंपरागत सूची में सात या आठ नाम हैं — अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम, और मार्कण्डेय।

मार्कण्डेय इनमें अकेले हैं जिनकी अमरता एक टली हुई मृत्यु से आई — बाक़ी को वरदान या शाप से मिली।

"हमेशा सोलह" होना कथा का सबसे सुंदर हिस्सा है: जिस उम्र में उन्हें मरना था, उसी उम्र में वे रुक गए।

बाद की परंपरा

"महामृत्युंजय मंत्र" और मार्कण्डेय का क्या रिश्ता परंपरा बताती है?

  • कोई रिश्ता नहीं; यह मंत्र वेदों से सीधे आता है और किसी कथा से नहीं जुड़ा
  • यह मंत्र यम ने मार्कण्डेय को दिया था
  • परंपरा कहती है कि मार्कण्डेय ने सोलहवें बरस यही मंत्र जपते हुए शिवलिंग की आराधना की, इसलिए इसे "मृत्यु को जीतने वाला" मंत्र माना जाता है
  • यह मंत्र मार्कण्डेय पुराण का पहला श्लोक है
पूरी कथा पढ़िए — मंत्र, जो कथा से जुड़ गया

महामृत्युंजय मंत्र ("त्र्यम्बकं यजामहे…") ऋग्वेद और यजुर्वेद में है — यह कथा से पुराना है।

पर परंपरा ने इसे मार्कण्डेय की कथा से बाँध दिया: यही वह जाप है जिससे एक सोलह बरस के बालक ने मृत्यु को टाल दिया।

इसीलिए यह मंत्र आज बीमारी, संकट और लंबी उम्र की कामना में जपा जाता है — कथा ने उसे एक इस्तेमाल दे दिया।

पहेली

मैं मृत्यु का देवता हूँ। मैंने अपना काम किया — एक बालक को लेने गया जिसकी उम्र पूरी हो चुकी थी। इसी काम में मैं ख़ुद मारा गया, और फिर एक शर्त पर लौटाया गया। वह शर्त क्या थी?

  • कि मैं आगे से किसी ऋषि-पुत्र को नहीं छूऊँगा
  • कि मैं भैंसे की जगह किसी और वाहन पर चलूँगा
  • कि मैं हर मौत से पहले शिव से पूछूँगा
  • कि मार्कण्डेय को मैं कभी नहीं छूऊँगा
पूरी कथा पढ़िए — एक अपवाद, बाक़ी सब यथावत

यम की वापसी की शर्त बहुत सीमित है: पूरी मृत्यु-व्यवस्था चलती रहेगी, सिर्फ़ एक नाम उससे बाहर।

यह गाथा का तरीक़ा है — शिव नियम नहीं तोड़ते, नियम में एक छेद कर देते हैं, एक भक्त के आकार का।

यम इस कथा में खलनायक नहीं। वे अपना कर्तव्य निभा रहे थे, और कथा उन्हें दंड देकर नहीं, एक अपवाद मानकर छोड़ती है।

क्या हुआ?

चिरंजीवी होने के बाद मार्कण्डेय ने आगे क्या देखा, जो कई ग्रंथों में आता है?

  • प्रलय
  • कलियुग का अंत और कल्कि का आना
  • देवासुर संग्राम
  • राम का राज्याभिषेक
पूरी कथा पढ़िए — एक बालक, प्रलय के जल पर

महाभारत के वन पर्व में मार्कण्डेय ख़ुद युधिष्ठिर को यह दर्शन सुनाते हैं — वे प्रलय में अकेले भटकते हैं और एक बरगद के पत्ते पर एक शिशु को लेटा पाते हैं, जो उन्हें अपने भीतर खींच लेता है और पूरा ब्रह्मांड दिखाता है।

वह शिशु विष्णु/नारायण हैं — यानी शिव की कृपा से बचा भक्त आगे विष्णु का सबसे बड़ा दर्शन पाता है। गाथा इसे एक विरोध नहीं, एक पूरा चक्र मानती है।

इसीलिए मार्कण्डेय की कथा शैव भी है और वैष्णव भी — शुरू शिव से, आगे विष्णु तक।

ग्रंथ असहमत

मार्कण्डेय की यम-वाली कथा किन ग्रंथों में है, और "मार्कण्डेय पुराण" में इसकी क्या जगह है?

  • यह कथा मुख्य रूप से मार्कण्डेय पुराण में है, जो उन्हीं के नाम पर है
  • यह कथा सिर्फ़ महाभारत में है
  • यह कथा शिव पुराण, लिंग पुराण और स्कंद पुराण में है; महाभारत के वन पर्व में मार्कण्डेय चिरंजीवी ऋषि के रूप में हैं; "मार्कण्डेय पुराण" उन्हीं के नाम पर है पर वह मुख्यतः देवी माहात्म्य का ग्रंथ है, यम-वध की कथा उसका केंद्र नहीं
  • यह कथा वेदों में है
पूरी कथा पढ़िए — नाम एक जगह, कथा दूसरी जगह

यह एक दिलचस्प उलझन है: सबसे मशहूर मार्कण्डेय-कथा (यम-वध) उस पुराण में नहीं है जो उनके नाम पर है।

"मार्कण्डेय पुराण" असल में इसलिए जाना जाता है कि उसमें "देवी माहात्म्य" (दुर्गा सप्तशती) है — महिषासुर-मर्दिनी की कथा।

यम-वध वाली कथा शैव पुराणों की है, और चिरंजीवी मार्कण्डेय महाभारत के हैं। शिव-महिमा इन्हें जोड़कर एक कथा बनाती है, पर बताती है कि हिस्से कहाँ-कहाँ से हैं।