
अध्याय १२
नटराज
एक जंगल के अहंकारी ऋषियों ने शिव पर बाघ, साँप और एक बौना छोड़ा — शिव ने तीनों को पहनकर नाच शुरू कर दिया
दारुक वन के ऋषि
दारुक वन में ऋषियों का एक समूह रहता था जो सिर्फ़ कर्मकांड में विश्वास करता था — मंत्र, यज्ञ, विधि। उन्हें लगता था कि सही क्रिया के आगे किसी देवता की ज़रूरत नहीं।
शिव उनके पास एक नंगे भिखारी के वेश में गए — भस्म लगाए, भीख माँगते हुए। ऋषियों की पत्नियाँ उस भिखारी की ओर खिंचने लगीं, और ऋषियों का घमंड चोट खा गया।
"यह कोई साधारण भिखारी नहीं," उन्होंने कहा। "इसे सबक़ सिखाओ।"
बाघ, साँप, बौना
ऋषियों ने अपने कर्मकांड की शक्ति से एक हवन-कुंड जलाया और उसमें से हथियार निकाले।
पहले एक बाघ निकला और शिव पर झपटा। शिव ने उसे नाख़ून से चीरा और उसकी खाल उतारकर कमर में लपेट ली।
फिर एक विशाल साँप निकला। शिव ने उसे उठाकर गले में डाल लिया — एक और गहना।
फिर एक बौना दैत्य निकला — अपस्मार, जिसका मतलब है भूलना, अज्ञान। वह शिव के पैरों की ओर लपका।
शिव ने एक पैर उसकी पीठ पर रखा — और उसी पर खड़े होकर नाचना शुरू कर दिया।
पाँच काम, एक नाच
वह नाच कोई प्रदर्शन नहीं था। परंपरा कहती है कि उसमें पूरी सृष्टि के पाँच काम एक साथ चल रहे थे:
डमरू — जिससे सृष्टि का पहला स्पंदन निकलता है। ऊपर उठा हुआ हाथ (अभय मुद्रा) — जो कहता है, डरो मत, यह टिका रहेगा। दूसरे हाथ में आग — जो एक दिन सब समेट लेगी। अपस्मार पर रखा पैर — जो अज्ञान को दबाता है। और ऊपर उठा हुआ पैर — जो मुक्ति की ओर इशारा है, शरण।
रचना, पालन, संहार, आवरण, कृपा — पाँचों एक ही देह में, एक ही लय में।
चारों ओर आग का एक घेरा था — वह ब्रह्मांड जो इस नाच के भीतर घूम रहा था।
ऋषियों का सिर झुका
दारुक वन के ऋषि यह देखते रह गए।
उनका सारा कर्मकांड — बाघ, साँप, बौना — शिव के शरीर पर गहने बनकर बैठ गया था। जिस चीज़ को वे हथियार समझकर चला रहे थे, वही शिव की पहचान का हिस्सा बन गई।
उन्होंने समझ लिया: सही क्रिया एक चीज़ है, पर उसके पीछे कुछ और भी है जिसे वे नकार रहे थे। ऋषि झुक गए।
काली के साथ नाच की होड़
एक और कथा तिल्लै (चिदंबरम) के पास की है।
वहाँ काली का एक उग्र रूप उस भूमि पर राज करता था। शिव ने उनसे नाच की होड़ रखी — जो हार जाए, वह भूमि छोड़ दे।
दोनों नाचते रहे, बराबरी पर। फिर शिव ने एक मुद्रा की — ऊर्ध्व-तांडव, जिसमें एक पैर सीधा ऊपर, सिर से भी ऊँचा उठ जाता है।
काली ने वह मुद्रा नहीं दोहराई — कुछ रूप कहते हैं मर्यादावश, कुछ कहते हैं वह भूमि की देवी थीं और यह उनका अपना स्थान था जो उन्होंने सम्मान में छोड़ा। होड़ शिव ने जीती, और तिल्लै "आनंद तांडव" की भूमि बनी।
जो चिदंबरम में ठहरा
चिदंबरम के मंदिर में शिव की कोई सामान्य मूर्ति नहीं — वहाँ मुख्य रूप नटराज का है, और गर्भगृह के एक हिस्से में कुछ भी नहीं, सिर्फ़ ख़ाली जगह ("चिदंबरम रहस्य") — यानी वह जो दिखता नहीं।
पतंजलि (साँप-रूप में) और व्याघ्रपाद (बाघ के पैरों वाले ऋषि) इस नाच के साक्षी माने जाते हैं। और नटराज की वह कांस्य-मूर्ति जो आज पूरी दुनिया पहचानती है — आग का घेरा, उठा हुआ पैर, अपस्मार — वह चोल काल (दसवीं-बारहवीं सदी) में अपने पक्के रूप में आई।
टिप्पणी: दारुक वन (या तारागम वन) के ऋषियों की कथा शिव पुराण, लिंग पुराण और कूर्म पुराण में है; बाघ की खाल, साँप और अपस्मार तीनों की जड़ यहीं है। तिल्लै/चिदंबरम में काली के साथ नृत्य-होड़ और आनंद तांडव की कथा तमिल स्थल-पुराणों (चिदंबर माहात्म्य, कोयिल पुराणम) तथा तिरुमूलर के तिरुमंतिरम की है। "पाँच काम" वाली व्याख्या आगम-ग्रंथों और तमिल शैव परंपरा की है; उसका वैश्विक प्रचार आनंद कुमारस्वामी के 1918 के निबंध से हुआ। नटराज का पक्का कांस्य-रूप चोल काल (लगभग १०वीं–१२वीं सदी) का है। प्रलय-कालीन तांडव और शक्ति पीठ वाला शोक-नाच (अध्याय ४) इस आनंद तांडव से अलग हैं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, नटराज