अध्याय ६

पार्वती की तपस्या

कामदेव नाकाम रहा, तो पर्वत की बेटी ने गहने उतारे और ख़ुद उस चोटी पर तप करने चली गई

गहने उतार दिए

कामदेव के जलने के बाद देवता हार मान चुके थे। पार्वती ने नहीं।

"शिव को इच्छा से नहीं जगाया जा सकता," उन्होंने कहा। "तो मैं उन्हीं की तरह करूँगी। तप से।"

उन्होंने गहने उतार दिए, रेशम की जगह वल्कल पहना, महल छोड़ा, और उसी पर्वत की एक चोटी पर जा बैठीं जहाँ आगे "गौरी-शिखर" नाम पड़ा।

हर मौसम में

गर्मियों में पार्वती ने अपने चारों ओर आग जलाई और बीच में बैठीं — ऊपर सूरज, चारों तरफ़ अंगारे। बरसात में खुले में, बिना छत। जाड़ों में गले तक पानी में खड़ी रहीं, बर्फ़ के बीच।

पहले उन्होंने अन्न छोड़ा, फिर फल, फिर पत्ते। आख़िर में गिरे हुए सूखे पत्ते भी नहीं। इसी से उनका एक नाम पड़ा — अपर्णा, जिसने पत्ता तक नहीं खाया।

उनकी माँ मैना दूर से देखतीं और रोतीं: "उ मा" — "अरे, मत कर।" परंपरा कहती है कि पार्वती का एक और नाम, उमा, यहीं से आया।

सात ऋषि, एक परीक्षा

शिव ने सप्तर्षियों को भेजा — पार्वती को परखने।

ऋषि उनके पास आए और शिव की बुराई करने लगे: "वह राख पोतता है, साँप पहनता है, उसका न घर है न कुल। वह श्मशान में भूत-प्रेतों के साथ रहता है। तुम राजकुमारी हो — हम तुम्हारा रिश्ता विष्णु से करा देते हैं। वैकुंठ, लक्ष्मी, सोने का महल।"

पार्वती की आँखें तन गईं। "जो तुमने कहा, वह शिव की कमी नहीं, उनका चुनाव है। मैंने भी चुन लिया है। अगर इस जन्म में नहीं, तो अगले जन्म में — पर शिव।"

ऋषि मुस्कुराकर लौट गए। परीक्षा का पहला हिस्सा पार्वती पार कर चुकी थीं।

वह ब्रह्मचारी, जो ख़ुद के ख़िलाफ़ बोला

फिर एक युवा ब्रह्मचारी आया — दुबला, तेजस्वी, अकेला।

उसने भी शिव के ख़िलाफ़ बोलना शुरू किया, और ऋषियों से भी तीखा: "तुम इतना तप उस भिखारी के लिए कर रही हो? उसके गले में मुंडों की माला है। बारात में उसके साथ भूत आएँगे। तुम्हारी माँ यह देखकर गिर पड़ेगी।"

पार्वती ने मुँह फेर लिया और जाने के लिए उठीं। "जो शिव की निंदा सुनता भी है, वह भी दोषी है। और जो कहता है, उससे बात करना पाप।"

तभी ब्रह्मचारी का रूप बदला। सामने शिव खड़े थे।

"तप पूरा हुआ," उन्होंने कहा। "तुमने मुझे तीनों तरह से चुना — ऋषियों के सामने, मेरे सामने, और मेरी निंदा के सामने। अब मैं तुम्हारे पिता के पास दूत भेजूँगा।"

बारात, जिसे देखकर माँ गिर पड़ी

विवाह तय हुआ। सप्तर्षि हिमवान के पास विधिवत रिश्ता लेकर गए।

फिर बारात आई। आगे-आगे शिव — जटा खुली, बदन पर राख, गले में साँप, और पीछे उनके गण: कोई बिना सिर का, कोई तीन टाँगों वाला, भूत, पिशाच, डमरू और नरमुंड।

मैना छत से यह जुलूस देखने चढ़ीं और बेहोश होकर गिर पड़ीं।

तब शिव ने रूप बदला — गहनों से लदा, चंद्रमा माथे पर, ऐसा वर जैसा किसी ने देखा न हो। मैना को होश आया, और विवाह हुआ। ब्रह्मा ने पुरोहित का काम किया, विष्णु ने भाई का, और अग्नि के सामने सात फेरे पड़े।

पर्वत की बेटी ने वह पा लिया जो कामदेव के बाण नहीं दिला सके — तप से।

टिप्पणी: पार्वती के तप और विवाह की कथा शिव पुराण (रुद्र संहिता, पार्वती खंड), स्कंद पुराण और कालिका पुराण में है; इसका सबसे विस्तृत साहित्यिक रूप कालिदास के "कुमारसंभव" का है (ब्रह्मचारी बने शिव वाली बहस पाँचवें सर्ग में)। "अपर्णा" और "उमा" नामों की व्याख्याएँ परंपरागत हैं। रामायण के बालकांड में यह कथा संक्षेप में है। हरतालिका तीज को इसी तप से जोड़ने की परंपरा उत्तर भारत और नेपाल में है।

स्रोत: कई ग्रंथों से, पार्वती की तपस्या

अब बताइए — कितना याद रहा?

ऐसा क्यों?

कामदेव के जलने के बाद पार्वती ने शिव को पाने के लिए कौन-सा रास्ता चुना?

  • देवताओं से दोबारा कामदेव को भेजने को कहा
  • अपनी सुंदरता और गहनों से शिव को लुभाने की कोशिश की
  • गहने उतारकर, महल छोड़कर, ख़ुद शिव की तरह कठोर तप करने चली गईं
  • हिमवान से कहकर शिव पर दबाव डलवाया
पूरी कथा पढ़िए — शिव को उन्हीं की भाषा में

पार्वती की समझ सीधी थी: शिव एक तपस्वी हैं, और तपस्वी को इच्छा से नहीं, तप से ही जीता जा सकता है।

इसीलिए यह अध्याय पिछले अध्याय का उल्टा है — वहाँ कामदेव सुंदरता और बहार का इंतज़ाम कर रहे थे; यहाँ पार्वती वह सब छोड़ रही हैं।

यह गाथा की धुरी का एक और कोण है: शिव व्यवस्था के बाहर हैं, तो उन तक पहुँचने के लिए भी व्यवस्था के बाहर जाना पड़ता है।

तथ्य

पार्वती का नाम "अपर्णा" कैसे पड़ा?

  • क्योंकि तप के आख़िर में उन्होंने गिरे हुए सूखे पत्ते तक खाना छोड़ दिया
  • क्योंकि वे एक पर्ण-कुटी (पत्तों की झोपड़ी) में रहती थीं
  • क्योंकि उन्होंने पर्वत पर पत्थर के बिस्तर पर तप किया
  • क्योंकि उनके पिता का नाम पर्ण था
पूरी कथा पढ़िए — खाना छोड़ते-छोड़ते एक नाम

शिव पुराण और कुमारसंभव दोनों में पार्वती का तप चरणों में गहरा होता है: पहले अन्न, फिर फल, फिर हरे पत्ते, और आख़िर में गिरे हुए सूखे पत्ते भी नहीं।

"अपर्णा" उसी आख़िरी चरण का नाम है — और यह पार्वती के कई नामों में सबसे कठोर है।

परंपरा उनके एक और नाम "उमा" को माँ मैना के "उ मा" (अरे, मत कर) से जोड़ती है — यानी पार्वती के नाम ख़ुद इस तप की कहानी कहते हैं।

किसने कहा?

"जो तुमने कहा, वह शिव की कमी नहीं, उनका चुनाव है। मैंने भी चुन लिया है।" — यह किसने, किससे कहा?

  • शिव ने, सप्तर्षियों से
  • मैना ने, पार्वती से
  • हिमवान ने, ऋषियों से
  • पार्वती ने, सप्तर्षियों से
पूरी कथा पढ़िए — निंदा के सामने चुनाव

सप्तर्षि परीक्षा का पहला हिस्सा थे: उन्होंने शिव की हर "कमी" गिनाई — राख, साँप, बेघर होना, कुल का पता न होना — और बदले में विष्णु का रिश्ता पेश किया।

पार्वती का जवाब इन "कमियों" को नकारता नहीं — वह उन्हें शिव का चुनाव बताता है। यही फ़र्क़ इस अध्याय का दिल है।

ऋषि मुस्कुराकर लौटते हैं, क्योंकि यही सुनने वे आए थे। परीक्षा का असली, कठिन हिस्सा अभी बाक़ी था — ख़ुद शिव।

कौन हूँ मैं?

मैं एक युवा ब्रह्मचारी के वेश में आया और उस स्त्री के सामने ख़ुद की ही निंदा करने लगा जो मेरे लिए तप कर रही थी। जब वह गुस्से में उठकर जाने लगी, तब मैंने अपना असली रूप दिखाया। मैं कौन हूँ?

  • नारद
  • शिव
  • ब्रह्मा
  • कोई सप्तर्षि, दोबारा
पूरी कथा पढ़िए — ख़ुद के ख़िलाफ़ बहस

यह दृश्य कालिदास के "कुमारसंभव" के पाँचवें सर्ग का सबसे मशहूर हिस्सा है — शिव ब्रह्मचारी बनकर आते हैं और अपने ही ख़िलाफ़ इतनी अच्छी दलील देते हैं कि पार्वती तड़प उठती हैं।

पार्वती की हद तब आती है जब वे कहती हैं कि शिव की निंदा सुनना भी पाप है — और मुँह फेरकर चल देती हैं। तभी वेश गिरता है।

यानी शिव ने पार्वती को तीन तरह से परखा: दूसरों के मुँह से निंदा (ऋषि), अजनबी के मुँह से निंदा (ब्रह्मचारी), और यह देखना कि वे निंदा सहती हैं या नहीं। तीनों में पार्वती खरी उतरीं।

क्या हुआ?

शिव की बारात कैलास से हिमवान के घर पहुँची, तो सबसे पहले क्या हुआ?

  • हिमवान ने बारात लौटा दी
  • शिव ने सीधे सुंदर रूप में प्रवेश किया
  • मैना बारात का जुलूस
  • विवाह तुरंत, बिना किसी अड़चन के हो गया
पूरी कथा पढ़िए — बारात, जो डरावनी थी

शिव पुराण में बारात का वर्णन जान-बूझकर भयावह है: गण हर आकार के, कोई बिना सिर, कोई कई टाँगों वाला, साथ में भूत और डमरू।

मैना का बेहोश होना कोई मज़ाक़ नहीं — यह उस टकराव का दृश्य है जो पूरी गाथा में है: व्यवस्था के भीतर का घर, और व्यवस्था के बाहर का वर।

शिव का फिर सुंदर रूप लेना एक रियायत है, दिखावा नहीं — वे ससुराल के लिए अपना रूप बदल लेते हैं, पर अपना स्वभाव नहीं।

किसका बेटा?

पार्वती किसकी बेटी हैं?

  • पर्वतराज हिमवान और मैना की
  • प्रजापति दक्ष की, इसी जन्म में
  • समुद्र की, लक्ष्मी की तरह
  • गंगा और हिमवान की
पूरी कथा पढ़िए — पर्वत की बेटी, दूसरी बार

सती ने दक्ष के यज्ञ में देह त्यागते हुए यही चाहा था: अगला जन्म ऐसे घर में जहाँ शिव का अपमान न हो। हिमालय — शिव के निवास कैलास का पड़ोसी — से बेहतर घर कोई नहीं।

परंपरा में गंगा हिमवान की बड़ी बेटी हैं और पार्वती छोटी — यानी दोनों बहनें, और दोनों आगे शिव से जुड़ती हैं: एक जीवनसंगिनी, एक जटा में।

पार्वती के नाम — पार्वती, गिरिजा, हैमवती — सब इसी एक बात से बने हैं: वे पहाड़ की बेटी हैं, और पहाड़ शिव का घर है।

पहेली

मैं तीन बार परखी गई — एक बार सात ऋषियों ने, एक बार एक अजनबी ने, और हर बार मुझसे मेरे चुने हुए की निंदा सुनवाई गई। मैंने गहने उतारकर, पत्ते तक खाना छोड़कर यह हक़ कमाया। मैं कौन हूँ?

  • सती, दक्ष के यज्ञ से पहले
  • सीता, अशोक वाटिका में
  • रति, कामदेव के लिए
  • पार्वती, शिव के लिए किए तप में
पूरी कथा पढ़िए — तप, फिर परीक्षा

पार्वती की कथा में तप और परीक्षा दो अलग चरण हैं: पहले सालों का कठोर तप, फिर उसके बाद शिव की भेजी हुई परीक्षाएँ।

हर परीक्षा एक ही चीज़ जाँचती है: क्या पार्वती शिव को उनके रूप के बावजूद चाहती हैं, या उनके किसी और रूप की उम्मीद में हैं।

पार्वती का जवाब हर बार एक ही है — शिव जैसे हैं वैसे ही चुने गए हैं। इसी पर विवाह टिकता है।

सही क्रम

घटनाओं का सही क्रम कौन-सा है?

  • सप्तर्षियों की परीक्षा → पार्वती का तप → ब्रह्मचारी वाली परीक्षा → विवाह
  • कामदेव का जलना → पार्वती का गहने उतारकर गौरी-शिखर पर तप → सप्तर्षियों की परीक्षा → ब्रह्मचारी बने शिव की परीक्षा और अपना रूप दिखाना → विवाह तय होना → डरावनी बारात और मैना का बेहोश होना → शिव का सुंदर रूप और सात फेरे
  • विवाह → बारात → पार्वती का तप → सप्तर्षियों की परीक्षा
  • ब्रह्मचारी वाली परीक्षा → सप्तर्षियों की परीक्षा → पार्वती का तप → कामदेव का जलना
पूरी कथा पढ़िए — तप, परीक्षा, विवाह

इस अध्याय की बनावट तीन साफ़ चरणों की है: पार्वती जो ख़ुद करती हैं (तप), जो उन पर किया जाता है (परीक्षा), और जो नतीजे में मिलता है (विवाह)।

बीच का मोड़ ब्रह्मचारी का अपना रूप दिखाना है — वहीं कथा तप से विवाह की ओर मुड़ती है।

आख़िरी दृश्य — डरावनी बारात और फिर सुंदर रूप — पूरी गाथा का एक छोटा-सा नमूना है: शिव वैसे ही आते हैं जैसे वे हैं, और ज़रूरत पड़ने पर ही रूप बदलते हैं।

ग्रंथ असहमत

पार्वती के तप और विवाह की कथा का सबसे विस्तृत रूप कहाँ मिलता है?

  • कथा शिव पुराण (पार्वती खंड), स्कंद पुराण और कालिका पुराण में है; इसका सबसे विस्तृत और प्रसिद्ध साहित्यिक रूप कालिदास के "कुमारसंभव" का है
  • यह कथा सिर्फ़ रामायण में है
  • यह कथा वेदों में विस्तार से है
  • यह कथा महाभारत के आदि पर्व का मुख्य हिस्सा है
पूरी कथा पढ़िए — पुराण और काव्य, फिर से साथ

पिछले अध्याय की तरह यहाँ भी दो तरह के स्रोत हैं: पुराण कथा का ढाँचा देते हैं (तारक-वध की ज़रूरत, तप, विवाह), और कालिदास उसे काव्य बनाते हैं (ब्रह्मचारी वाली बहस, बारात का वर्णन)।

रामायण के बालकांड में विश्वामित्र यह कथा राम-लक्ष्मण को सुनाते हैं, पर वहाँ ज़ोर गंगा के अवतरण और कार्तिकेय के जन्म पर है, तप पर कम।

शिव-महिमा पुराण वाले ढाँचे को आधार बनाती है और बताती है कि सबसे याद किए जाने वाले दृश्य एक महाकाव्य से आते हैं।

बाद की परंपरा

उत्तर भारत और नेपाल में अविवाहित स्त्रियों का "हरतालिका तीज" व्रत किस कथा से जोड़ा जाता है?

  • सती के देह-त्याग से
  • गंगा के धरती पर उतरने से
  • पार्वती के इसी तप से
  • शिव के विष-पान से
पूरी कथा पढ़िए — एक तप, एक व्रत

हरतालिका तीज में स्त्रियाँ दिन भर निर्जल व्रत रखती हैं और रात भर जागकर शिव-पार्वती की पूजा करती हैं — पार्वती के तप की एक छोटी, प्रतीकात्मक नक़ल।

"हरतालिका" नाम की एक परंपरागत व्याख्या है: पार्वती की सखी उन्हें ("हरत") जंगल में ("आलिका"/सखी की मदद से) ले गई, ताकि पिता उनका विवाह विष्णु से न कर दें — यानी व्रत में तप के साथ वह ज़िद भी याद की जाती है।

यह गाथा व्रत की विधि तय नहीं करती — यह दर्ज करती है कि परंपरा ने पार्वती के तप को एक जीवित व्रत में बदल दिया।