
अध्याय १३
रावण और कैलास
रावण ने वह पर्वत उठाना चाहा जिस पर शिव बैठे थे — और शिव ने बिना उठे, एक पैर के अँगूठे से उसे दबा दिया
विमान जो रुक गया
रावण दिग्विजय से लौट रहा था, अपने पुष्पक विमान में। एक पर्वत के ऊपर विमान अचानक रुक गया — आगे नहीं बढ़ा।
नीचे नंदी खड़े थे। "यहाँ से आगे रास्ता नहीं। यह कैलास है। ऊपर शिव और पार्वती हैं। कोई नहीं गुज़रता।"
रावण ने नंदी का चेहरा देखा — बंदर जैसा — और हँस पड़ा।
नंदी ने कहा: "इसी बंदर जैसे मुँह पर हँसा तू। बंदर ही तेरे वंश का नाश करेंगे।"
रावण ने ध्यान नहीं दिया। पर वह शाप अपनी जगह दर्ज हो गया — और उसका पूरा हिसाब आगे रामायण में है, इस गाथा में नहीं।
बीस भुजाएँ, एक पर्वत
रावण विमान से उतरा। "जो पर्वत मेरा रास्ता रोकता है, उसे हटा दूँगा।"
उसने अपनी बीस भुजाएँ पर्वत के नीचे डालीं और ज़ोर लगाया।
कैलास हिलने लगा। ऊपर पार्वती डर गईं और शिव से लिपट गईं। गण इधर-उधर लुढ़के। बर्फ़ की चट्टानें टूटकर गिरीं।
एक अँगूठा
शिव उठे नहीं।
वे जहाँ बैठे थे वहीं से, उन्होंने अपने पैर का एक अँगूठा ज़मीन पर दबाया।
पर्वत वापस बैठ गया — और उसके नीचे रावण की बीसों भुजाएँ फँस गईं। वह न आगे निकाल सकता था, न पीछे।
रावण चीख़ा। इतनी ज़ोर से कि तीनों लोक काँप गए। परंपरा कहती है कि उसका नाम — रावण, "जो रुलाए" — इसी चीख़ से पड़ा, जो ब्रह्मा या शिव ने रखा।
हज़ार बरस, एक स्तुति
रावण दबा रहा — कुछ ग्रंथ कहते हैं हज़ार बरस।
आख़िर किसी ने उसे सलाह दी: शिव को ताक़त से नहीं, स्तुति से मनाया जा सकता है।
रावण ने गाना शुरू किया। परंपरा कहती है कि उसने अपनी एक भुजा की नस खींचकर उसे वीणा बनाया, और शिव की स्तुति गाई — वह स्तोत्र जो परंपरा में "शिव तांडव स्तोत्र" कहलाता है, और रावण के नाम से जुड़ा है।
शिव पिघल गए — वही आशुतोष, वही भोलेनाथ। उन्होंने पर्वत उठाया, रावण को छोड़ा।
शत्रु को वरदान
और फिर शिव ने उस आदमी को — जिसने अभी-अभी उनका घर उखाड़ने की कोशिश की थी — एक तलवार दी। चंद्रहास। और वरदान।
यह गाथा की धुरी है, एक बार फिर: शिव ने नहीं तौला कि सामने कौन है। रावण ने उनका पर्वत हिलाया, उनकी पत्नी को डराया — और फिर एक गीत गाया, और शिव ने उसे हथियार दे दिया।
चंद्रहास रावण की शक्ति और प्रतिष्ठा का एक और प्रतीक बना। पर राम-अवतार की कथा का मुख्य कारण वह वरदान था जो रावण ने ब्रह्मा से पाया था — जिसमें उसने मनुष्यों से सुरक्षा नहीं माँगी थी।
टिप्पणी: रावण के कैलास उठाने की कथा वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड (सर्ग १६) और शिव पुराण में है; उत्तरकांड को कई आधुनिक विद्वान मूल रामायण का बाद का विस्तार मानते हैं। रावण के वंश-नाश का नंदी-शाप और चंद्रहास तलवार का पूरा हिसाब रामायण में है, इस गाथा में नहीं। "शिव तांडव स्तोत्र" परंपरा में रावण से जुड़ा है, पर कई विद्वान इसे बहुत बाद की रचना मानते हैं। इस दृश्य की सबसे बड़ी शिल्पकारी एलोरा के कैलास मंदिर (गुफ़ा १६) में है। रावण का गोकर्ण में आत्मलिंग वाला प्रसंग (गणेश की चाल) एक अलग कथा है, इस अध्याय का हिस्सा नहीं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, रावण और कैलास