
अध्याय ४
शक्ति पीठ
शिव ने सती की देह कंधे पर उठा ली और छोड़ने से इनकार कर दिया — इसलिए विष्णु ने उसे चुपचाप काटना शुरू किया
जो देह उन्होंने छोड़ी नहीं
यज्ञ पूरा हो चुका था। दक्ष जी उठे थे। पर कनखल में एक चीज़ अब भी पड़ी थी — सती की जली हुई देह।
शिव ने उसे उठाया, कंधे पर रखा, और चल पड़े।
वे रुके नहीं। एक पर्वत से दूसरे, एक नदी पार, एक जंगल से होते हुए — देह कंधे पर, क़दम बिना ठिकाने के। देवता पीछे-पीछे चलते रहे, पर किसी की हिम्मत नहीं हुई कि आगे बढ़कर कहें, "अब रख दीजिए।"
धरती काँपने लगी
शिव का शोक अब चलना नहीं रहा — वह एक नाच बनने लगा। भारी, बिना ताल का, ऐसा जिसमें हर क़दम पर ज़मीन हिलती थी।
पर्वतों से चट्टानें गिरीं। समुद्र किनारों से बाहर आने लगे। ऋषियों का तप टूट गया। देवताओं को समझ आ गया कि अगर यह नाच नहीं रुका, तो जो दक्ष के यज्ञ में नहीं जला, वह अब जल जाएगा — पूरी सृष्टि।
"शिव देह के रहते नहीं रुकेंगे," विष्णु ने कहा। "तो देह को जाना होगा — पर ऐसे कि उन्हें पता न चले।"
चक्र, चुपचाप
सबसे प्रचलित बाद की परंपरा में विष्णु सुदर्शन चक्र से देह के टुकड़े करते हैं। देवी भागवत का अपना वर्णन अलग है — वहाँ विष्णु बाणों से अंग अलग करते हैं।
विष्णु ने सुदर्शन चक्र छोड़ा।
चक्र शिव के पीछे-पीछे चला, और जैसे-जैसे शिव आगे बढ़ते, वह सती की देह से एक-एक टुकड़ा काटता गया। टुकड़े नीचे गिरते गए — कोई पर्वत पर, कोई नदी के किनारे, कोई घने जंगल में।
शिव चलते रहे। कंधे पर बोझ हल्का होता गया, पर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
आख़िर में कंधा ख़ाली था।
जहाँ-जहाँ टुकड़े गिरे
हर उस जगह, जहाँ सती की देह का एक अंश गिरा, धरती बदल गई।
वहाँ एक पीठ बना — देवी का स्थान। कामाख्या, जहाँ योनि गिरी। कालीघाट, जहाँ पैर की उँगलियाँ। ज्वालामुखी, जहाँ जीभ — और वहाँ ज़मीन से आग निकलती रही, बिना ईंधन के। हिंगलाज, दूर पश्चिम में, जहाँ सिर का ऊपरी हिस्सा।
हर पीठ पर देवी अकेली नहीं हैं — हर एक की रखवाली एक भैरव करते हैं, जो शिव का ही एक रूप हैं। जहाँ सती का अंश है, वहाँ शिव भी हैं, एक अलग नाम से।
शिव बैठ गए
देह चली गई, तो नाच अपने आप थम गया।
शिव हिमालय की एक चोटी पर गए, आँखें मूँदीं, और बैठ गए। न बोलना, न हिलना, न किसी को पास आने देना। सती का जो जन्म पर्वत के घर होना था, वह अभी होना बाक़ी था — और तब तक शिव इसी समाधि में रहने वाले थे।
यह अध्याय यहीं ख़त्म होता है, पर शिव का यह बैठना आगे दो अध्यायों की जड़ है: कामदेव का जलना, और पार्वती की तपस्या।
जिसे परंपरा गिनती नहीं पाई
पीठों की गिनती हर सूची में अलग है।
सबसे प्रचलित संख्या ५१ है — संस्कृत वर्णमाला के ५१ अक्षरों जितनी। कुछ सूचियाँ ५२ गिनाती हैं, कुछ १०८, और कुछ पुरानी परंपराएँ सिर्फ़ ४ मुख्य पीठ मानती हैं। ५१ वाली पूरी सूची तंत्र-ग्रंथों से आती है और अपेक्षाकृत बाद की है।
पीठ आज भी भारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका में फैले हैं — यानी सती की देह की यह कथा एक तरह से उपमहाद्वीप का देवी-मानचित्र भी है।
टिप्पणी: शक्ति पीठों की कथा शिव पुराण, देवी भागवत पुराण, कालिका पुराण (ख़ास तौर पर कामाख्या) और महाभागवत पुराण में है; ५१ पीठों की पूरी सूची मुख्यतः तंत्र-ग्रंथों (तंत्रचूड़ामणि आदि) से आती है और बाद की है। संख्या परंपरा के साथ बदलती है — ४, ५१, ५२, १०८। हर पीठ पर देवी के साथ एक भैरव (शिव का रूप) की परंपरा शाक्त और शैव दोनों धाराओं में है। पीठ आज भारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका में फैले माने जाते हैं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, शक्ति पीठ