
अध्याय ५
तीसरा नेत्र
देवताओं ने प्रेम के देवता को भेजा कि शिव के मन में इच्छा जगाए — और शिव ने आँख खोलकर उसे राख कर दिया
एक असुर, एक शर्त
तारकासुर को वरदान था: उसकी मृत्यु सिर्फ़ शिव के पुत्र के हाथ होगी।
वरदान चालाक था। शिव सती के जाने के बाद हिमालय पर समाधि में बैठे थे — न विवाह, न गृहस्थी, न पुत्र। यानी जब तक शिव यूँ ही बैठे हैं, तारक को कोई नहीं मार सकता। असुर तीनों लोकों को रौंदता रहा और देवता कुछ नहीं कर सके।
एक ही रास्ता था: शिव को उस समाधि से उठाकर विवाह की ओर मोड़ना।
पर्वत की बेटी, जो सेवा में थी
सती अब पार्वती थीं — हिमालय की बेटी। हिमवान ने उन्हें उसी समाधि में बैठे शिव की सेवा में लगा रखा था। पार्वती रोज़ आतीं, फूल चढ़ातीं, आसपास सफ़ाई करतीं, और लौट जातीं। शिव आँखें नहीं खोलते थे।
देवताओं ने सोचा: पार्वती वहीं हैं, बस शिव के मन में इच्छा भर जगानी है। और वह काम एक ही देवता का था।
कामदेव कैलास पर
इंद्र ने कामदेव को बुलाया। कामदेव अपनी पत्नी रति और मित्र वसंत को साथ लेकर कैलास पहुँचे।
वसंत बेमौसम आ गया — बर्फ़ के बीच पेड़ों पर बौर फूट पड़े, कोयल बोलने लगी, हवा गरम हो गई। शिव की समाधि के चारों ओर अचानक बहार थी।
कामदेव एक पेड़ के पीछे छिपे और इंतज़ार करने लगे कि पार्वती शिव के पास आएँ।
एक बाण, और एक आँख
पार्वती आईं, झुककर शिव के चरणों में एक कमल रखने लगीं।
उसी पल कामदेव ने अपना सम्मोहन-बाण चढ़ाया और छोड़ दिया।
शिव के भीतर एक कँपकँपी दौड़ी — एक पल के लिए उनकी नज़र पार्वती की ओर उठी। फिर वे रुके। उन्होंने समझ लिया कि यह उनके भीतर से नहीं आया, बाहर से डाला गया है।
उनका माथा तना। बीच की वह तीसरी आँख, जो हमेशा बंद रहती है, खुली — और उसमें से आग की एक लपट निकली।
कामदेव उसी जगह, उसी पल, राख हो गए। पेड़ के पीछे बस एक मुट्ठी राख बची।
रति
रति चीख़कर उस राख पर गिर पड़ीं।
"इसने अपनी मर्ज़ी से नहीं किया," वे बोलीं। "इसे इंद्र ने भेजा था, आप ही को जगाने के लिए। और आपने इसे मार डाला।"
शिव कुछ नहीं बोले। वे उठे और वहाँ से चले गए — पार्वती की ओर एक नज़र डाले बिना।
बहार ख़त्म हो गई। बर्फ़ लौट आई। और हिमालय पर एक विधवा एक मुट्ठी राख के पास बैठी रह गई।
जो शिव ने बाद में कहा
रति देवताओं के साथ बहुत बार शिव के पास गईं।
आख़िर शिव ने इतना कहा: कामदेव मरा नहीं, पर अब उसकी कोई देह नहीं होगी। वह "अनंग" रहेगा — बिना अंग वाला — हर जगह मौजूद, पर दिखाई न देने वाला। कुछ ग्रंथ आगे जोड़ते हैं कि वह द्वापर में कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में देह पाएगा और रति उसे फिर मिलेंगी।
देवताओं को एक बात साफ़ हो गई: शिव को इच्छा से नहीं जगाया जा सकता। जो रास्ता बचा, वह पार्वती का था — और वह इच्छा का नहीं, तप का रास्ता था।
टिप्पणी: कामदेव-दहन की कथा शिव पुराण (रुद्र संहिता, पार्वती खंड), मत्स्य पुराण, स्कंद पुराण और सौर पुराण में है। इसका सबसे प्रसिद्ध रूप कालिदास के महाकाव्य "कुमारसंभव" का है, जो एक काव्य है, धर्मग्रंथ नहीं — रति का विलाप और वसंत का वर्णन मुख्यतः वहीं से आते हैं। कामदेव के प्रद्युम्न-रूप में पुनर्जन्म का जोड़ भागवत और हरिवंश की अलग कथा से है, हर शिव-कथा में नहीं। दक्षिण भारत में कामदहनम को होली के समय से जोड़ा जाता है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, तीसरा नेत्र