
अध्याय ३
वीरभद्र
शिव ने अपनी जटा से एक लट नोची, और उससे जो उठा उसने एक पूरा यज्ञ उखाड़ दिया
एक लट, ज़मीन पर
कैलास पर शिव ने ख़बर सुनी और देर तक कुछ नहीं किया।
फिर वे उठे। उनके चेहरे पर शोक नहीं, कुछ और था। उन्होंने अपनी जटा से एक लट पकड़ी, नोची, और उसे पर्वत की चट्टान पर दे मारा।
लट दो टुकड़ों में टूटी। एक टुकड़े से एक आकृति उठी — विशाल, हज़ार भुजाओं वाली, गले में खोपड़ियों की माला, हाथों में हथियार। यह वीरभद्र था। दूसरे टुकड़े से एक और आकृति उठी — भद्रकाली।
वीरभद्र ने सिर झुकाया। "आज्ञा।"
आज्ञा
"कनखल जाओ," शिव ने कहा। "दक्ष का यज्ञ चल रहा है। उसे रोको। यज्ञ में जो बैठे हैं, उन्हें उनकी जगह दिखाओ। और दक्ष को — उसका जो हश्र हो।"
वीरभद्र के पीछे शिव के गण उमड़ पड़े — हज़ारों, हर आकार के, हर आवाज़ के। भद्रकाली उनके साथ थीं।
यह सेना कैलास से उतरी और कनखल की ओर चल पड़ी। रास्ते में आँधियाँ उठीं, दिन में अँधेरा हुआ, और यज्ञ-स्थल पर बैठे ऋषियों को दूर से आती धूल दिखने लगी।
यज्ञ-स्थल पर
गण यज्ञ-मंडप में घुसे।
हवन-कुंड उलट दिए गए। मंत्र पढ़ते ब्राह्मण भागे। देवता, जो अभी तक ऊँचे आसनों पर बैठे थे, अब इधर-उधर छिपने लगे।
भग के, जो आँखों से इशारा करके दक्ष की बात पर हँसे थे, वीरभद्र ने आँखें ही निकाल लीं। पूषा के, जो यज्ञ का प्रसाद चबा रहे थे, दाँत तोड़ दिए। भृगु की, जो दक्ष के मुख्य ऋत्विज थे, दाढ़ी नोच ली।
यज्ञ ख़ुद एक हिरण का रूप लेकर आकाश की ओर भागा। वीरभद्र ने उसका पीछा किया।
दक्ष का सिर
दक्ष हवन-कुंड के पास खड़े थे, अपने ही यज्ञ के बीच फँसे हुए।
वीरभद्र उन तक पहुँचे। शिव पुराण कहता है कि उन्होंने दक्ष का सिर धड़ से अलग किया और उसे हवन की आग में डाल दिया — वही आग, जिसमें दक्ष हर देवता को आहुति दे रहे थे, सिवाय एक के।
यज्ञ रुक गया। मंडप उजड़ गया। बचे हुए देवता और ऋषि वहाँ से भागकर ब्रह्मा के पास पहुँचे, और ब्रह्मा उन्हें लेकर कैलास गए।
कैलास पर गिड़गिड़ाहट
देवता शिव के सामने हाथ जोड़कर खड़े हुए।
"हमने ग़लती की," उन्होंने कहा। "हम दक्ष के यज्ञ में गए, जहाँ आपका नाम तक नहीं था। यज्ञ अधूरा है, संसार का चक्र रुका है। इसे पूरा होने दीजिए।"
शिव कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, "यज्ञ पूरा होगा। पर इस बार मेरे हिस्से के साथ।"
वे ख़ुद कनखल आए।
बकरे का सिर
शिव ने मारे गए देवताओं को फिर जीवित किया। भग को दृष्टि लौटी, पूषा को चबाने की जगह पिसा हुआ अन्न मिलना तय हुआ, भृगु को एक नई दाढ़ी।
दक्ष का असली सिर आग में जल चुका था और मिल नहीं रहा था। इसलिए शिव ने यज्ञ के लिए लाए गए बकरे का सिर दक्ष के धड़ पर जोड़ दिया।
दक्ष उठे — बकरे के मुँह के साथ। और उठते ही उन्होंने पहली बार शिव की स्तुति की। फिर यज्ञ पूरा हुआ, और इस बार पहली आहुति शिव के नाम की थी।
जिसे शुरू में छोड़ा गया था, यज्ञ उसी के नाम पर पूरा हुआ।
टिप्पणी: वीरभद्र और यज्ञ-विध्वंस की कथा शिव पुराण (रुद्र संहिता), भागवत पुराण (चौथा स्कंध), वायु पुराण और लिंग पुराण में है; महाभारत में यह संक्षिप्त रूप में (शांति पर्व और शल्य पर्व) आती है। भग की आँखें, पूषा के दाँत और भृगु की दाढ़ी वाले ब्योरे भागवत और शिव पुराण के हैं। दक्ष को बकरे (अज) का सिर लगना शैव परंपरा में मज़बूत है। वीरभद्र आगे एक स्वतंत्र देवता के रूप में पूजे जाते हैं, ख़ास तौर पर कर्नाटक की वीरशैव परंपरा में।
स्रोत: कई ग्रंथों से, वीरभद्र