
अध्याय १२
भागीरथ
साठ हज़ार लोग राख हो चुके थे, और उन्हें बचाने के लिए एक नदी को आसमान से उतारना था
जो घोड़े के पीछे गए
राजा सगर ने अश्वमेध किया, और घोड़ा गुम हो गया।
उन्होंने अपने साठ हज़ार बेटों को उसे ढूँढ़ने भेजा। बेटों ने पूरी धरती खोद डाली — यहीं से समुद्र के लिए "सागर" नाम जुड़ा बताया जाता है।
आख़िर घोड़ा एक ऋषि के आश्रम में बँधा मिला, और ऋषि ध्यान में बैठे थे।
बेटों ने बिना पूछे मान लिया कि चोर यही हैं, और उन पर टूट पड़े।
कपिल ने आँखें खोलीं। साठ हज़ार वहीं राख हो गए।
जो पीढ़ियाँ लगीं
राख को गति नहीं मिल सकती थी — उसके लिए गंगा का जल चाहिए था, और गंगा तब धरती पर थी ही नहीं।
सगर के पौत्र अंशुमान ने गंगा को लाने की कोशिश की, पर सफल नहीं हुए। उनके पुत्र दिलीप ने भी कोशिश की, और वे भी नहीं कर पाए।
फिर दिलीप के पुत्र भागीरथ आए।
उन्होंने राज छोड़ा और तप पर बैठ गए — अपने लिए कुछ माँगने नहीं, उन लोगों के लिए जिन्हें उन्होंने कभी देखा भी नहीं था।
शर्त, और एक और शर्त
गंगा राज़ी हुईं, पर एक बात कही: "मैं आसमान से गिरूँगी। मेरा वेग धरती नहीं सह पाएगी। मुझे कौन थामेगा?"
भागीरथ फिर तप पर बैठे — इस बार शिव के लिए।
शिव आए और खड़े हो गए। गंगा गिरीं, और उनकी जटाओं में उलझकर रह गईं।
फिर वहाँ से एक धारा छोड़ी गई, उतनी जितनी धरती सह सके।
आगे-आगे रथ
इसके बाद का दृश्य पूरी कथा का सबसे अच्छा दृश्य है।
भागीरथ आगे-आगे रथ पर चलते हैं, और गंगा पीछे-पीछे आती हैं। जिधर वे मुड़ते हैं, नदी उधर मुड़ जाती है।
रास्ते में वह एक ऋषि का आश्रम बहा ले जाती हैं और उन्हें पी लिया जाता है, फिर छोड़ा जाता है — इसीलिए एक नाम जाह्नवी पड़ा।
और आख़िर में वह जल उस राख तक पहुँचता है।
काम पूरा होता है, इतनी पीढ़ियों बाद कि जिसने शुरू किया था वह कब का जा चुका है।
टिप्पणी: सगर के बेटों, कपिल और भागीरथ की कथा विष्णु पुराण (चौथा अंश) में है, और यही कथा वाल्मीकि रामायण के बालकांड तथा महाभारत में भी मिलती है — यानी यह तीनों जगह लौटती है। गंगा को शिव की जटाओं में थामे जाने का प्रसंग इन्हीं वर्णनों का हिस्सा है। गंगा के नामों की जड़ें — भागीरथी और जाह्नवी — इसी कथा से जोड़ी जाती हैं, और समुद्र के लिए "सागर" नाम सगर के बेटों से।
स्रोत: कई ग्रंथों से, भागीरथ