अध्याय ९
बुद्ध
यह अध्याय एक दावे के बारे में है, और दावा करने वाले के बारे में — दोनों को अलग रखकर
पहले साफ़ बात
यह अध्याय बौद्ध धर्म के बारे में नहीं है।
यह इस बारे में है कि वैष्णव परंपरा ने बुद्ध को अपनी सूची में कैसे रखा, और क्यों — और उस बात पर सहमति है भी या नहीं।
बौद्ध परंपरा बुद्ध को विष्णु का अवतार नहीं मानती। यह दावा उसका है ही नहीं। इसलिए यहाँ जो लिखा है, उसे एक परंपरा का कहा हुआ समझकर पढ़िए, सबका मान लिया हुआ नहीं।
विष्णु पुराण क्या कहता है
विष्णु पुराण में एक प्रसंग है जिसमें असुर बहुत बलवान हो चुके हैं — इसलिए नहीं कि वे लड़ाई में जीत रहे हैं, बल्कि इसलिए कि वे वेदों के विधान का पालन कर रहे हैं और उसी से उनकी शक्ति बढ़ रही है।
देवता हार रहे हैं, और उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा।
तब विष्णु से एक रूप निकलता है, जिसे मायामोह कहा गया है।
वह असुरों के बीच जाता है और उन्हें समझाता है — यह विधान छोड़ दो, यह मत मानो।
असुर मान जाते हैं। उनका बल घटता है। देवता जीत जाते हैं।
वह रूप, और वह नाम
विष्णु पुराण का यह मायामोह-प्रसंग आगे चलकर बौद्ध और जैन, दोनों मतों से जोड़ा गया — यह रूप असुरों को वेदिक विधान से भटकाने के लिए भेजा गया बताया जाता है। यह एक धारा है।
एक दूसरी धारा में, भागवत पुराण अपनी अवतार-सूची में बुद्ध का नाम सीधे, अलग से देता है — बिना मायामोह वाले इस प्रसंग से जोड़े। बाद की दशावतार परंपराओं में बुद्ध व्यापक रूप से नौवें अवतार के रूप में स्थापित हुए। मायामोह वाले प्रसंग और नामित बुद्ध-अवतार के बीच संबंध अलग-अलग ग्रंथों और व्याख्याओं में अलग तरह से समझा गया है।
पर ध्यान दीजिए कि मायामोह वाला मूल प्रसंग किस ढंग का है।
इस प्रसंग में वह रूप उद्धार करने नहीं आता। वह भटकाने आता है।
और सूची भी एक नहीं है
यही वजह है कि नौवें स्थान पर सूचियाँ सबसे ज़्यादा हिलती हैं।
कुछ सूचियों में वहाँ बुद्ध हैं। कुछ में बलराम।
और भागवत पुराण दस पर रुकता ही नहीं — वह बाईस अवतार गिनाता है, और कहता है कि गिनती इससे भी आगे जा सकती है।
इस गाथा में सबसे प्रचलित सूची ली गई है। पर उसे इकलौती कहकर नहीं।
टिप्पणी: विष्णु पुराण के तीसरे अंश में मायामोह वाला प्रसंग है — असुर वेद-विधान के पालन से बलवान हो जाते हैं, और विष्णु से निकला एक रूप उन्हें वह छोड़ने के लिए राज़ी कर लेता है, जिससे उनका बल घट जाता है। यह प्रसंग बाद में बौद्ध और जैन मतों से जोड़ा गया। भागवत पुराण अलग से, सीधे बुद्ध का नाम अपनी अवतार-सूची में देता है — मायामोह से जोड़े बिना। बाद की दशावतार परंपराओं में बुद्ध व्यापक रूप से नौवें अवतार के रूप में स्थापित हुए; मायामोह-प्रसंग और नामित बुद्ध-अवतार के बीच संबंध अलग-अलग ग्रंथों में अलग तरह से समझा गया है। यह वैष्णव परंपरा की बात है; बौद्ध परंपरा बुद्ध को विष्णु का अवतार नहीं मानती, और यह दावा उसका है ही नहीं। नौवाँ स्थान वैसे भी सबसे कम तय है — कुछ सूचियों में वहाँ बलराम आते हैं, और भागवत पुराण दस पर रुकता ही नहीं, बाईस गिनाता है। यहाँ प्रसंग वैसा ही दर्ज है जैसा ग्रंथ में है, बिना कोई व्याख्या चुने।
स्रोत: कई ग्रंथों से, बुद्ध