
अध्याय ११
ध्रुव
एक बच्चा गोद से उतार दिया गया, और वहीं से चलकर आकाश में जा टिका
गोद, जो नहीं मिली
राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं — सुनीति और सुरुचि। राजा को प्यारी सुरुचि थी।
एक दिन ध्रुव, सुनीति का बेटा, पिता की गोद में चढ़ने गया। वह पाँच बरस का था।
सुरुचि ने उसे रोक दिया।
"यह जगह तुम्हारी नहीं है। तुम मेरे गर्भ से नहीं जन्मे। चाहते हो तो तप करो, और अगले जन्म में मेरा बेटा बनकर आओ।"
राजा कुछ नहीं बोले।
माँ के पास
ध्रुव अपनी माँ के पास गया।
सुनीति ने उसे झूठी तसल्ली नहीं दी। उन्होंने कहा कि जो कहा गया वह कठोर था, पर राजा की गोद माँगने से नहीं मिलती।
फिर उन्होंने वह कहा जो कथा को मोड़ देता है: "जो जगह कोई छीन न सके, वह माँगने से नहीं, तप से मिलती है।"
पाँच बरस का बच्चा उसी रात घर से निकल गया।
वन में
रास्ते में नारद मिले और समझाने लगे — यह उम्र तप की नहीं है, लौट जाओ।
ध्रुव नहीं लौटा।
तब नारद ने उसे मंत्र दिया और रास्ता बता दिया।
आगे की कथा गिनती की है: पहला महीना फल पर, दूसरा पत्तों पर, तीसरा सिर्फ़ पानी पर, चौथा सिर्फ़ हवा पर। पाँचवें महीने वह एक पैर पर खड़ा था और साँस भी रोक चुका था।
वन के जानवर पास से गुज़रते और रुक जाते।
जो माँगने आया था, वह माँगा ही नहीं
फिर विष्णु सामने आए।
और यहाँ कथा का सबसे अच्छा हिस्सा है। ध्रुव उनसे वह नहीं माँगता जिसके लिए वह घर से निकला था।
वह जगह — पिता की गोद, सुरुचि से ऊँचा आसन — अब उसे याद ही नहीं रही।
कथा कहती है कि उसे उससे कहीं बड़ा मिला: आकाश में एक जगह, जो घूमती नहीं। हर तारा उसके चारों ओर घूमता है, और वह अपनी जगह पर टिका रहता है।
उसी को ध्रुव तारा कहा जाता है।
टिप्पणी: ध्रुव की कथा विष्णु पुराण (पहला अंश) और भागवत पुराण (चौथा स्कंध) में मिलती है — यह पुराणों की अपनी कथा है, रामायण या महाभारत से नहीं आती। तप के महीनों वाला ब्योरा और नारद का मंत्र देना भागवत में विस्तार से आते हैं। ध्रुव तारे से इस कथा का जुड़ाव ग्रंथों में ही दर्ज है, बाद की परंपरा का जोड़ नहीं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, ध्रुव