
अध्याय १४
जड़ भरत
एक राजा ने सब छोड़ दिया, और आख़िर में एक हिरण के बच्चे से हार गया
जिसने सब छोड़ा
भरत बड़े राजा थे। उन्होंने राज बेटों में बाँटा और वन चले गए।
वहाँ उन्होंने वही किया जो करना था — तप, नियम, अकेलापन। बरसों तक कुछ नहीं बदला।
नदी किनारे
एक दिन नदी के किनारे एक हिरणी पानी पीने आई, और तभी शेर की दहाड़ सुनाई दी।
वह घबराकर नदी पार करने के लिए छलाँग लगी। छलाँग में उसका बच्चा पानी में गिर गया। हिरणी ख़ुद पार निकल गई, पर कुछ दूर जाकर गिर पड़ी और मर गई।
भरत ने उस बच्चे को पानी से निकाला।
जो धीरे-धीरे हुआ
पहले उन्होंने उसे सिर्फ़ बचाया।
फिर दूध पिलाया। फिर उसे धूप से बचाया। फिर रात में उसे पास रखने लगे।
और फिर एक दिन ऐसा आया जब वे तप करते हुए भी यही सोच रहे थे कि वह कहाँ गया, लौटा या नहीं, कहीं किसी जानवर ने तो नहीं पकड़ लिया।
कथा कहती है कि जिस चीज़ को छोड़ने वे वन आए थे, वह लौट आई थी — बस बहुत छोटे रूप में।
और अगला जन्म
अंत समय में भी उनका मन उसी हिरण पर था।
इसलिए अगला जन्म हिरण का हुआ।
पर उस जन्म में उन्हें पिछला जन्म याद रहा, और यह भी याद रहा कि यहाँ तक कैसे पहुँचे।
जड़ भरत
उसके बाद वे फिर मनुष्य हुए, और इस बार उन्होंने कोई ग़लती नहीं दोहराई।
उन्होंने किसी से लगाव नहीं बनाया, किसी काम में मन नहीं लगाया, और लोगों को लगने लगा कि यह आदमी मंदबुद्धि है। नाम ही पड़ गया — जड़ भरत।
एक दिन उन्हें पकड़कर राजा की पालकी ढोने में लगा दिया गया।
वे चलते समय अजीब तरह से क़दम रखते थे, क्योंकि वे नीचे कीड़े-मकोड़ों को देखकर बचा रहे थे। पालकी हिलती रही।
राजा ने डाँटा।
और तब वह "मंदबुद्धि" आदमी बोला — और जो बोला, वह उस पूरे प्रसंग का सबसे लंबा हिस्सा है।
टिप्पणी: जड़ भरत की कथा विष्णु पुराण के दूसरे अंश और भागवत पुराण के पाँचवें स्कंध में मिलती है, और भागवत उसे कई अध्याय देता है — ख़ासकर राजा रहूगण के साथ हुई बातचीत को। ध्यान रहे कि ये भरत रामायण वाले भरत नहीं हैं; इन्हें ऋषभदेव का पुत्र बताया जाता है, और परंपरा में "भारतवर्ष" नाम इन्हीं से जोड़ा जाता है। अंत समय के विचार से अगली गति तय होने वाला नियम पुराणों और गीता, दोनों में मिलता है, और यह कथा उसी को कहानी की तरह रखती है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, जड़ भरत